Shell Oil drilling platform Tom Doyle/Flickr

पेरिस में जलवायु-परिवर्तन का तमाशा

ओटावा – दिसंबर में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में हॉलीवुड की किसी सुपरहिट फिल्म की तरह सभी नाटकीय तत्व मौजूद होंगे। इसमें ढेरों कलाकार होंगे: सभी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मुख्य मंच पर विराजमान होंगे, और उनका साथ देने के लिए सहयोगी कलाकारों के रूप में हजारों प्रदर्शनकारियों, दंगा पुलिस और मीडिया की बसों का भारी हुजूम होगा। इसकी पटकथा भले ही अभी तक गुप्त हो, लेकिन इसका कथानक पहले से ही जगज़ाहिर हो चुका है: 2009 में कोपेनहेगन में विफल रही वार्ताओं के बिल्कुल विपरीत, इस बार इस धरती को अवश्य सफलता मिलेगी।

यह कथानक आकर्षक तो है, लेकिन इसका निर्वाह करना मुश्किल है। दुनिया को यह बताया जाएगा कि सद्भावना और कठोर सौदेबाज़ी रंग लाई है। सरकारें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में स्वैच्छिक कटौतियाँ करने के लिए सहमत हो गई हैं जिससे धरती को 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म होने से रोका जा सकेगा। फिर विलक्षण यांत्रिक रूप से प्रकट दैवी शक्ति से यह रहस्योद्धाटन होगा कि दुनिया की जीवाश्म ईंधन की सबसे बड़ी कंपनियाँ अर्थात तथाकथित महाशक्तियाँ इस पर सहमत हो गई हैं कि वे कार्बन को स्रोत पर पकड़कर, इसे वायुमंडल से बाहर निकालकर, और इसका भूमिगत भंडारण करके शुद्ध उत्सर्जनों को 2100 तक शून्य पर ले आएँगी। इस प्रकार धरती को बचा लिया जाएगा, और अर्थव्यवस्था फलने-फूलने के लिए मुक्त होगी। संगीत आरंभ होने के साथ पटाक्षेप हो जाएगा।

समस्या यह है कि यह कहानी वास्तविक नहीं, बल्कि काल्पनिक है। इसके लिए अपेक्षित प्रौद्योगिकी का आविष्कार अभी किया जाना बाकी है, और शुद्ध उत्सर्जनों को शून्य तक लाना कदापि संभव नहीं है। और, हॉलीवुड की फ़िल्म की तरह, पेरिस सम्मेलन का संदेश उन लोगों के द्वारा अत्यधिक प्रभावित किया हुआ होगा जिनके पास सबसे अधिक धन है।

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