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वैश्विक स्वास्थ्य के तीन ख़तरे

सैन फ्रांसिस्को – पश्चिमी अफ़्रीका में इबोला के गंभीर प्रकोप ने राष्ट्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत बनाने की अनिवार्यता को उजागर किया है। हालाँकि इबोला ने दुनिया का ध्यान प्रणालीगत कमियों पर केंद्रित किया है, लेकिन यहाँ लक्ष्य उन स्थायी महामारियों का मुकाबला करने पर होना चाहिए जो दुनिया भर में लोगों को चुपचाप मृत्यु और दुख के आगोश में ले रही हैं।

इबोला निस्संदेह बहुत भारी व्यथा का कारण बना है। लेकिन यह पहली – या सबसे अधिक विनाशकारी महामारी नहीं है - जिसका दुनिया ने सामना किया है। वास्तव में, चेचक को मानवता के लिए सबसे भयंकर रोग के रूप में जाना जाता रहा है; जब तक एडवर्ड जेनर ने 1796 में इसके लिए टीका विकसित नहीं कर लिया, तब तक यह यूरोप में मृत्यु का प्रमुख कारण बना रहा। एक अनुमान के अनुसार 1980 में इसके उन्मूलन से पहले, इसने 300-500 मिलियन लोगों की जान ले ली थी।

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चौदहवीं सदी के ब्यूबोनिक प्लेग ने 75-100 मिलियन लोगों की जान ली थी - यह संख्या यूरोप की जनसंख्या के आधे से ज़्यादा थी। 1918 की इन्फ़्लूएंजा महामारी के दौरान लगभग 75 मिलियन लोगों, या दुनिया की आबादी के 3-5%, की मृत्यु बस कुछ ही महीनों में हो गई थी - जो प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या से दुगुनी थी।

दुन���या लगातार एचआईवी/एड्स से संघर्ष कर रही है, जिसके कारण अब तक 40 मिलियन से ज़्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है और आज इसने इतने ही लोगों को संक्रमित किया हुआ है, और इस महामारी के शिकार 95% लोग विकासशील देशों के रहनेवाले हैं। एचआईवी/एड्स के लिए अत्यधिक प्रभावी रेट्रोवायरल-रोधी उपचार केवल तभी विकसित किए गए जब ये रोग उन्नत देशों में लोगों को प्रभावित करने लगे - ये ऐसे उपचार हैं जिन तक रोग से पीड़ित ज़्यादातर ग़रीब लोगों की पहुँच नहीं है या जो उसका ख़र्च बर्दाश्त नहीं कर सकते।

इसी प्रकार, इबोला के प्रकोप के प्रति सरकारों, बहुपक्षीय संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों की काफ़ी तत्परता से प्रतिक्रिया करने में विफलता इस तथ्य को दर्शाती है कि इस रोग ने ग़रीब देशों को ही तबाह किया है। लेकिन, दुनिया के अभूतपूर्व ढंग से जुड़े होने के समय में, यह सुनिश्चित करने में हर किसी की हिस्सेदारी है कि ऐसी महामारी पर कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियाँ और संरचनाएँ मौजूद हों। इसे प्राप्त करने के लिए अपेक्षित निवेश उपलब्ध करने की ज़रूरत है; आखिरकार, रोग के प्रकोपों के ख़िलाफ़ रक्षा की पहली पंक्ति प्रभावी राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियाँ और निगरानी की चुस्त व्यवस्था है।

वर्तमान में, इबोला केवल स्वास्थ्य का संकट ही नहीं है, बल्कि यह मानवीय, आर्थिक और राजनीतिक संकट भी है। निश्चित तौर पर, कुछ प्रगति तो हुई है। इबोला आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के मिशन की “70/70/60” योजना – 70% इबोला रोगियों को अलग-थलग करना और यह सुनिश्चित करना कि 70% अंत्येष्टियाँ 60 दिन के भीतर सुरक्षित रूप से कर दी जाती हैं – को अधिकांशतः लागू कर दिया गया है, जिससे नए मामलों की संख्या में काफी हद तक कमी हुई है। लेकिन लोग अभी भी इससे पीड़ित हैं और मर रहे हैं – यह अकसर विश्वसनीय जानकारी तक पहुँच या पर्याप्त उपचार न होने के कारण होता है।

बेशक, जब लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा की बात आती है, तो जनता की रक्षा करने और व्यक्तिगत अधिकारों के अतिक्रमण के बीच महीन अंतर होता है। यही कारण है कि जन-स्वास्थ्य के सभी उपायों को सर्वप्रमुख रूप से वैज्ञानिक तथ्यों पर फ़ोकस करना चाहिए, और भावनात्मक या घबराहट की प्रतिक्रियाओं से बचना चाहिए।

