समावेशी अनिवार्यता

वाशिंगटन, डी सी – सन् 2000 में शुरू किए गए सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में अत्यधिक प्रगति हुई है. किन्तु, दुर्भाग्यवश अनेक देश इन लक्ष्यों को पूरा करने से कोसों दूर हैं. और उन देशों में भी जहां काफी प्रगति की गई है, कुछ समूह, यथा मूल निवासी, झुग्गी बस्तियों या दूर-दराज इलाकों के निवासी, धार्मिक व लैंगिक अल्पसंख्यक समुदाय तथा विकलांगता से ग्रस्त लोग, निरंतर इस प्रगति के दायरे से बाहर ही रहे हैं. जैसाकि विश्‍व बैंक की हालिया रिपोर्ट में बल दिया गया है, यह समझना कि क्यों ऐसा हुआ, भविष्य के विकास प्रयासों को अधिक प्रभावी और समावेशी बनाने के लिए अहम है.

सामाजिक व आर्थिक कटाव केवल नैतिक समस्या नहीं है; यह अत्यंत महंगा साबित होता है. 2010 की विश्‍व बैंक रिपोर्ट बताती है कि यूरोप में शै‌क्षणिक एवं आर्थिक प्रणालियों में से रोमा को बाहर रखने से सर्बिया में कम से कम 1720 लाख डॉलर का, चेक गणराज्य में 2730 लाख डॉलर का और रोमानिया में 6600 लाख डॉलर (अप्रैल 2010 की विनिमय दरों के आधार पर) की उत्पादकता का अनुमानित सालाना नुकसान हुआ.

ये नुकसान विलगाव के दूरगामी परिणामों को प्रतिबिंबित करते हैं. विश्‍व स्वास्‍थ्य संगठन और विश्‍व बैंक ने पता लगाया है कि विकलांगता से पीड़ित बच्‍चों की विद्यालयों में दाखिला लेने की संभावना सामान्य बच्‍चों के मुकाबले कम होती है और विद्यालय में उनके रुकने की दर भी कम होती है. इंडोनेशिया में विकलांग और सामान्य बच्‍चों के बीच प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लेने की दर में 60% का बड़ा अंतर है. उच्‍चतर माध्यमिक विद्यालय में यह अंतर मामुली रूप से कम हो कर 58% रह जाता है. इस तरह कटे रहने और अलग-थलग पड़ने की भावना अकसर सामाजिक तानेबाने को कमजोर करती है और अशांति व टकराव का कारण भी बन सकती है.

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