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यूरोप की यूक्रेनी जीवनरेखा

न्यूयार्क. पिछले सप्ताहांत में सम्पन्न हुए यूरोपीय संसद एवं यूक्रेन के राष्ट्रपति चुनावों में बेहद विरोधाभासी नतीजे मिले हैं. यूरोप के मतदाताओं ने जहां यूरोपीय संघ के कामकाज के तौरतरीकों पर अपना असंतोष जाहिर किया है वहीं यूक्रेन की जनता ने यूरोपीय संघ से जुड़े रहने की अपनी इच्छा पर मोहर लगाई है. यूरोप के नेताओं को और नागरिकों को इस अवसर का उपयोग यह जानने के लिए करना चाहिए कि इसके क्या निहितार्थ है और यह भी कि यूक्रेन की मदद कर कैसे वे खुद यूरोप की मदद कर सकते हैं.

यूरोपीय संघ की स्थापना के पीछे मूलरूप से यह विचार था कि संप्रभु राष्ट्रों के एकजुट होने से वे आपसी हितों को बेहतर ढंग से साध सकेंगे. अंतर्राष्ट्रीय प्रशासन तथा कानून के शासन में यह एक निडर प्रयोग था जिसका उद्देश्य था राष्ट्रीयतावाद का प्रतिस्थापन और बल का समुचित उपयोग.

दुर्भाग्यवश यूरो संकट से यूरोपीय संघ बिलकुल ही अलग निकाय में बदल गया. आपसी सहयोग की भावना की जगह कर्जदाता और कर्जदार का संबंध पनपने लगा जिसमें कर्जदाता देश अपनी शर्तें थोपने लगे और अपना दबदबा कायम करने लगे. यूरोपीय संसद के चुनाव में कम मतदान के मद्देनजर अगर इटली के प्रधानमंत्री मैट्टियो रेन्जी को मिले समर्थन के साथ यूरोपीय संघ के विरोधी दक्षिण व वामपंथी मतों को भी मिला दिया जाए तो कहा जा सकता है कि अधिकांश नागरिक वर्तमान परिस्थितियों के विरोध में हैं.

एक ओर जहां अंतर्राष्ट्रीय सरकार बनाने की दिशा में किया गया यूरोप का उदार प्रयोग लड़खड़ा रहा है वहीं रूस यूरोपीय संघ के खतरनाक प्रतिद्वंदी के तौर पर उभर रहा है. उसकी विश्व स्तर पर भौगोलिक और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं और उन्हें पूरा करने के लिए वह बल प्रयोग करने का भी इच्छुक है. पुतिन अपने शासन को मजबूत बनाने के लिए नस्लीय राष्ट्रीय विचारधारा का इस्तेमाल कर रहे हैं. पिछले महीने रूसी रेडियो कार्यक्रम डा��रेक्ट लाइन में बोलते हुए उन्होंने रूसी लोगों के अनुवांशिक गुणों का गुणगान किया था. क्रीमिया को यूक्रेन से हथिया लेने के बाद वे अपने देश में लोकप्रिय हो गए हैं और विश्व में अमेरिका की धमक को कम करने के अपने प्रयास में वे चीन से हाथ मिला रहे हैं. उनके इन कदमों पर बाकी दुनिया में सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है.