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महिलाओं के विकास के लक्ष्य

न्यू यॉर्क - संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम विकास लक्ष्यों (MDGs) की 2015 की समय सीमा नज़दीक आने पर, दुनिया के नेताओं के सामने एक विकल्प होगा: निर्धारित लक्ष्यों को एक या दो दशक आगे ले जाएँ, या उन लोगों को जवाबदेह ठहराएँ जो अपने वायदे पूरे करने में विफल रहे हैं। महिलाओं के लिए तो विकल्प स्पष्ट है।

हम यहाँ पहले मिल चुके हैं। 1978 में, अल्मा-आटा में प्राथमिक स्वास्थ्य-सेवा पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में, 134 राज्यों ने घोषणा पर हस्ताक्षर किए जिसमें वर्ष 2000 तक सभी के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य-सेवा का आह्वान किया गया था। सोलह साल बाद, 1994 में, काहिरा में, 179 सरकारों ने प्रजनन अधिकारों को बुनियादी मानव अधिकार के रूप में अपनाया और परिवार नियोजन सहित, जनन स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी श्रेणी तक सार्वभौमिक पहुँच का प्रावधान सुनिश्चित करने के लिए प्रस्ताव पारित किए गए।

लेकिन ये समय सीमाएँ आईं और चली गईं जब सितंबर 2000 में, 55वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान, 189 देशों के नेताओं ने मिलेनियम विकास लक्ष्यों (MDGs) को अपनाया। और मिलेनियम विकास लक्ष्यों (MDG) की घोषणा से पहले और बाद में दुनिया के नेताओं ने अनेक अन्य प्रतिबद्धताएँ और संकल्प किए।

तो, अब हम कहाँ हैं?

हम जानते हैं कि कई मिलेनियम विकास लक्ष्य (MDG) पहले ही पूरे किए जा चुके हैं। 2000 के बाद से चरम ग़रीबी आधे से ज़्यादा कम कर ली गई है, 2010 में यह लगभग 22% थी - जिसमें लगभग 700 मिलियन लोगों को दुनिया के सबसे ग़रीब की श्रेणी से बाहर निकाल लिया गया। हमने HIV/AIDS, मलेरिया और तपेदिक के ख़िलाफ़ लड़ाई में सकारात्मक परिणाम देखे हैं। अरबों लोगों की बेहतर पीने के पानी तक पहुँच है; और अनेक लोगों को स्वच्छता तक पहुँच प्राप्त हो गई है (हालाँकि एक अरबों लोगों को अभी भी खुले में शौच करना होता है - जो भारी स्वास्थ्य जोखिम है)।

लैंगिक समानता में भी प्रगति हुई है। लड़कियाँ और लड़के बराबर संख्या में स्कूल जाते हैं, और महिलाएँ राजनीतिक क्षेत्र में अपनी आवाज़ अधिकाधिक रूप से उठा रही हैं।

लेकिन यह तस्वीर जल्दी ही धुँधली हो जाती है। हालाँकि छोटे बच्चों में दीर्घकालिक अल्प-पोषण में कमी आई है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर चार में से एक बच्चा - 162 मिलियन बच्चे - अभी भी विकास में रुकावट होने से प्रभावित होता है। बेशक, मातृक और बाल मृत्यु दर में कई लाख की कमी हुई है, लेकिन रोकी जा सकने वाली ये मौतें अभी भी हर साल हज़ारों-लाखों महिलाओं और बच्चों का जीवन हर रही हैं।

इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र फ़ाउंडेशन ने रिपोर्ट किया है कि 222 मिलियन महिलाएँ अभी भी सबसे बुनियादी जानकारी, उत्पादों, और सेवाओं तक पहुँच प्राप्त नहीं कर पाती हैं जिनसे उन्हें यह तय करने में मदद मिले कि उन्हें कितने बच्चे पैदा करने चाहिए और अपने गर्भधारण के समय को इस तरीके व्यवस्थित करें जिससे उनके स्वास्थ्य की रक्षा हो सके, वे शिक्षा प्राप्त कर सकें, और अपने जीवन को बेहतर बना सकें। इसी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि हर साल 15-19 आयु वर्ग की 300,000 से ज़्यादा लड़कियों और महिलाओं की गर्भावस्था से संबंधित जटिलताओं की वजह से मृत्यु हो जाती है, जबकि अनेक अशक्तता संबंधी असमर्थताओं से जूझने के लिए बच जाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव की 2013 की रिपोर्ट "सभी के लिए गरिमा का जीवन" में यह सुनिश्चित करने के लिए सार्वभौमिक कार्यक्रम के लिए आह्वान किया गया है कि कोई भी छूट न जाए। लेकिन लाखों लोग - और ख़ास तौर से महिलाएँ – पहले ही पीछे छूट चुकी हैं। और, क्योंकि दुनिया के नेता और उनके विकास साझेदार एक बार फिर से महिलाओं की बुनियादी प्रजनन-स्वास्थ्य की ज़रूरतें पूरा करने में विफल रहे हैं, इसलिए स्थायी विकास के लिए कार्यक्रम को साकार करने की दिशा में ठोस प्रगति हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

मिलेनियम विकास लक्ष्यों (MDGs) की समाप्ति के लिए 500 दिन की उलटी गिनती शुरू होने पर गति में तेज़ी लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र का अपना आह्वान इस तथ्य को उजागर करता है कि असमानता, प्रसव से मातृक मृत्यु दर, सार्वभौमिक शिक्षा की कमी, और पर्यावरण ह्रास संबंधी गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

सही मायने में बदलाव लाने के लिए – और केवल महिलाओं के लिए ही नहीं - हमें परिवार नियोजन, महिलाओं और बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच के लिए वैश्विक समर्थन, और सशक्तीकरण की पहल के लिए समर्थन की ज़रूरत है। शिक्षित महिला खुद का बेहतर ढंग से ख्याल रख सकती है, जानकारी-युक्त विकल्प चुन सकती है, और अपने समुदाय के लिए अपने योगदान को व्यापक बना सकती है। जब हम महिलाओं को पीछे छोड़ देते हैं, तो हम उनके समुदायों को भी पीछे छोड़ देते हैं।

इस पर कोई विवाद नहीं है कि विकास समावेशी और न्यायोचित होना चाहिए। कूटनीतिक प्रस्तावों में जो चीज़ नदारद है, वह है सरकारों और विकास साझेदारों को मानव अधिकारों जैसे उदात्त आदर्शों - ख़ास तौर से स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं तक पहुँच के अधिकार - को व्यावहारिक समाधानों का रूप देने के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए मजबूत बुनियादी ढाँचा होना।

जब 2015 के बाद के सतत विकास कार्यक्रम का प्रारूप तैयार किया जा रहा है, तो दुनिया के नेताओं और उनके विकास साझेदारों को नए लक्ष्य निर्धारित करने से परे सोचने की ज़रूरत है जो समय के साथ धुँधले हो जाते हैं, और यह सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेही तंत्र, प्रक्रियाओं और प्रणालियों की स्थापना की ओर बढ़ने की ज़रूरत है कि हम वे लक्ष्य पूरे करें जो हमने पहले ही निर्धारित किए हुए हैं।

हमें उन नेताओं के लिए वर्तमान अलिखित "शून्य जवाबदेही" की संहिता को छोड़ना होगा जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहमति के लक्ष्यों को अपनी खुद की प्रतिबद्धताओं का पालन करने में विफल रहते हैं। संक्षेप में, हमारी सरकारों को वह करना शुरू करना चाहिए जिसका उन्होंने वायदा किया है। जब हम अधिकाधिक ख़तरनाक समय की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जवाबदेही के मजबूत तंत्र के बिना, रोकी जा सकने वाली मातृक-मृत्यु को समाप्त करना और सतत और उचित विकास को बढ़ावा देना हमसे दूर रहेगा।