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प्रतिजैविकों का समझदारी से उपयोग करना

लंदन – प्रतिसूक्ष्मजीवों (एंटीमाइक्रोबियल) के प्रतिरोध की समस्या के समाधान के लिए, दुनिया को न केवल नई दवाओं की आवश्यकता है बल्कि इसके लिए हम सभी सात अरब लोगों का व्यवहार भी नया होना चाहिए। प्रतिजैविकों के गलत और आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल की वजह से, निमोनिया और तपेदिक जैसी आम संक्रामक बीमारियों के वर्तमान इलाजों में भी प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है, कुछ मामलों में तो वे पूरी तरह से रोगक्षम हो गए हैं।

यह खतरा वैश्विक स्तर पर है। रिव्यूऑन एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की समीक्षा) के अनुसार, जिसका मैं अध्यक्ष हूँ, दवा-प्रतिरोधी संक्रमण रोगों से हर साल कम-से-कम 7,00,000 लोग मारे जाते हैं। 2050 तक यदि इस समस्या के समाधान के लिए कुछ नहीं किया गया तो संभवतः हर साल लगभग एक करोड़ लोग इन व्याधियों से मर जाएँगे, जबकि कभी इनका इलाज संभव था।

एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध से लड़ने के लिए स��न्वित प्रतिक्रिया के रूप में नई दवाओं को विकसित करना एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं होगा।  हमें प्रतिजैविकों की अपनी माँग को भी कम करना होगा और यह समझना होगा कि उनसे कुछ अच्छा होने की बजाय नुकसान ही अधिक हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में प्रतिजैविकों के लिए दी जा रही डॉक्टरी पर्चियों में से लगभग आधी अनुचित और गैर-ज़रूरी होती हैं। इसलिए प्रतिजैविकीय प्रतिरोध में भारी वृद्धि होने पर कोई हैरत नहीं होनी चाहिए।

इस ढर्रे को बदलने के लिए महत्वपूर्ण है कि समस्या को समझने की लोगों की सोच में सुधार लाया जाए। अधिकतर लोग या तो एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के प्रति पूरी तरह असावधान हो गए हैं या उनकी यह गलत धारणा है कि व्यक्ति विशेष का शरीर ही उस दवा का प्रतिरोध करता है न कि खुद जीवाणु। प्रतिजैविकों का प्रयोग कब और कैसे प्रभावी रूप में किया जाए, इसकी बेहतर समझ होने पर ही लोग ज़िम्मेदारी से इसका इस्तेमाल कर पाएँगे।

हमें ऐसे अभियानों की ज़रूरत है जैसा ऑस्ट्रेलियाई धर्मार्थ संस्था एनपीएस मेडिसिनवाइज़ ने आरंभ किया था, जिसमें उन्होंने प्रतिजैविकों के इस्तेमाल के बारे में लोगों में जागरूकता लाने के लिए वीडियो बनाने की प्रतियोगिता का आयोजन किया था। इसके परिणामस्वरूप लघु व्यंग्यात्मक फिल्मों की शृंखलाएँ बनने लग गईं, जिनमें बहुत ही आम लेकिन मज़ाकिया तरीके से बताया जाता था कि प्रतिजैविकों का किस तरह गलत इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस तरह के प्रयास विश्वभर में होने चाहिए, खासकर विशाल और तेज़ी से विकसित होने वाले देशों में। ब्रिक देशों - ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन - में अमेरिका की तुलना में प्रतिजैविकों की प्रति व्यक्ति खपत काफी कम होती है। लेकिन जैसे-जैसे इन देशों के आर्थिक विकास में तेज़ी आ रही है, उनमें प्रतिजैविकों की खपत दर में भी तेज़ी से वृद्धि हो रही है।

निराशावादी तो मानकर चलेंगे ही कि व्यवहार को बदलना बहुत कठिन होता है, खास तौर पर तब जब जीवाणु-विज्ञान के बारे में अशिक्षित श्रोताओं को सिखाने की बात हो। इस सोच के कारण निम्न आय वाले देशों के मरीज़ों को एचआईवी की दवा किफ़ायती दरों पर उपलब्ध कराने के बारे में सबसे घृणित यही तर्क दिमाग में आता है: अफ्रीका के लोगों के पास घड़ी तो होती नहीं, इसलिए वे एंटीरेट्रोवायरल दवा दिन में तीन बार नहीं ले सकेंगे।

