प्रवाहमान प्रवास

लंदन. सन् 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों का निर्धारण किया था. मकसद था विकास के महत्वपूर्ण उद्देश्यों यथा गरीबी उन्मूलन, लिंग समानता को बढ़ावा देना तथा बीमारियों की रोकथाम करना पर आधारित प्रगति को बढ़ावा देना. लेकिन सहस्त्राब्दि लक्ष्यों के निर्धारकों ने एक बेहद अहम मसले को नजरअंदाज कर दिया. यह था प्रवास. सौभाग्य से, ऐसा प्रतीत होता है कि विश्व नेतृत्व अब अपने 2015 के उपरांत अपनाए जाने वाले विकास एजेंडे में यह गलती नहीं दोहराएगा.

प्रवासी आबादी द्वारा अपने देशों में भेजे जाने वाले धन का विशाल पैमाना साबित करता है कि प्रवास को 2015 के बाद वाले एजेंडा में महत्वपूर्ण स्थान पाने का हकदार मानना चाहिए. पिछले साल विकासशील देशों के प्रवासियों ने लगभग 414 अरब डालर के बराबर धनराशि अपने परिवारों को भेजी थी. यह रकम आधिकारिक विकास सहायता से तीन गुना अधिक है. एक अरब से ज्यादा आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य पेय जल व स्वच्छता जैसी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए इस रकम पर आश्रित है. इसके अलावा यह धनराशि सूक्ष्म अर्थव्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण लाभ पहुंचाती है, जिससे उनके मूल देश आवश्यक वस्तुओं के आयात का भुगतान करते हैं, निजी पूंजी बाजार में पैठ बनाते हैं तथा संप्रभु ऋणों पर कम ब्याज दरों का दावा कर सकते हैं.

लेकिन उत्प्रवास के इन लाभों की लूट-खसोट होती है. पिछले साल प्रवासियों की कुल 49 अरब डालर कमाई का 9 प्रतिशत बिचौलिए हजम कर गए. प्रवासियों की कमाई का एक-तिहाई अपने पास रखने वाले कुटिल नियोक्ताओं ने भी अरबों डालर की कमाई की. इसके अलावा तस्करी, मानव ट्रैफिकिंग, शोषण और भेदभाव के चलते भी अनगिनत जानें गईं.

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