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युद्ध से रोजगार तक

ऑक्सफ़ोर्ड - इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि संघर्ष के दूरगामी नकारात्मक प्रभाव होते हैं, इसका प्रभाव रोजगार पर भी पड़ता है। लेकिन संघर्ष और रोजगार में परस्पर संबंध की जो प्रचलित धारणा है उसमें इस संबंध की जटिलता को पूरी तरह से मान्यता नहीं दी जाती है - यह एक ऐसी कमी है जो कमजोर देशों में रोजगार की प्रभावी नीतियों को नजरअंदाज करती है।

पारंपरिक ज्ञान की बात यह है कि संघर्ष से रोजगार नष्ट होते हैं। इसके अलावा, चूंकि बेरोजगारी से अधिक संघर्ष को इसलिए प्रोत्साहन मिल सकता है कि बेरोजगार युवा लोगों को हिंसक आंदोलनों में औचित्य और आर्थिक लाभ नजर आते हैं, रोजगार सृजन करना संघर्षोपरांत नीति का केंद्रीय हिस्सा होना चाहिए। लेकिन, यद्यपि यह निश्चित रूप से तर्कसंगत लगता है, परंतु जैसा कि मैंने 2015 के एक लेख में उल्लेख किया था, यह जरूरी नहीं है कि ये धारणाएं पूरी तरह से सही हों।

पहली धारणा - कि हिंसक संघर्षों से रोजगार नष्ट होते हैं - में इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया जाता है कि हर संघर्ष अनूठा होता है। 2008-2009 के श्रीलंकाई गृह युद्ध जैसे कुछ संघर्ष अपेक्षाकृत छोटे से क्षेत्र में केंद्रित होते हैं जिससे देश के अधिकतर भाग - और इस तरह अर्थव्यवस्था - अप्रभावित रहते हैं।

यहाँ तक कि कांगो में बार-��ार होनेवाले स्थानिक संघर्षों की तरह के संघर्षों का शुद्ध रोजगार पर भारी असर नहीं भी पड़ सकता है। फिर भी, उदाहरण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में या वस्तुओं के निर्यातकों के यहां नष्ट होनेवाले रोजगारों की काफी हद तक भरपाई सरकार और विद्रोही सशस्त्र बलों में होनेवाले नए रोजगारों से हो सकती है, आयातों, और नशीली दवाओं के उत्पादन और तस्करी जैसे अवैध कार्यकलापों का स्थान अनौपचारिक उत्पादन ले सकता है।

इसी तरह, दूसरी धारणा - कि बेरोजगारी हिंसक संघर्ष का एक प्रमुख कारण है - में महत्वपूर्ण सूक्ष्म अंतरों की अनदेखी की जाती है। शुरूआत के लिए, अधिकतर संघर्ष-प्रभावित देशों में कुल रोजगार में औपचारिक क्षेत्र का अंश बहुत मामूली होता है। काम करनेवाले अधिकतर लोग अनौपचारिक क्षेत्र में होते हैं जो अक्सर कम महत्वपूर्ण, कम उत्पादकता, और कम आय वाले कार्यकलापों में लगे होते हैं जो बेरोजगारी की ही तरह, असंतोष पैदा कर सकते हैं और संभावित रूप से युवा लोगों को हिंसक आंदोलनों में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

इसे देखते हुए, औपचारिक क्षेत्र में मात्र रोजगार का विस्तार करना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि इससे कम आय वाले और अनौपचारिक क्षेत्र की नौकरियों में युवा लोगों की स्थिति में भी सुधार न हो। फिर भी संघर्षोपरांत रोजगार नीतियों में लगभग हमेशा अनौपचारिक क्षेत्र की उपेक्षा की जाती है। इससे भी बदतर, नए नियमों के कारण - जैसे फ्रीटाउन, सिएरा लियोन में वाणिज्यिक बाइकिंग पर प्रतिबंध लगाना - कभी-कभी युवाओं द्वारा की जा रही उत्पादक अनौपचारिक गतिविधियों पर रोक लग जाती है।

लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना भी अपर्याप्त है, क्योंकि अनुसंधान से यह पता चलता है कि गरीबी और उपेक्षा अपने आप में, संघर्ष पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं। अगर वे होते, तो सबसे गरीब देशों में अधिकतर समय संघर्ष होता रहता। और किसी भी तरह से ऐसी स्थिति नहीं है।

