2

पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण

इस्लामाबाद, पिछले महीने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ग्रीन टेम्पलटन कालेज के इग्रोव पार्क में वार्षिक ‘इमर्जिंग मार्केट सिम्पोजियम’ का आयोजन किया गया. इस साल का विषय ‘मां-शिशु का स्वास्थ्य और पोषण’ रखा गया. प्रस्तुति के अंत में जीटीसी के स्टीफन कैनेडी ने कार्टून चित्र द्वारा दो बच्चों को दर्शाया, जो दौड़ के मैदान में खड़े हैं. जहां एक बच्चा बेहद स्वस्थ और ताकतवर नजर आ रहा है वहीं दूसरा बच्चा बेहद कमजोर और बीमार दिखाई देता है. स्टीफन का संदेश एकदम स्पष्ट है कि हर मनुष्य जीवन की शुरु  आत सफलता से नहीं करता.

हालांकि यह निष्कर्ष पूर्ण नहीं है. गरीबी, अशिक्षा, घरेलू स्थिति जैसी सभी चीजें बच्चे के स्वास्थ्य को प्रभावित कर न सकती हैं. इन सभी कारणों से हटकर और कम चर्चित एक बेहद अहम कारण भी है -- या हो सकता है ‘मातृक पोषण’.

Chicago Pollution

Climate Change in the Trumpocene Age

Bo Lidegaard argues that the US president-elect’s ability to derail global progress toward a green economy is more limited than many believe.

वैसे चर्चा ‘प्रकृति’ और ‘परवरिश’ पर हो रही थी जो मनुष्य के विकास को आकार देती है. पहले के समय में भी माता के स्वास्थ्य और ऊर्जा को देखकर ही आने वाले पीढ़ी के स्वास्थ्य का आकलन कर लिया जाता था. गरीबी और अज्ञानता इसके मूल कारण के रूप में देखा जा सकता है.

वैसे ‘कुपोषण की शिकार’ महिलाओं में पाया गया है कि शिशु मृत्यु दर, रोगों के प्रति अति संवेदनशीलता, संक्रमण अधिक होता है और पोषण की कमी अजन्मे बच्चे के बुरे स्वास्थ्य को प्रदर्शित करती है. पोषण की अधिक कमी से मोटापा, मधुमेह और अन्य बीमारियां बच्चे का किशोरावस्था में ही हो सकती हैं.

सिम्पोजियम में दुनियाभर से आये 47 प्रतिभागियों ने दिखाया कि अधिकतर लोग इस बात से अनभिज्ञ थे कि मां के पोषण का उसकी आने वाली संतान पर गहरा असर पड़ता है. अध्ययन में यह देखकर भी अचरज हुआ कि बच्चे का अच्छा या बुरा स्वास्थ्य उसकी परवरिश और मां के पोषण जैसा ही होता है.

विज्ञान के लिए यह एक बड़ी हार है कि इस विषय का अभी तक कोई पुख्ता आधार मौजूद नहीं है. कार्यक्रम देखने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी कबूल किया कि उन्हें इस विषय पर इतनी अधिक जानकारी नहीं थी जो अब मिली है.

सभा के प्रतिभागियों ने वादा किया कि मातृक और शिशु स्वास्थ्य में बेहतर योगदान किया जाएगा जो कि अहम भी है. मां का स्वास्थ्य न केवल बच्चे के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी प्रभावित करता है. मां का खराब स्वास्थ्य अस्वस्थ भविष्य का आईना है. बीमार मां एक बीमार बेटी को जन्म देगी. बुरे पोषण से ग्रस्त वह बच्ची बड़ी होकर जब खुद मां बनेगी तो आगे की पीढ़ी को भी प्रभावित करेगी.

आशांवित होने की बात यह है कि इस अवस्था के निवारण भी हैं. सही तरह के नियम लागू करके जिसमें शिक्षण, विटामिन युक्त आहार की योजनाएं आदि शामिल हों बनाकर इस क्षेत्र में योगदान किया जा सकता है.

इस तरह के कदम को सरकारी योजनाओं का साथ मिलाना एक अच्छी पहल है. ब्राजील के एक टीवी कार्यक्रम में दिखाया गया कि फोलिक एसिड कैसे ‘स्पाइना बाइफिडा’ (जिसमें रीढ़ की हड्डी विकसित नहीं होती) बीमारी को खत्म करने में सक्षम है. इस कार्यक्रम ने कई राजनेताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.

Fake news or real views Learn More

लोगों में पोषण संबंधी जागरूकता के प्रसार के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है. महिलाओं में टीवी सीरियल द्वारा जागरूकता बढ़ाई जा सकती है.

‘इमर्जिंग मार्केट सिम्पोजियम’ जैसी जनसभाएं ऐसे अंतर को मिटाने का बेहतरीन प्रयास है. अब जरूरत है राजनेताओं द्वारा ऐसी योजनाओं को लागू करवाने की.