Dalai Lama kris krüg/Flickr

दलाई लामा के बाद तिब्बत

नई दिल्ली - 1959 से भारत में निर्वासन में रह रहे 14 वें दलाई लामा के 80 वें जन्मदिन पर, तिब्बत का भविष्य पहले से कहीं अधिक अनिश्चित लग रहा है। अपने शासनकाल के दौरान, मौजूदा दलाई लामा ने अपनी मातृभूमि को – जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा पठार है - चीन के हाथों अपनी आज़ादी को खोते हुए देखा है। उनकी मृत्यु के बाद, इस बात की संभावना है कि चीन उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी कठपुतली को बिठा देगा, जिससे संभवतः यह संस्था धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।

चीन ने पहले से ही, 1995 में तिब्बतियों के नियुक्त किए गए छह वर्षीय बालक का, जिसकी दलाई लामा ने कुछ ही समय पहले पुष्टि की थी, अपहरण करके अपने मोहरे पंचेन लामा को तिब्बती बौद्ध धर्म में दूसरे सबसे ऊँचे स्थान के लिए नियुक्त किया था। बीस साल बाद, वास्तविक पंचेन लामा अब दुनिया के सबसे लंबे समय तक सज़ा काटने वाले राजनीतिक कैदियों में शुमार है। चीन ने तिब्बतियों के तीसरे सर्वोच्च धार्मिक व्यक्ति, करमापा को भी नियुक्त किया था; लेकिन 1999 में, 14 साल की उम्र में वह भागकर भारत आ गया था

यह वर्ष तिब्बत के लिए एक और सार्थक सालगिरह अर्थात चीन के तथाकथित "तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र" की स्थापना की 50वीं वर्षगाँठ का अवसर है। यह नाम अत्यधिक भ्रामक है। वास्तव में, तिब्बत का शासन चीन करता है, और इसके ऐतिहासिक क्षेत्र में से आधे क्षेत्र को अन्य चीनी प्रांतों में शामिल कर लिया गया है।

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