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युद्ध और शांति के लिए एक अर्थशास्त्री का मार्गदर्शन

न्यू यॉर्क – आज की सुर्खियाँ संघर्ष के समाचारों से भरी होती हैं: चाहे यह सीरिया का गृहयुद्ध हो, यूक्रेन में सड़क पर लड़ाइयाँ हों, नाइजीरिया में आतंकवाद हो, ब्राज़ील में पुलिस की कार्रवाइयाँ हो, हिंसा की भीषण तात्कालिकता बहुत साफ़ नज़र आती है। लेकिन, हालाँकि टिप्पणीकार भू-रणनीतिक सावधानियों, निवारण, जातीय संघर्ष, और इनमें फँसने वाले आम लोगों की दुर्दशा पर चर्चा करते हैं, लेकिन संघर्ष के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू अर्थात इसकी आर्थिक लागत  पर निष्पक्ष चर्चा शायद ही कभी होती है।

हिंसा की मोटी क़ीमत होती है। 2012 में हिंसा पर काबू पाने या उसके परिणामों से निपटने की वैश्विक लागत चौंका देने वाले स्तर $9.5 खरब पर पहुँच गई थी (जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 11% है)। यह वैश्विक कृषि क्षेत्र की लागत के दुगुने से ज़्यादा है और विदेशी सहायता पर कुल ख़र्च इसकी तुलना में बहुत ही कम है।

इन भारी राशियों को देखते हुए, नीति निर्धारकों के लिए यह अनिवार्य है कि वे इसका विश्लेषण करें कि इस पैसे का ख़र्च कहाँ और कैसे किया जाता है, और इसकी कुल राशि को कम करने के तरीकों पर विचार करें। दुर्भाग्य से, इन सवालों पर शायद ही कभी गंभीरता से विचार किया गया हो। काफ़ी हद तक, इसका कारण यह है कि सैन्य अभियान आम तौर से भू-रणनीतिक सरोकारों से अभिप्रेरित होते हैं, वित्तीय तर्कों से नहीं। यद्यपि इराक युद्ध के विरोधी संयुक्त राज्य अमेरिका पर आरोप लगा सकते हैं कि उसकी नज़र देश के तेल-क्षेत्रों पर थी, पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह अभियान ख़र्चीला था। वियतनाम युद्ध और अन्य संघर्ष भी वित्तीय विनाश ही थे।

इसी तरह के संदेह शांतिकाल के दौरान हथियारों पर किए जानेवाले ख़र्च पर किए जा सकते हैं। उदाहरण के ���िए, हम शायद ऑस्ट्रेलिया द्वारा समस्या-ग्रस्त संयुक्त स्ट्राइक लड़ाकू विमानों की ख़रीद पर $24 अरब ख़र्च करने के हाल के फ़ैसले के वित्तीय तर्क पर सवाल उठा सकते हैं जबकि वह इसी के साथ देश को दशकों के सबसे कठोर बजट के लिए तैयार कर रहा था।