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दलाई लामा के बाद तिब्बत

नई दिल्ली - 1959 से भारत में निर्वासन में रह रहे 14 वें दलाई लामा के 80 वें जन्मदिन पर, तिब्बत का भविष्य पहले से कहीं अधिक अनिश्चित लग रहा है। अपने शासनकाल के दौरान, मौजूदा दलाई लामा ने अपनी मातृभूमि को – जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा पठार है - चीन के हाथों अपनी आज़ादी को खोते हुए देखा है। उनकी मृत्यु के बाद, इस बात की संभावना है कि चीन उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी कठपुतली को बिठा देगा, जिससे संभवतः यह संस्था धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।

चीन ने पहले से ही, 1995 में तिब्बतियों के नियुक्त किए गए छह वर्षीय बालक का, जिसकी दलाई लामा ने कुछ ही समय पहले पुष्टि की थी, अपहरण करके अपने मोहरे पंचेन लामा को तिब्बती बौद्ध धर्म में दूसरे सबसे ऊँचे स्थान के लिए नियुक्त किया था। बीस साल बाद, वास्तविक पंचेन लामा अब दुनिया के सबसे लंबे समय तक सज़ा काटने वाले राजनीतिक कैदियों में शुमार है। चीन ने तिब्बतियों के तीसरे सर्वोच्च धार्मिक व्यक्ति, करमापा को भी नियुक्त किया था; लेकिन 1999 में, 14 साल की उम्र में वह भागकर भारत आ गया था

Aleppo

A World Besieged

From Aleppo and North Korea to the European Commission and the Federal Reserve, the global order's fracture points continue to deepen. Nina Khrushcheva, Stephen Roach, Nasser Saidi, and others assess the most important risks.

यह वर्ष तिब्बत के लिए एक और सार्थक सालगिरह अर्थात चीन के तथाकथित "तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र" की स्थापना की 50वीं वर्षगाँठ का अवसर है। यह नाम अत्यधिक भ्रामक है। वास्तव में, तिब्बत का शासन चीन करता है, और इसके ऐतिहासिक क्षेत्र में से आधे क्षेत्र को अन्य चीनी प्रांतों में शामिल कर लिया गया है।

1950-1951 में तिब्बत पर अपनी विजय के साथ, चीन ने अपने भूभाग में एक तिहाई से ज़्यादा की बढ़ोतरी कर ली थी और एशिया के भू-रणनीतिक परिदृश्य को मूल रूप से बदल दिया था। चीन भारत, नेपाल, और भूटान का पड़ोसी बन गया, और इसने इस क्षेत्र की प्रमुख नदी प्रणालियों पर नियंत्रण कर लिया। पानी से समृद्ध तिब्बत में उत्पन्न होने वाली नदियाँ दुनिया के दो सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों, चीन और भारत, साथ ही अफ़गानिस्तान से वियतनाम तक जाने वाली देशों की चाप की मदद करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

चीन के लिए, दलाई लामा की 437-साल-पुरानी संस्था पर कब्ज़ा करना तिब्बत पर अपनी पकड़ हासिल करने के लिए अंतिम क़दम प्रतीत होता है। आखिरकार, भारत भाग आने के बाद दलाई लामा - तिब्बत के वास्तविक राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता (हालाँकि 2011 में उन्होंने अपनी राजनीतिक भूमिका निर्वासन में लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सर���ार को सौंप दी थी) - तिब्बत पर चीनी नियंत्रण के प्रतिरोध का सार्वजनिक चेहरा रहे हैं। तथापि, हाल के सालों में, चीन ने अधिकाधिक देशों को दलाई लामा को स्वीकार न करने पर मजबूर करने के लिए अपने बढ़ते प्रभाव का इस्तेमाल करके - जो राजनयिक और आर्थिक मुसीबत के ख़तरे पर टिका है - उनकी अंतर्राष्ट्रीय दृश्यता को कम किया है।

चीन की सरकार 2007 में वरिष्ठ लामाओं पर सरकारी अनुमति के बिना अवतार निर्धारित करने पर प्रतिबंध लगानेवाला फ़रमान जारी करने के बाद, वास्तव में वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु का इंतज़ार कर रही है ताकि वह उनका उत्तराधिकारी चुनने के लिए अपने स्वयंभू अनन्य अधिकार का इस्तेमाल कर सके। लगता है कि चीन के नेताओं को नास्तिक सरकार द्वारा आध्यात्मिक नेता चुनने की असंगतता से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है। यह वैसा ही है जैसे मुसोलिनी ने दावा किया था कि कार्डिनल्स का कॉलेज नहीं, बल्कि केवल वह ही पोप की नियुक्ति कर सकता है।

वृद्ध होते दलाई लामा ने अपनी आत्मा के भविष्य के नियोजन के लिए विभिन्न अपरंपरागत संभावनाओं - महिला के रूप में अवतार की स्थापना से लेकर अपने जीवन-काल में ही अपने उत्तराधिकारी का नामकरण करने तक - पर सार्वजनिक रूप से चर्चा की है। इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया है कि अगला दलाई लामा "मुक्त दुनिया" में मिलेगा, और इस तरह संकेत किया है कि वे तिब्बती निर्वासित के रूप में या भारत के तवांग जिले में अवतार लेंगे जहाँ सत्रहवीं सदी में छठे दलाई लामा का जन्म हुआ था।

