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श्रीलंका की शांति को बहाल करना

कोलंबो - ऐसे युद्ध या क्रांति को जीतना, जिसका परिणाम केवल बाद की शांति खोना हो, हमारे समय की गंभीर राजनीतिक सच्चाइयों में से एक है। इराक में, सद्दाम हुसैन के शासन पर तुरंत सैन्य विजय ने जल्दी ही विद्रोह, गृह युद्ध, और हिंसक इस्लामी राज्य के उभरने का मार्ग प्रशस्त किया। लीबिया, सीरिया, यमन, और दूसरी जगहों पर, अरब स्प्रिंग द्वारा पैदा की गई उम्मीदें इसी तरह अक्सर-हिंसक बनने वाली निराशा में बदल गईं।

आज, अपने 36-साल के गृह युद्ध के अंत के आधा-दशक बाद, श्रीलंका के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर है कि वह अपने खुद के प्रयासों से शांति स्थापित करे और इसके दीर्घकालिक लाभों को प्राप्त करे । नव-निर्वाचित राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना, और प्रधानमंत्री के रूप में, मैं उस शांति को हासिल करने, और अपने देश को वैसा बनने में मदद करने के लिए कटिबद्ध हैं जैसा उसे हमेशा होना चाहिए था: लोकतंत्र, सभ्यता, और मुक्त समाज का समृद्ध एशियाई द्वीप।

असफल शांति के जोखिम अब प्रकट हो रहे हैं, क्योंकि, 2009 से, जब तमिल टाइगर्स के साथ युद्ध, हिंसा के बड़े सैलाब में समाप्त हुआ था, तो राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के नेतृत्व वाली पूर्व सरकार ने हमारे तमिल नागरिकों के साथ सुलह के बारे में केवल अधूरे मन से ही कोशिशें की थीं। युद्ध से तबाह हुए तमिल ज़िलों, और साथ ही सालों की लड़ाई और आतंकवाद से क्षतिग्रस्त हमारे समाज के अन्य भागों का पुनर्निर्माण, मुश्किल से शुरू ही हुआ है।

यह उपेक्षा राजपक्षे की जानीबूझी रणनीति का हिस्सा थी, जिन्हें श्रीलंका को लगभग युद्ध की स्थिति में, और हमारे तमिल नागरिकों को व्यथित और अलग-थलग रखने में, अपना कठोर शासन बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका दिखाई देता था। हालाँकि उनकी फूट डालो राज करो की रणनीति कुछ समय तक तो सफल हुई, जिसमें उन्हें अभूतपूर्व मात्रा में सत्ता को अपने हाथों में केंद्रित करने का मौका मिला, लेकिन उससे हमारे सामाजिक विभाजनों और सतत दरिद्रता की सच्चाई नहीं छिप सकी। इसलिए, पिछली जनवरी में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में, सिरिसेना ने सभी धर्मों और जातियों के श्रीलंकाइयों के गठबंधन की विजय के साथ दुनिया को दंग कर दिया जो अपने लोकतंत्र का पुनर्निर्माण करना चाहते हैं, दमनशील शासन की राह पर नहीं चलना चाहते।