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बांग्लादेश की कट्टरपंथी चुनौती

नई दिल्ली – फ़रवरी में, ढाका विश्वविद्यालय में आयोजित पुस्तक मेले से लौटते हुए, अपनी नास्तिकता के लिए प्रसिद्ध बांग्लादेशी-अमेरिकी ब्लॉगर अविजित रॉय और उनकी पत्नी को उनके रिक्शे से घसीट लिया गया और उन पर धारदार हथियारों से कातिलाना हमला किया गया। यह पुस्तक मेला हिंसा के प्रति सामान्य बंगाली प्रतिक्रिया है, जो 1952 के उस विरोध प्रदर्शन की याद में हर साल आयोजित किया जाता है, जिसकी परिणति पाकिस्तानी सेना द्वारा विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों पर गोलीबारी करने के रूप में हुई थी। नाज़ी नेता हरमन गौरिंग की कुख्यात उक्ति को पलट दिया जाए, तो कह सकते हैं कि जब बंगाली "गन" शब्द सुनते हैं, तो वे अपनी संस्कृति तक पहुँच जाते हैं।

लेकिन रॉय की क्रूर हत्या (उनकी पत्नी अपंग हो गईं, लेकिन बच गईं) - के मुश्किल से एक महीने बाद दूसरे नास्तिक ब्लॉगर, वशीकुर रहमान को घातक ढंग से छुरा घोंपा जाना - बांग्लादेश में एक और शक्ति के काम करने का खुलासा करती है, वह जो देश की धर्मनिरपेक्षता और बौद्धिक बहस की परंपरा को नष्ट कर देना चाहती है। यह शक्ति है, सलाफ़िस्ट इस्लामी कट्टरवाद

बांग्लादेश में बदलाव बहुत कठोर है। रॉय और वशीकुर के काम में परिलक्षित होने वाली अप्रासंगिक धर्मनिरपेक्षता और विचारशील पड़ताल लंबे समय तक बंगाली लेखन की विशेषता रही है। एक पीढ़ी पहले, उनके विचारों को बंगाल (जिसका पश्चिमी भाग भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल है) की अगर मुख्यधारा नहीं, तो जीवंत बौद्धिक संस्कृति में, पूरी तरह स्वीकार्य माना गया होता।

लेकिन अब यह सच नहीं रह गया है। विदेश से भारी वित्त-पोषण द्वारा समर्थित, सलाफ़िस्ट कट्टरवाद – इस्लाम का असहिष्णु संस्करण जो शताब्दियों से भारत में चले आ रहे ज़्यादा उदार सूफी-प्रभावित रूप से भिन्न है - हाल के सालों में समूचे बांग्लादेश में फैल रहा है। हालाँकि बंगाल की लंबी धर्मनिरपेक्ष परंपरा अभी तक जीवित और सलामत है, जिसने पाकिस्तान से अलग होने के इसके प्रयासों को संचालित किया था, लेकिन कट्टरपंथी इस्लामवादियों – जो उन लोगों को मौन करने के लिए बल का इस्तेमाल करते हैं जिनसे वे असहमत होते हैं – के विनाशकारी प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता।

रॉय और वशीकुर इस्लामवादियों के सेंसरशिप के इस विशिष्ट स्वरूप का सामना करने वाले पहले बंगाली बुद्धिजीवी नहीं हैं। 2004 में सालाना पुस्तक मेले में लेखक हुमायूँ आज़ाद एक हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। (वे तब तो बच गए थे, लेकिन बाद में उसी साल जर्मनी में उनकी मृत्यु हो गई थी।) पिछले साल, नास्तिक ब्लॉगर अहमद रजीब हैदर को, रॉय की तरह, ढाका में मौत के घाट उतार दिया गया था। इस्लामवादी कह रहे हैं कि जब आप अपने वैचारिक विरोधियों को हमेशा के लिए चुप कर सकते हैं, तो उनके साथ सैद्धांतिक बहस में पड़ने की क्या ज़रूरत है?

अनेक बांग्लादेशी बुद्धिजीवियों ने इस ख़तरे को स्पष्ट रूप से भाँप लिया है और वे देश से पलायन कर गए हैं, और इस तरह उन्होंने आत्मरक्षा की ख़ातिर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ रोज़मर्रा के संपर्क को त्याग दिया है। उपन्यासकार तस्लीमा नसरीन इस्लामी कट्टरपंथियों से मिली मौत की धमकियों से बचने के लिए 1994 में निर्वासन में चली गईं; वे अब दिल्ली में रहती हैं। पत्रकार और कवि, दाऊद हैदर, अब बर्लिन में दिन काट रहे हैं।

केवल सार्वजनिक बुद्धिजीवी ही ख़तरे में नहीं हैं। साधारण धर्मनिरपेक्ष मुसलमान जो नास्तिक हो जाते हैं, वे स्वधर्म त्याग, और इससे भी बदतर, निंदा के आरोपों के प्रति ज़्यादा असुरक्षित हो जाते हैं। पुराने दिनों में, इस तरह के आरोपों के कारण एक या दो फतवे जारी किए जा सकते थे, औरसबसे बदतर स्थिति में, उनका सामाजिक बहिष्कार हो सकता था। आज, धमकियाँ – जैसे, भीड़ भरी सड़क पर क्रूरता से हत्या कर दिया जाना – ज़्यादा असंगत रूप से बाध्यकारी हो गई हैं।