इस संदर्भ में, इबोला प्रभावित देशों से यात्रियों को अनिवार्य रूप से अलग-थलग करना स्पष्ट रूप से नीति की विफलता थी - ठीक वैसे ही जैसे तब हुआ था जब अधिकारियों ने 1350 में यूरोप की ब्लैक डेथ को या 1665 में लंदन के प्लेग को सीमित करने की कोशिश की थी। भय-आधारित रणनीतियों पर समय बर्बाद करने के बजाय, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को तथ्य-आधारित, ठोस, और सामूहिक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए मानव और वित्तीय संसाधनों का लाभ उठाना चाहिए। ऐसा संयुक्त उपाय संभव है; वास्तव में, यह पहले भी हुआ है।

सदी बदलने पर, एड्स, क्षय रोग, और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक कोष, बिल और मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन, और GAVI, वैक्सीन एलायंस जैसी संस्थाओं की स्थापना, वैश्विक स्वास्थ्य में नए सिरे से सुधार के लिए प्रयासों के साथ हुई। संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता – जिनमें पोषण, मातृ और शिशु स्वास्थ्य, और संक्रामक रोगों को शामिल करने वाले, स्वास्थ्य संबंधी चार लक्ष्य शामिल हैं - दुनिया भर के स्वास्थ्य में सुधार करने के लिए राजनीतिक सहमति परिलक्षित करती है। इस संस्थागत संरचना ने इनमें से अनेक क्षेत्रों में काफ़ी प्रगति करने में सुविधा दी है; उदाहरण के लिए, 1990 के बाद से पाँच साल से कम उम्र में मृत्यु दर 49% तक कम हो गई है।

लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। दक्षिण पूर्व एशिया और उप सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और संक्रामक रोग प्राथमिकताएँ बने हुए हैं। वास्तव में, उच्चतम बाल मृत्यु दर वाले जो दस देश हैं वे सभी उप-सहारा अफ्रीका में स्थित हैं; पश्चिम अफ्रीका में पैदा हुए किसी बच्चे के पश्चिमी यूरोप में पैदा हुए बच्चे की तुलना में एक से पाँच साल की उम्र से पहले मरने की 30 गुना अधिक संभावना होती है।

यहां तक कि देशों के भीतर, भारी असमानता बनी हुई है। उदाहरण के लिए, ग्युरेरो और नुएवो लिओन के मैक्सिकन राज्यों में नगरपालिकाओं के बीच शिशु मृत्यु दर में दस गुना अंतर है।

इसके अलावा, विशेष रूप से कम आय वाले देशों में, शहरीकरण, लोगों की उम्र बढ़ने, मोटापे, आलस्यपूर्ण जीवन शैली, धूम्रपान करने और शराब पीने जैसी शहरी प्रवृत्तियों के फलस्वरूप अनिर्दिष्ट महामारियों के आक्रमण ने पुराने गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) की वृद्धि को बढ़ावा दिया है। अधिकांश देशों में वयस्कों के लिए, कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग विकलांगता और मौत के प्रमुख कारण बन गए हैं।

इबोला जैसे उभरते संक्रामक रोग अधिक प्रतिरोधक हो सकते हैं, लेकिन पुराने गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) का स्वास्थ्य पर पड़नेवाला प्रभाव, उनकी उच्च और बढ़ती सामाजिक और आर्थिक लागतों के अलावा है, काफी अधिक है। और अधिक समय बर्बाद नहीं किया जा सकता। नीति निर्माताओं को तंबाकू, शराब, और मोटापा बढ़ानेवाले खाद्य पदार्थों की खपत जैसे जोखिम वाले कारकों के प्रसार को रोकने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए।

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दुनिया को तीन तरह की स्वास्थ्य चुनौती का सामना करना पड़ रहा है: हमें ऐसी धारणीय राष्ट्रीय और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों का निर्माण करना चाहिए जो इबोला जैसे संकटों के बारे में जल्दी और प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया कर सकते हैं; संक्रामक रोगों को समाप्त करना चाहिए या उन पर नियंत्रण करना चाहिए; और पुराने गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) की चुपचाप बढ़ती महामारी से निपटने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए। इन तीनों मोर्चों पर सफल होने के लिए, हमें स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे, प्रबंधन, और कार्मिकों में निरंतर निवेश करने की जरूरत है।

इसका हल समानता है। इसका मतलब यह है कि स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा तक पहुँच में सुधार किया जाए। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि उन गंभीर सामाजिक विषमताओं के संबंध में कार्रवाई की जाए जिनका विस्तार सार्वजनिक स्वास्थ्य की कार्य-सूची से बाहर है। 2015 के बाद के विकास लक्ष्यों को तैयार करते समय, दुनिया के नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि स्वास्थ्य एक बुनियादी मानव अधिकार है।