जैसा कि शोधकर्ताओं ने बताया है, सच तो यह है कि अफ्रीकी लोग एंटीरेट्रोवायरल चिकित्सा का पालन बहुत ईमानदारी से करने में पूरी तरह सक्षम हैं - कई बार तो उत्तरी अमेरिका के लोगों से भी ज़्यादा। वास्तव में, जुलाई में यूएनएआईडीएस ने घोषणा की थी कि 2015 के अंत तक डेढ़ करोड़ लोगों को जीवन रक्षक एचआईवी चिकित्सा सेवा देने का लक्ष्य निश्चित समयावधि से बहुत पहले ही पूरा कर लिया गया है।

हर साल 1 दिसंबर को, विश्व एड्स दिवस पर इस मुद्दे को प्रमुखता दी जाती है और वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा दिया जाता है।  हमें इसी तरह की कोशिशें एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की शंकाओं को दूर करने की दिशा में भी करनी होंगी। यूँ तो, 18 नवंबर को आयोजित किए जानेवाले यूरोपीय एंटीबायोटिक जागरूकता दिवस से एक अच्छी शुरूआत हुई है, लेकिन इस संदेश को फैलाने के लिए हमें और नए, रचनात्मक तरीके खोजने होंगे।

प्रौद्योगिकी के नवोन्मेष के कारण लोगों तक सीधे पहुँचने के लिए अभूतपूर्व अवसर मिलने लगे हैं। लगभग 95% चीनी और 75% भारतीय नियमित तौर पर मोबाइल फ़़ोन का इस्तेमाल करते हैं। जिन क्षेत्रों में साक्षरता दर ऊँची है, वहाँ संदेश के प्रचार-प्रसार के लिए लिखित संदेशों को भेजना त्वरित और प्रभावी तरीका हो सकता है। यूरोप और अमेरिका में की गई शोध से पता चलता है कि 90% लिखित संदेश पहुँचने के तीन मिनट के भीतर ही पढ़ लिये जाते हैं।

सोशल मीडिया लाखों लोगों तक पहुँचने का एक और ताकतवर और अपेक्षाकृत सस्ता साधन है। विश्व के सबसे बड़े इंटरनेट आधारवाले देश चीन में, 6410 लाख लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं - 80% डॉक्टर व्यावसायिक प्रयोजनों के लिए स्मार्ट फ़ोन का उपयोग करते हैं, जिसमें सोशल मीडिया के ज़रिए चिकित्सीय सलाह देना भी शामिल है, कुछ चिकित्सकों के तो लाखों अनुगामी भी हैं। आम लोगों को एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की आवश्यकता के बारे में प्रशिक्षित करने के लिए इन मेडिकल सोशल-मीडिया सुपरस्टारों को सूचीबद्ध करने का काम एक जबर्दस्त अवसर सिद्ध हो सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा धूम्रपान के विरोध में चलाए गए सोशल मीडिया अभियान को भी एक अनुकरणीय आदर्श माना जा सकता है। चीनी सेलीब्रेटीज़ की पोस्टों का उपयोग इनडोर सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान विरोधी कानून के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए किया गया।

दुनिया के कुछ हिस्सों में, दवा प्रतिरोध का मुकाबला करने का सबसे बढ़िया तरीका यही होगा कि व्यवहार में इस तरह से बदलावों को बढ़ावा दिया जाए जिनसे संक्रामक रोगों को बढ़ने से रोका जा  सके और उपचार की आवश्यकता को कम किया जा सके। सही तरीके से हाथों को धोना एकदम सही शुरूआत है। भारत में, सुपर अम्मा नामक एक सूझबूझपूर्ण अभियान चलाया गया था - जिसमें लोगों को हाथ धोने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए गंदगीवाले स्थानों पर काम करनेवाले लोगों की तस्वीरों का उपयोग किया गया था। यह अभियान इतना सफल हुआ कि संबंधित समूहों में नियमित रूप से हाथ धोनेवाले लोगों की संख्या 1% से बढ़कर लगभग 30% हो गई।

वैश्विक स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के खतरे के प्रति जागरूकता पैदा करने की लागत, नई दवाओं और प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिए खर्च की जानेवाली लागत की तुलना में नगण्य होगी, जबकि किसी भी सूरत में उनके उपलब्ध होने में अभी सालों लग जाएँगे। देशों को चाहिए कि वे शैक्षणिक अभियानों के ज़रिये लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने पर ज़ोर दें। हम सब मिलकर, अपनी खराब प्रतिजैविक आदतों को बदल सकते हैं।