मुस्लिम-बहुल बांग्लादेश के लिए, इस्लाम के भीतर यह संघर्ष देश की आत्मा के लिए लड़ाई बनता जा रहा है। लेकिन यह पूरी तरह से नई लड़ाई भी नहीं है। बांग्लादेश ने लंबे समय से इस दावे का सामना किया है कि1947 के भारत विभाजन के तर्क के अनुसार, जिसकी वज़ह से तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान अस्तित्व में आया था, इस देश को ज्यादा इस्लामिक होना चाहिए। इस दावे का विरोध करने वाले दूसरे लोग, इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इस देश को 1971 में पाकिस्तान से अपने अलगाव की विरासत को अमल में लाना चाहिए, जो ऐसी क्रांति थी जिसने इस्लाम को राष्ट्रवाद के लिए अपर्याप्त आधार घोषित किया था और इस्लामाबाद से अपनी निष्ठा के बजाय बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति और बंगाली भाषा की प्रधानता पर ज़ोर दिया था।

यह विरोध देश की अक्सर तिक्ततापूर्ण विभाजनकारी राजनीति में भी परिलक्षित होता है। हर खेमे ने दो दुर्जेय महिला नेताओं के नेतृत्व में, बारी-बारी से सरकार को नियंत्रित करने को कोशिश की है: वर्तमान प्रधानमंत्री, अवामी लीग की शेख हसीना वाज़ेद, और उनकी दो-अवधियों की पूर्ववर्ती, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की बेगम ख़ालिदा ज़िया।

हालाँकि फ़िलहाल धर्मनिरपेक्षतावादी सत्ता में हैं, लेकिन ज़िया के पास व्यापक समर्थन बरकरार है, जिसमें इस्लामवादियों का समर्थन शामिल है। उनकी पार्टी ने पिछले चुनाव का बहिष्कार किया था, और राजनीतिक हिंसा भड़काई थी जिसकी वज़ह से इस साल 100 से ज़्यादा जानें चली गईंऔर इसके अलावा सैकड़ों लोग घायल हो गए।

हाल ही में हुई हत्याओं ने सार्वजनिक राय को भड़का दिया है, जिससे पीड़ितों के लिए न्याय और धर्मनिरपेक्षतावादी लेखकों के लिए ज़्यादा प्रभावी सरकारी संरक्षण की माँग के लिए जन प्रदर्शन हो रहे हैं। हसीना के वरिष्ठ सलाहकार, एचटी इमाम ने रॉय की हत्या पर पुलिस की निष्क्रियता के लिए उन्हें सीधे-सीधे चुनौती दी है, और शीर्ष पुलिस अधिकारियों से कहा है कि वे "अपनी छवि बनाए रखने के लिए, पुलिस बल के बीच छिपे गद्दारों की पहचान करें और उन्हें क़ानून और न्याय की प्रक्रिया में लाएँ।"

बांग्लादेश ऐसा लोकतंत्र है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थन करता है, लेकिन सीमाओं के भीतर। हालाँकि यह माना जाता है कि सरकार उदार बुद्धिजीवियों के प्रति सहानुभूति रखती है, लेकिन यह क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने और चरमपंथियों को उत्तेजित करने से बचने के लिए भी उत्सुक रहती है। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने नास्तिकों और उदारपंथियों को परेशान और गिरफ्तार करने के लिए ऐसे क़ानून का इस्तेमाल करके इस्लामवादियों का पक्ष लेने की कोशिश करने में संकोच नहीं किया है जो "धार्मिक भावनाओं को आहत करने" पर प्रतिबंध लगाता है। तथापि, इस्लामवादी चाहते हैं कि सरकार पाकिस्तान की तरह निंदा क़ानून पास करे, जिसमें धार्मिक विरोध के लिए मृत्यु दंड दिया जाता है। हालाँकि सरकार ने अभी तक इसका ज़ोरदार विरोध किया है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की इसकी कमज़ोर रक्षा से यह डर पैदा हो गया है कि निरंतर दबाव से धर्माधिकारियों के दबाव के प्रति इसका विरोध पस्त हो सकता है।

इसे ऐसा करना जारी रखना चाहिए। आज़ाद बांग्लादेश के "राष्ट्रपिता", शेख मुजिबुर रहमान जिनकी 1975 में हत्या कर दी गई थी, की बेटी - हसीना - जानती हैं कि इस्लामवादियों के साथ समझौता करने से वे कहीं की नहीं रहेंगी; वे उन्हें कभी भी स्वीकार्य नहीं होंगी। उनकी सरकार को सुशासन के नाम पर (या राजनीतिक अस्तित्व की ख़ातिर) चरमपंथियों को संतुष्ट करने के प्रलोभन का शिकार नहीं होना चाहिए।

उन सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए, जिनके लिए बांग्लादेश ने तब ख़ून बहाया था जब इसने पाकिस्तान से अपनी आज़ादी हासिल की थी। अगर हसीना हथियार-चलाने वाले इस्लामवादियों से हार मान लेती हैं, तो वे उस बांग्लादेश का बलिदान कर देंगी जिसे मुक्त कराने के लिए उनके पिता लड़े थे।