UN troops in South Sudan UN Photo/ZumaPress

क्या संयुक्त राष्ट्र के लिए 70 साल बहुत हैं?

न्यूयॉर्क - जहां दुनिया भर के नेता अगले सप्ताह सतत विकास के नए लक्ष्यों का अनुमोदन करने और संयुक्त राष्ट्र की सत्तरवीं वर्षगांठ मनाने के लिए न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में जमा होने वाले हैं, वहीं बहुत से लोगों के मन में एक ऐसा मौलिक सवाल है जिससे बचा नहीं जा सकता। बढ़ती वैश्विक अव्यवस्था - मध्यपूर्व में उपद्रव, यूरोप में लहरों पर सवार होकर आनेवाले प्रवासियों की भीड़, और अपने भौगोलिक दावों को लागू करने की चीन की एकतरफ़ा मुहिम सहित - के मद्देनज़र क्या संयुक्त राष्ट्र का कोई भविष्य है?

निराशावाद के आधारों से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि विश्व व्यवस्था के समर्थकों से अप्रभावित रहकर टकराव उग्र रूप धारण कर रहे हैं। दो दशक से भी अधिक की बातचीत के बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता (चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य) आज भी 2015 के नहीं, बल्कि1945 के भौगोलिक-राजनीतिक यथार्थ को प्रतिबिंबित करती है। ब्रेटन वुड्स की संस्थाओं (विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष) में जगह दिए जाने से इनकार कर दिए जाने के बाद चीन ने अपनी आर्थिक पकड़ के अनुरूप अपने खुद के विकल्प तैयार कर लिए हैं जिससे जुड़ने के लिए दूसरे देशों की भरमार लगी है। जी-20 सुरक्षा परिषद से कहीं अधिक प्रतिनिधित्व करनेवाला दिखाई पड़ता है और उसमें साझा उद्देश्य कहीं अधिक समाविष्ट हैं।

इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र को बट्टे खाते में नहीं डाला जाना चाहिए। यह एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पूरा करता आ रहा है और इसका इतिहास बताता है कि इक्कीसवीं सदी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए उसमें नई जान डाली जा सकती है।

To continue reading, please log in or enter your email address.

To access our archive, please log in or register now and read two articles from our archive every month for free. For unlimited access to our archive, as well as to the unrivaled analysis of PS On Point, subscribe now.

required

Log in

http://prosyn.org/jlLyVsG/hi;