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प्रतिस्पर्धात्मक मौद्रिक सहजता को रोकना

मुंबई - जब विश्व वैश्विक आर्थिक संकट से उबरने के लिए जूझ रहा है, तो लगता है कि कई उन्नत देशों ने इसके परिप्रेक्ष्य में जो अपरंपरागत मौद्रिक नीतियाँ अपनाईं, उन्हें व्यापक स्वीकृति मिली है। परंतु जिन अर्थव्यवस्थाओं में ऋण का भार बहुत अधिक है, नीति अनिश्चित है, या ढाँचागत सुधार की आवश्यकता के कारण घरेलू माँग में बाधा उत्पन्न होती है, उनके मामले में यह प्रश्न उचित है कि क्या इन नीतियों के घरेलू लाभ अन्य अर्थव्यवस्थाओं को हुए हानिकारक अतिप्रवाह से ज़्यादा हैं।

इससे भी बड़ी समस्या यह है कि इन अतिप्रवाहों की अवहेलना करने से वैश्विक अर्थव्यवस्था जैसे को तैसा वाली अपरंपरागत मौद्रिक नीति की ख़तरनाक राह पर जा सकती है। स्थिर और धारणीय आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए, विश्व के नेताओं को मौद्रिक खेल के अंतर्राष्ट्रीय नियमों की पुनः जाँच करनी चाहिए, जिसमें उन्नत और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को समान रूप से अधिक लाभदायक मौद्रिक नीतियाँ अपनानी चाहिए।

वास्तव में, परिमाणात्मक सहजता (QE) जैसी अपरंपरागत नीतियों की भूमिका होती है; जब बाज़ार टूट चुके हों या बुरी तरह निष्क्रिय हो चुके हों, तब केंद्रीय बैंकरों के लिए ज़रूरी होता है कि नवोन्मेषी रूप से सोचें। निश्चित रूप से, 2008 में अमेरिकी निवेश बैंक लेहमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने के तुरंत बाद जो कार्रवाई की गई वह बिल्कुल सही थी, हालाँकि केंद्रीय बैंकरों के पास कोई मार्गदर्शिका नहीं थी।

लेकिन समस्याएं तब आती हैं जब इन नीतियों को बाज़ारों को ठीक करने से भी आगे लागू किया जाता है; जब अर्थव्यवस्थाएँ बुरी तरह से क्षतिग्रस्त होती हैं या उनमें गंभीर सुधार की आवश्यकता होती है तो घरेलू लाभ बेहद अस्पष्ट होते हैं, जबकि घरेलू अर्थव्यवस्था और उभरते देशों दोनों में ही इन नीतियों के फलस्वरूप होने वाले अतिप्रवाहों से मुद्रा और परिसंपत्ति-मूल्यों में अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है।