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अभिसरण की तलाश में

कैम्ब्रिज - विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक पहेली यह है कि 200 सालों में, दुनिया के अमीर देश ग़रीब देशों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से विकसित हुए, जो ऐसी प्रक्रिया है जिसे लैन्ट प्रिटशेट ने ठीक ही "विचलन, काफी हद तक" के रूप में वर्णन किया है। जब एडम स्मिथ ने 1776 में द वैल्थ ऑफ़ नेशन्स पुस्तक लिखी, तो दुनिया के सबसे अमीर देश – संभवतः नीदरलैंड - में प्रति व्यक्ति आय सबसे ग़रीब देशों की तुलना में लगभग चार गुना थी। दो सदियों के बाद, नीदरलैंड चीन की तुलना में 40 गुना अमीर था, भारत की तुलना में 24 गुना अमीर था, और थाईलैंड की तुलना में दस गुना अमीर था।

लेकिन पिछले तीन दशकों से यह रुझान उलट गया है। अब नीदरलैंड भारत की तुलना में केवल 11 गुना अमीर है और चीन और थाईलैंड की तुलना में मुश्किल से चार गुना अमीर है। इस उलटफेर को पहचानकर, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री माइकल स्पेंस ने तर्क दिया है कि दुनिया अगले अभिसरण के लिए तैयार है।

लेकिन कुछ देश अभी भी विचलन कर रहे हैं। जबकि नीदरलैंड 1980 में निकारागुआ, कोट डी'आइवर, और केन्या से क्रमशः 5.8, 7.7, और 15 गुना अमीर था, लेकिन 2012 तक यह 10.5, 21.1 और 24.4 गुना अमीर हो गया।

एक अवधि में सामान्यीकृत विचलन और दूसरी अवधि में चयनात्मक अभिसरण को कौन-सा कारण स्पष्ट कर सकता है? आखिरकार, अगर दूसरों की नकल ही करनी है तो क्या फिसड्डियों को अग्रणियों की तुलना में तेज़ी से विकास नहीं करना चाहिए, यहाँ तक कि अब अप्रचलित प्रौद्योगिकियों की सहायता से छलांग लगाकर भी? वे अब तक तेज़�� से विकास क्यों नहीं कर पा रहे थे, और अब वे ऐसा कैसे कर पा रहे हैं? कुछ देश अब अभिसरण क्यों कर रहे हैं, जबकि दूसरे विचलन जारी रखे हुए हैं?