6

मू़ढ़मतियों का पक्षसमर्थन

कॉनकॉर्ड, मैसाचुसैट्स - कल्पना कीजिए कि पक्षसमर्थकों के किसी समूह ने जनता को किसी ऐसे ख़तरे के बारे में सतर्क करने की कोशिश की जिसे वे महसूस करते थे, पर केवल साक्ष्यों से पता चला कि ख़तरा वास्तविक नहीं था, और अपने डर को फैलाकर, यह समूह लोगों को इस तरह व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर रहा था जो आम जनता - और आपको - जोखिम में डाल रहा था। आप क्या करेंगे? सरकार को क्या करना चाहिए?

ऑस्ट्रेलिया क��� सरकार ने इस प्रश्न का उत्तर नाटकीय रूप से दिया है। उसने एक टीकाकरण-विरोधी पक्षसमर्थन समूह की कर-मुक्त धर्मादा हैसियत को इस आधार पर वापस ले लिया है कि टीकों के ख़तरे के बारे में उनकी डर फैलाने वाली गलत जानकारी से लोक स्वास्थ्य, विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य को ख़तरा है।

Chicago Pollution

Climate Change in the Trumpocene Age

Bo Lidegaard argues that the US president-elect’s ability to derail global progress toward a green economy is more limited than many believe.

सरकार ने समूह से यह भी अपेक्षा की है कि वह अपना नाम ऑस्ट्रेलियन वैक्सीनेशन नेटवर्क से बदलकर ऑस्ट्रेलियन वैक्सीनेशन-स्कैप्टिक्स नेटवर्क कर ले ताकि पक्षसमर्थक का दृष्टिकोण साफ हो सके। “हम यह सुनिश्चित करना जारी रखेंगे कि वे स्वयं को टीकाकरण-विरोधी पक्षसमर्थन के रूप पेश करते हैं,” यह न्यू साउथ वेल्स के उचित व्यापार मंत्री स्टुअर्ट आइरेस ने कहा। “हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वे कभी भी भ्रामक जानकारी प्रचारित न करें।”

यह वास्तव में ख़तरनाक क्षेत्र है। हालाँकि साक्ष्य से साफ पता चलता है कि टीकाकरण से ऐसे कोई नुकसान नहीं पहुँचते हैं जिनका इसके विरोधी हठपूर्वक दावा करते हैं कि इससे नुकसान होते हैं; किसी सरकार द्वारा बोलने पर प्रतिबंध लगाना चिंताजनक है। किसी भी मुक्त समाज को अपनी सरकार को यह निर्णय करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि पक्षसमर्थक जिस किसी बात पर विश्वास करते हैं उसके आधार पर कौन-से पक्षसमर्थन समूह क्या कह सकते हैं।

लेकिन इस मामले में ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों की कार्रवाई पूर्णतः उचित, और अनिवार्य, लोक सेवा थी: यह ठोस और सुसंगत चिकित्सीय साक्ष्य पर आधारित लोक स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा करने के लिए थी।

साक्ष्य निर्णायक रूप से टीकाकरण-विरोधी पक्षसमर्थकों के इन दावों को खारिज करता है कि बाल्यावस्था में टीकाकरण से स्वलीनता और अन्य दीर्घ-कालीन स्नायुतंत्र विकास संबंधी क्षति पहुँचती है। फिर भी डर फैलानेवालों और लोभी मुनाफाखोरों का एक छोटा लेकिन मुखर समूह गलत बयानी और सफेद झूठ बोलकर यह प्रचार करता आ रहा है कि टीकाकरण से फायदा कम होता है और नुकसान ज्यादा।

फलस्वरूप, कुछ समुदायों में टीकाकरण की दरों में कमी हो रही है, विशेष रूप से जिनमें सरकार-विरोधी इच्छास्वातंत्रयवादियों या सादगीपूर्ण जीवन बिताने वाले पर्यावरणवादियों की संख्या बहुत अधिक है। फलस्वरूप, कुछ क्षेत्रों में खसरा और काली खाँसी (कुक्कुर खाँसी) जैसे रोगों के समुदाय-व्यापी "झुंड" प्रतिरक्षा स्तर उन स्तरों से कम हो गए हैं जो उन्हें सामान्य जनता में फैलने से रोकने के लिए आवश्यक हैं। जिन वयस्कों में टीके का असर क्षीण हो चुका है या 100% प्रभावशील नहीं है, वे अधिक संख्या में बीमार पड़ने लग गए हैं। जो शिशु काली खाँसी का टीका लगाए जाने के लिए बहुत छोटे हैं वे भी, बीमार पड़ते जा रहे हैं, उनमें से कुछ तो वास्तव में खाँसी और दम घुटने के कारण मरते जा रहे हैं।