ऐसी घोषणाओं ने 2006 के बाद से चीन को भारत के पूरे अरुणाचल प्रदेश राज्य पर "दक्षिण तिब्बत" के रूप में दावा करने, और भारत पर लंबे समय से विवादित हिमालय सीमा पर वार्ताओं में उस राज्य में स्थित तवांग ज़िले के कम-से-कम एक हिस्से को त्यागने के लिए दबाव डालने के लिए अभिप्रेरित किया है। लेकिन जिस घोषणा ने चीन को सबसे ज़्यादा क्रोधित किया है, वह दलाई लामा द्वारा पिछले वर्ष दिसंबर में की गई यह घोषणा थी कि वे आखिरी दलाई लामा होंगे।

चीन जानता है कि इस बात की पूरी उम्मीद है कि अशांत तिब्बत, जिसने काफ़ी हद तक चीन की ओर से नियुक्त किए गए पंचेन लामा को धोखा कहकर उसकी निंदा की है, उसके द्वारा चुने गए दलाई लामा को स्वीकार नहीं करेगा। अगर दलाई लामा स्वयं अपने पुनर्जन्म के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर देते हैं, तो इसकी और भी कम संभावना होगी कि तिब्बती लोग चीन की नियुक्ति को स्वीकार करेंगे। सवाल यह है कि दलाई लामा ऐसा करने में संकोच क्यों कर रहे हैं।

दलाई लामा की मृत्यु हो जाने पर सबसे बड़ा जोखिम तिब्बत में चीन के दमन का हिंसक प्रतिरोध है। आज की स्थिति के अनुसार, अहिंसा और समझौते के प्रति दलाई लामा की प्रतिबद्धता का उदाहरण उनके "बीच के रास्ते" के दृष्टिकोण में देखा जा सकता है, जिसका लक्ष्य तिब्बत की स्वायत्तता हासिल करना है, आज़ादी नहीं – इस प्रतिबद्धता से यह सुनिश्चित करने में मदद मिल रही है कि चीन के शासन के प्रति तिब्बती प्रतिरोध शांतिपूर्ण बना रहे और उसमें प्रकट रूप से अलगाववाद न हो।

दरअसल, पिछले 60 सालों में, तिब्बतियों ने प्रतिरोध के आंदोलन का ऐसा मॉडल अपनाया है, जिस पर आतंकवाद के साथ किन्हीं संबद्धताओं का दाग नहीं है। यहाँ तक कि तिब्बत की धार्मिक, सांस्कृतिक, और भाषायी विरासत के प्रति चीन का दमन अधिकाधिक कठोर होने पर भी, तिब्बतियों ने हथियार नहीं उठाए हैं। इसके बजाय, उन्होंने आत्मदाह के माध्यम से विरोध किया है, जो 2009 के बाद से 140 तिब्बतियों ने किया है।

लेकिन, जब मौजूदा दलाई लामा नहीं रहेंगे, तो हो सकता है कि यह दृष्टिकोण जारी न रहे। युवा तिब्बती पहले से ही चीन के क्रूर तरीकों से हताश महसूस कर रहे हैं जिनमें दलाई लामा की संबंधों को सुधारने की पहल के बारे में हाल के श्वेत पत्र में चीन की तीक्ष्ण प्रतिक्रिया भी शामिल है । इस पृष्ठभूमि में, चीन द्वारा "फर्ज़ी" दलाई लामा नियुक्त किए जाने के परिणामस्वरूप स्वायत्तता की माँग करने वाला शांतिपूर्ण आंदोलन आज़ादी के लिए हिंसक भूमिगत संघर्ष में बदल सकता है।

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यह देखते हुए कि वास्तविक दलाई लामा छोटा बच्चा होगा, और इसलिए वह प्रतिरोध के आंदोलन के लिए मज़बूत नेतृत्व प्रदान करने के काबिल नहीं होगा, इस तरह के परिणाम की और भी ज़्यादा संभावना होगी। चीन ने तिब्बत पर आक्रमण और कब्जा करने के लिए ऐसी ही स्थिति का फ़ायदा तब उठाया था जब मौजूदा दलाई लामा केवल 15 साल के थे।

1933 में 13वें दलाई लामा के निधन के बाद, नेता-विहीन तिब्बत राजनीतिक साज़िश से तब तक ग्रस्त रहा था, जब तक 1950 में मौजूदा दलाई लामा को औपचारिक रूप से गद्दी पर नहीं बिठा दिया गया था। तिब्बती पदानुक्रम में सत्ता का अगला शून्य दलाई लामा के वंश की समाप्ति कर सकता है और तिब्बत को हिंसक भविष्य की ओर धकेल सकता है, जिसके परिणामों का विस्तार इस विशाल पठार से बहुत आगे तक जा सकता है।