हिंसक संघर्ष तब होता है जब नेता इसके लिए अपने अनुयायियों को संगठित करने के लिए प्रेरित होते हैं। यह प्रेरणा विविध स्रोतों से उत्पन्न हो सकती है, जिसमें सबसे सामान्य स्रोत सत्ता से अलग होना है। ऐसे मामले में, नेता लोग अनुयायियों को संगठित करने के लिए किसी सामान्य पहचान के लिए अपील करेंगे, उदाहरण के लिए, मध्य पूर्व में समकालीन संघर्षों में यह धर्म, या कई अफ्रीकी संघर्षों में जातीयता था।

बेशक, संगठित होने के लिए मात्र साझा पहचान से कुछ अधिक की जरूरत होती है। लोग आम तौर पर केवल तभी प्रतिक्रिया दिखाएंगे अगर उन्हें पहले से ही शिकायतें होंगी - विशेष रूप से, अगर उन्हें लगता है कि उनके समूह को संसाधनों और रोजगार के अवसर हासिल करने में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इस अर्थ में, रोजगार प्रासंगिक तो होता है, लेकिन इसमें रोजगार का समग्र स्तर इतना महत्वपूर्ण नहीं होता है जितना कि धार्मिक या जातीय समूहों के बीच अच्छी नौकरियों का वितरण।

दूसरे शब्दों में, नौकरियों के आवंटन पर ध्यान दिए बिना मात्र अधिक नौकरियों के अवसरों का सृजन करने से तनाव कम नहीं हो सकते हैं; यदि असंतुलन जारी रहता है तो नौकरियों के सृजन से हालात और भी बदतर हो सकते हैं। फिर भी संघर्षोपरांत रोजगार नीतियों में लगभग हमेशा तथाकथित "क्षैतिज असमानताओं" की उपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए, बोस्निया और हर्जेगोविना में 1990 के दशक में वहाँ हुए युद्ध के बाद जो भारी क्षेत्रीय असंतुलन और क्षेत्रों में भेदभाव बने हुए थे उन्हें कम करने के लिए रोजगार नीतियां कुछ नहीं कर पाईं।

इन असफलताओं को देखते हुए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि समस्या के आकार की तुलना में रोजगार नीतियों के शुद्ध प्रभाव अक्सर बहुत कम होते हैं। कोसोवो और बोस्निया और हर्जेगोविना दोनों में, संघर्षोपरांत शांति बनाए रखने के प्रयासों में रोजगार सृजन को प्रमुख माना गया था। फिर भी, कोसोवो में युद्ध के समाप्त होने के छह साल बाद भी वहां बेरोजगारी 45% थी। बोस्निया में, नए कार्यक्रमों से सिर्फ 8,300 नौकरियों का सृजन हुआ, जबकि 4,50,000 लोगों की नौकरियां चली गई थीं; संघर्ष समाप्त होने के 20 साल बाद बेरोजगारी की दर 44% थी।

संकट के बाद सफल रोजगार नीति का एक उदाहरण भी है। नेपाल की सरकार ने देश के गृह युद्ध के बाद, सबसे अधिक वंचित क्षेत्रों और जातियों को लक्षित करके बुनियादी सुविधाओं का निर्माण करने, लघु ऋण जारी करने, और प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करनेवाले कार्यक्रमों को लागू करके अनौपचारिक क्षेत्र में अवसरों का विस्तार करने का प्रयास किया।

संघर्ष को भड़काने में जाति और जातीय तनावों और भेदभाव की जो भूमिका रही थी, उसे देखते हुए सरकार ने विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए रोजगार योजनाएं बनाईं, ये भारत की उस रोजगार योजना पर आधारित थीं जिसमें प्रति परिवार को 100 दिनों के काम की गारंटी दी जाती है। ये कार्यक्रम नेपाली सरकार और बाहरी दाताओं द्वारा समर्थित थे, और इनमें अधिक गरीब क्षेत्रों और गांवों (और, उनमें से भी, सबसे गरीब जातियों) पर ध्यान केंद्रित किया गया था।

संघर्ष के तुरंत बाद की अवधि बहुत नाजुक होती है। नेताओं को इस अवसर का अधिकतम लाभ उठाना चाहिए, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे जिस भी नीति का अनुसरण करें वह यथासंभव प्रभावी हो। जब बात रोजगार की होती है, तो इसका अर्थ होता है कि ऐसे कार्यक्रम तैयार किए जाएं जिनसे यह प्रतिबिंबित हो कि लोग वास्तव में अपने काम के जीवन को कैसे बसर करते हैं, साथ ही तनावों को पैदा करनेवाली वास्तविक शिकायतों के समाधान के संबंध में कार्रवाई की जानी चाहिए। अन्यथा, वे संगठित हिंसा को चाहे प्रोत्साहित न भी करें, पर उसे होने देने का जोखिम तो उठाते ही हैं।