इसलिए ऑस्ट्रेलिया की सरकार का निर्णय साफ तौर पर उचित है। यह सब होते हुए, उन ख़तरों से हमारी रक्षा करना जिनसे हम व्यक्तिगत रूप से स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते, हम सरकार को जो कुछ करने का अधिकार देते हैं, उसका प्रमुख हिस्सा है। जब साक्ष्य साफ हो जैसा कि टीकों के मामले में है - और परिणाम उतने गंभीर हों - तो सरकार का यह सुस्थापित प्राधिकार - वास्तव में दायित्व - है कि वह सार्वजनिक सुरक्षा के नाम पर कार्रवाई करे।

लेकिन टीकाकरण तो इस बात का केवल एक उदाहरण है कि पक्षसमर्थक वैज्ञानिक साक्ष्य को नकार कर जनता को किस प्रकार जोखिम में डाल रहे हैं। विचारधारा-आधारित मानव-प्रेरित ग्लोबल वार्मिंग को अस्वीकार करने से जलवायु-परिवर्तक उत्सर्जनों को कम करने या इस भारी संकट के बहुत अधिक स्पष्ट - और ख़तरनाक - परिणामों के लिए तैयारी करने के प्रयासों में बाधा आ रही है। बंदूक स्वामित्व के किसी भी विनियमन के निरंकुश विरोध के फलवरूप, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में, घातक हथियारों को उन लोगों के हाथों से दूर रखना मुश्किल होता जा रहा है जो समाज के लिए खतरा पैदा करते हैं।

जैव-प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से अनुवांशिकी संशोधित (जीएम) खाद्यों का प्रतिरोध करना एक अन्य उदाहरण है। कुछ अनुप्रयोग मानव स्वास्थ्य को भारी लाभ पहुँचा सकते हैं, लेकिन समाज को उनसे मिलनेवाले लाभ नहीं मिल पा रहे हैं - और परिणामस्वरूप लोगों को को तकलीफ हो रही है और वे मर रहे हैं - क्योंकि बड़ी कंपनियों, वाणिज्यिक कृषि, या आम तौर पर आधुनिक प्रौद्योगिकियों को मूल रूप से नापसंद करने के कारण विरोधी सभी जीएम अनुप्रयोगों को अस्वीकार कर देते हैं।

“सुनहरी चावल” के बारे में सोचें जो एक जीएम संकर किस्म है जिसमें उन गाजरों के जीन्स होते हैं जिनसे विटामिन ए बनता है। एक हालिया अध्ययन से यह पता चला है कि केवल भारत में सुनहरी चावल को यदि 2002 में तब स्वीकार कर लिया जाता जब वह तकनीकी रूप से तैयार था, तो इससे उन लोगों के 1.4 मिलियन विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष बचाए जा सकते थे जो इसके बिना विटामिन ए की कमी के कारण अंधेपन या मौत के शिकार हुए।

अब पक्षसमर्थकों पर हल्ला बोलने का समय है क्योंकि उनके मूल्य-आधारित विचार स्पष्ट वैज्ञानिक साक्ष्य का खंडन करते हैं और आपको और मुझे जोखिम में डालते हैं। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे खुलकर बोलें, जैसा कि उन्होंने हाल ही में इंग्लैंड में किया था, जहाँ पर गेहूँ की एक नई नस्ल का परीक्षण करनेवाले शोधकर्ताओं ने जीएम-विरोधी पक्षसमर्थकों को सार्वजनिक बहस के लिए चुनौती दी थी। पक्षसमर्थकों ने मना कर दिया, परंतु सुनियोजित रूप से क्षेत्र परीक्षणों पर हमले करना जारी रखा जिससे उन कार्यकर्ताओं के प्रति जनता के समर्थन में कमी आई।

Fake news or real views Learn More

आपको और मुझे तथा हमारे साथी नागरिकों को चाहिए कि किस समूह में शामिल होना है या उसकी वित्तीय रूप से सहायता करनी है यह चुनकर उन्हें पीछे धकेल दें। हमें लंबित विधेयक के बारे में सार्वजनिक सुनवाइयों और साक्ष्य में उन्हें खदेड़ने की ज़रूरत है, और बहुत अधिक जोशीली आवाज़ों को हमारे राजनीतिज्ञों और नीति-निर्माताओं पर ऐसे चुनावों के रूप में हावी नहीं होने देना चाहिए जिनमें सबसे अधिक मुखर थोड़ी-सी आवाज़ों को मान लिया जाए, लेकिन समाज उससे होनेवाले लाभ से पूरी तरह वंचित रह जाता है। और, जब साक्ष्य साफ हो और ख़तरा सामने हो, तो सरकारों को चाहिए कि वे उन्हें पीछे धकेल दें, जैसा कि ऑस्ट्रेलिया ने किया है।

किसी भी लोकतंत्र में हमेशा भावनाओं और मूल्यों को अभिव्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। हमें समाज को आगे बढ़��ने के लिए पक्षसमर्थकों के अपार जुनून की ज़रूरत है। लेकिन जब इन जुनूनों के कारण तथ्यों की अनदेखी की जाती है और ये हमें जोखिम में डालते हैं, तो यह पूर्णतः उचित है कि लोक स्वास्थ्य और सुरक्षा के नाम पर आप और मैं और हमारी सरकारें सभी यह कहें कि, “बस, अब बहुत हो चुका।”