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महिलाओं के अधिकार और प्रथागत अन्याय

सिएटल – महिलाओं को दुनिया के अधिकतर हिस्सों में जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है वह उनके कानूनी अधिकारों और व्यक्तियों के रूप में उनके बारे में दावा करने की उनकी क्षमता के बीच अंतराल है। राष्ट्रीय संविधानों में लैंगिक समानता की गारंटी देने की संभावना बहुत अधिक बढ़ती जा रही है, लेकिन बहुत से संविधान प्रथा, धर्म, या जातीय संबद्धता पर आधारित समानांतर कानूनी प्रणालियों के अधिकार को भी स्वीकार करते हैं। और, दुर्भाग्यवश, दुनिया के कई हिस्सों में कानून बदलते समय के साथ नहीं बदला है।

सौभाग्य से, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं इस अंतराल पर नज़र रख रही हैं। 1999 और 2000 में, दो युवा तंज़ानियाई दर्जिनों को, जिनकी शादी तेरह से उन्नीस वर्ष की आयु में हो गई थी और उनके चार बच्चे होने के बाद वे बीस से उनतीस वर्ष की आयु में विधवा हो गई थीं, उनके जातीय समूह के विरासत के प्रथागत कानून के तहत उनको अपने घरों से बेदखल कर दिया गया था। उन प्रथागत कानूनों के तहत मृतक की संपत्ति में से उसके परिवार की महिला सदस्यों की तुलना में पुरुष रिश्तेदारों के दावे का हिस्सा अधिक होता है, और आम तौर पर पत्नियों को पूरी तरह वंचित रखा जाता है और बेटियों को बहुत कम हिस्सा दिया जाता है। तंज़ानिया के इन दोनों मामलों में, स्थानीय अदालतों ने यह निर्णय दिया कि उस महिला की मेहनत से प्राप्त आय से खरीदी गई वस्तुओं सहित जिस संपत्ति को महिला ने अपने पति के साथ साझा किया था, वह उसके देवर के पास जानी चाहिए।

युवा विधवा दर्जिनें अपने बच्चों के साथ बेघर हो गईं, लेकिन उन्होंने अपनी बेदखली को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। तंज़ानिया के महिला कानूनी सहायता केंद्र और जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय महिला मानवाधिकार क्लीनिक - जिसका मैं पहले निर्देशन करती थी - की मदद से उन्होंने तंज़ानिया के उच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती दी। 2006 में, उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विरासत संबंधी प्रथागत कानून "कई तरह से भेदभावपूर्ण" थे, लेकिन उसने इनमें बदलाव करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि ऐसा करने का मतलब "हमारे 120 कबीलों के विवेकशील दिखाई देने वाले रिवाजों के भानुमती के पिटारे को खोलना होगा" जिसे कानूनी चुनौती दिए जाने का खतरा है।

ये महिलाएं अपने मामले को अंततः संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गईं, जहां उहोंने अब दुनिया भर की लाखों महिलाओं की समानता के लिए एक ऐतिहासिक जीत हासिल की है। तंज़ानिया महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन (सीईडीएडब्ल्यू) और उसके प्रोटोकॉल का समर्थक देश है। ��सी कारण ये दोनों महिलाएं अपनी शिकायत उस समिति के पास ले जा पाईं जो इस संधि के कार्यान्वयन के लिए राज्यों के अनुपालन की स्थिति को देखती है।