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बीमार पर कर लगाना बंद करें

वाशिंगटन, डीसी – उभरते और विकासशील देशों में किफ़ायती दवाओं तक पहुँच के बारे में होनेवाली चर्चा में अक्सर एक महत्वपूर्ण मुद्दे को अनदेखा कर दिया जाता है: इन देशों में सरकारें नेमी तौर पर जीवन के लिए महत्वपूर्ण दवाओं पर शुल्क और अन्य कर थोप देती हैं। हालाँकि इन उपायों से सामान्य राजस्व की प्राप्ति तो होती है, परंतु इनसे प्रभावित दवाएँ अधिक महँगी हो जाती हैं, जिससे ये दवाएँ उन बहुत-से लोगों के लिए पहुँच के बाहर हो जाती हैं जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

विकसित देशों की तरह, उभरते और विकासशील देश अपनी कुछ दवाएँ - अगर सभी नहीं तो - आयात करते हैं, जिनकी लागत मुख्य रूप से मरीजों द्वारा स्वयं वहन की जाती है क्योंकि इन देशों में स्वास्थ्य बीमा का अभाव है। उदाहरण के लिए, भारतीय अपने स्वास्थ्य देखभाल के व्ययों का 70% भुगतान अपनी जेब से करते हैं। कुछ क्षेत्रों में शुल्कों और अन्य करों के कारण दवाओं की लागतों में दो तिहाई जितनी अधिक की वृद्धि हो जाती है जिससे सर्वाधिक बुनियादी जेनेरिक दवाएँ भी सबसे गरीब लोगों के लिए उनकी सामर्थ्य से बाहर हो जाती हैं। दिल्ली के दवा बाजार पर एक शोध रिपोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ऐसी लेवी अनिवार्य रूप से "बीमार पर कर" के रूप में होती हैं जिन्हें सरकार आसानी से हटा सकती है।

बहुत-से उभरते बाजारों में यह कहानी इसी तरह की है। विश्व व्यापार संगठन द्वारा किए गए 2012 के अध्ययन के अनुसार अर्जेंटीना, ब्राज़ील, भारत, और रूस, आयातित दवाओं पर 10% के आसपास का शुल्क लगाते हैं, जबकि उदाहरण के लिए, अल्जीरिया और रवांडा ने 15% की दर बनाए रखी है। जिबूती में शुल्क 26% है। जैसा कि रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, यह समझना मुश्किल है कि छोटे देशों में स्वास्थ्य उत्पादों पर उच्च शुल्क क्यों रखे जाते हैं जबकि इस उपाय से केवल घरेलू कीमतों में वृद्धि होती है��

लेकिन शुल्क समस्या का एक हिस्सा मात्र हैं। कई देश भारी बिक्री कर भी लगाते हैं। ब्राज़ील पर्चे की दवाओं पर 28% की दर पर कर लगाता है, जबकि भारत में दवाओं पर 5% से लेकर 16% तक के राज्य कर लगाए जाते हैं और उन पर 5% का मूल्य वर्धित कर और 3% का शिक्षा कर भी लगाया जाता है।