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विश्व बैंक के लिए नया मिशन

वाशिंगटन, डीसी - आर्थिक विकास के इतिहास में हरित क्रांति को महान सफलताओं में से एक माना जाता है। 1960 के और 1970 के दशकों के बाद, अधिक उपज देने वाली अनाज की किस्मों को तैयार करने और उन्हें अपनाए जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था का रूपातंरण हो गया था और इसने विकासशील दुनिया के ज़्यादातर भागों में अरबों लोगों को भुखमरी से बचा लिया था।

लेकिन आज, हरित क्रांति के लिए जिम्मेदार संस्था – दुनिया भर में 15 अनुसंधान केन्द्रों का कंसोर्शियम जिसे अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह (CGIAR) कहा जाता है – का भविष्य खतरे में है। विश्व बैंक, जो इसके प्रमुख वित्तपोषकों में से एक है, अपना वित्तीय समर्थन वापस लेने पर विचार कर रहा है।

अपने आप में, यह निर्णय पर्याप्त चिंता का विषय है। CGIAR का मिशन वैश्विक खाद्य सुरक्षा है, और बुनियादी कृषि अनुसंधान में दुनिया के गरीबों को आर्थिक लाभ प्रदान करने की विशाल संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक बात विश्व बैंक द्वारा यह संकेत दिया जाना है कि वह अब कम वित्तपोषित वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं का और समर्थन नहीं करेगा जो पिछली शताब्दी की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति का संरक्षण करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

CGIAR की प्रस्तावित कटौतियाँ विश्व बैंक के अपने प्रशासनिक बजट को $400 मिलियन कम करने के प्रयासों का हिस्सा हैं - जो संगठन के अध्यक्ष, जिम योंग किम द्वारा 2013 में किया गया संकल्प है। विश्व बैंक फ़िलहाल CGIAR को $50 मिलियन का वार्षिक अनुदान दे रहा है जिसमें $20 मिलियन की कटौती की जाएगी, और कुछ वर्षों की अवधि में पूरी राशि संभवतः चरणबद्ध रूप में समाप्त कर दी जाएगी।

अपने आप में, इसमें शामिल पैसा दोनों में से किसी भी संगठन के लिए बहुत-ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं होगा। जिन आँकड़ों पर चर्चा हो रही है, वे विश्व बैंक के दानकर्ताओं द्वारा वैश्विक गरीबी से लड़ने और कम आय वाले देशों को सहायता प्रदान करने में मदद करने के लिए 2013 में प्रतिबद्ध की गई $52 मिलियन की राशि की तुलना में बहुत छोटी है। CGIAR के लिए, प्रस्तावित कटौतियाँ कष्टकर तो होंगी, लेकिन विनाशकारी नहीं होगी; 2013 में, समूह ने अपनी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए $984 मिलियन खर्च किए थे।

अभी भी, विश्व बैंक – जो विशिष्ट महत्व की वैश्विक विकास संस्था है – वास्तव में यह घोषणा कर रहा है कि कृषि अनुसंधान विकास की प्राथमिकता नहीं है। निश्चित रूप से, CGIAR का वित्तपोषण एकमात्र ऐसा वित्तपोषण नहीं है जो जोखिम में है। विश्व बैंक वैश्विक विकास नेटवर्क को अपने छोटे लेकिन उत्प्रेरक अंशदानों में भी कटौतियाँ करने पर विचार कर रहा है, जो विकासशील देशों में शोधकर्ताओं को वित्त प्रदान करता है। खनन उद्योग पारदर्शिता पहल के लिए इसका समर्थन भी जोखिम में है, जो भ्रष्टाचार को कम करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित सौदों के प्रकटीकरण को बढ़ावा देती है, साथ ही उष्णकटिबंधीय रोगों में अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम के लिए किया जा रहा इसका वित्तपोषण भी जोखिम में है। ये कार्यक्रम, और दूसरे कार्यक्रम, विश्व बैंक की विकास अनुदान सुविधा द्वारा समर्थित हैं जिसे प्रशासनिक बजट में कटौतियों के संभावित स्रोत के रूप में लक्षित किया गया है।

विकास से संबंधित वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के प्रावधान के समर्थन के लिए विश्व बैंक द्वारा उपलब्ध कराया गया पैसा कभी भी इसके खर्च का बड़ा भाग नहीं बना। CGIAR और अन्य अनुदान प्राप्तकर्ताओं के समर्थन के लिए वर्ष में मोटे तौर पर $200 मिलियन का इसका खर्च, 2012 में इसके द्वारा दिए गए $35 बिलियन के ऋण की तुलना में बहुत कम है। लेकिन प्रस्तावित कटौतियाँ विश्व बैंक की गतिविधियों के उस क्षेत्र को समाप्त कर देंगी, जिसका विस्तार कियाजाना चाहिए, न कि कम किया जाना चाहिए।

सच्चाई यह है कि विश्व बैंक की स्थापना पर इसकी कल्पना वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं पर काम करने वाली संस्थाओं को अनुदान देने वाली संस्था के रूप में नहीं की गई थी। इसका प्रमुख मिशन था - और अभी भी है – सरकारों को ऋण और तकनीकी सहायता प्रदान करना। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि सरकारी ऋण, निजी निवेश, और प्रवासियों द्वारा प्रेषणों की तुलना में, इक्कीसवीं सदी में विकासशील देशों के वित्त के संबंध में विश्व बैंक की प्रासंगिकता बहुत अधिक कम हुई है।

क्योंकि विश्व बैंक के ऋण या गारंटियाँ विशेषज्ञता और सलाह के साथ जुड़े होते हैं, इसलिए इसके पास अभी भी एक व्यवहार्य उत्पाद उपलब्ध है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले तर्क दिया है, इसके पास एक और उत्पाद होना चाहिए। दुनिया की प्रमुख और एकमात्र पूरी तरह वैश्विक विकास संस्था होने के रूप में यह इस स्थिति में है - और वास्तव में इसकी ज़िम्मेदारी है कि यह वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के प्रबंधन में प्रायोजन, वित्तपोषण, और प्राथमिकताएं तय करने में मदद करे।

अब समय है कि विश्व बैंक की सदस्य सरकारों में से कोई एक या अधिक सरकारें इस मुद्दे को उठाएँ। हाल ही में इबोला महामारी के बारे में संगठन की त्वरित प्रतिक्रिया वैश्विक चिंताओं पर कार्रवाई करने की इसकी क्षमता का प्रभावशाली उदाहरण पेश करती है। इसके अलावा, इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय समुदाय स्थायी विकास लक्ष्यों पर सहमत होगा – ये ऐसे लक्ष्य हैं जो कृषि अनुसंधान और विकास, भूमि और जल के उपयोग को इष्टतम करने के प्रयासों, और वानिकी संरक्षण जैसे क्षेत्रों में निवेश द्वारा भली-भाँति प्राप्त किए जा सकेंगे।

जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, और चीन के निकट सहयोग से, संयुक्त राज्य अमेरिका को इस संबंध में विश्व बैंक के लिए स्पष्ट जनादेश प्रदान करने में सक्षम होना चाहिए। विश्व बैंक का बीसवीं सदी का मिशन - देशों को उनके विकास के वित्तपोषण में मदद करना - निकट भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा। लेकिन विश्व बैंक के पास विकास के लिए मूल पूर्व-आवश्यकताओं में से एक -वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं का सावधानीपूर्वक प्रबंधन और संरक्षण करना - पर अधिक जोर देकर अपना ध्यान  इक्कीसवीं सदी पर केंद्रित करने का अवसर भी है।