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भारत की आधिकारिक समलिंगीभीति पर काबू पाना

नई दिल्ली - दुनिया के सबसे उदार संविधानों में से एक को अंगीकार करने के छियासठ साल बाद भारत अपनी दंड संहिता के औपनिवेशिक युग के एक प्रावधान, धारा 377 को लेकर ज्वलंत बहस में डूबा हुआ है जो "किसी पुरुष, स्त्री या जानवर के साथ स्वैच्छिक रूप से ऐंद्रिक संभोग करने वाले व्यक्ति का आपराधीकरण करती है।" हालांकि इसका व्यापक स्तर पर उपयोग नहीं किया गया है – पिछले साल धारा 377 के अंतर्गत 578 गिरफ़्तारियां हुई थीं – फिर भी यह कानून भारत में यौन अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न, परेशानी और भय दोहन का साधन बना हुआ है। इसे अवश्य बदला जाना चाहिए।

लाखों समलिंगी स्त्री-पुरुषों को भय और गोपनीयता में जीने के लिए विवश करने के अलावा, धारा 377 ने एचआईवी-निरोधक प्रयासों की जड़ें खोद दी हैं और अवसाद और आत्महत्याओं में योगदान किया है। विश्व बैंक के 2014 में कराए गए एक अध्ययन से पता चला है कि भारत को समलिंगीभीति के कारण सकल घरेलू उत्पाद में 0.1% से लेकर 1.7% तक की हानि हुई है।

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मुद्दा कामुकता का नहीं बल्कि स्वतंत्रता का है। भारतीय वयस्क परस्पर सहमति से अपने शयनकक्षों में जो करते हैं राज्य को उसे नियंत्रित करने का अधिकार देकर धारा 377 क्रमशः अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए गरिमा, निजता, और समानता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा था, “समलैंगिक आचरण का आपराधीकरण न सिर्फ़ मूलभूत मानवाधिकारों के प्रतिकूल है बल्कि उन मानव स्वतंत्रताओं में वृद्धि करने का भी कठोर विरोधी है जिसके अनुसार मानवीय सभ्यता की प्रगति मापी जा सकती है।”

उदार दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में धारा 377 को रद्द करने के बाद की अवधि में, न तो आसमान टूटा; और न ही भारतीय समाज ध्वस्त हुआ। फिर भी, धर्मांधों ने उस फ़ैसले को पलटवाने के लिए याचिका दायर की और अंततः 2013 में उस समय समलिंगियों के अधिकारों की घड़ी की सुइयों को पीछे घुमाने में कामयाब हो गए जब उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले को पलट दिया।

बहुत से भारतीयों की तरह मुझे भी उच्चतम न्यायालय का 2013 का फ़ैसला सामासिकता, और लोकतंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की दृष्टि से नैतिकता विरोधी लगा था, जिसमें यौन रुझान आधारित पहचान सहित, अनेक पहचानों को अपनाने का प्रावधान है। इसलिए, पिछले दिसंबर में मैंने ऐसा विधेयक लाने का प्रयास किया था जो धारा 377 में संशोधन कर देता और वयस्कों के बीच उनके लिंग और योनिकता से परे होने वाले परस्पर सहमति वाले सभी यौन संसर्गों का अनापराधीकरण कर देता।

समलिंगीभीति से ग्रस्त सत्ताधारी भाजपा के वाचाल तबके ने इस विधेयक को लाने के विरोध में जमकर मतदान किया ताकि विधेयक के लाभों के बारे में व्यावहारिक चर्चा न हो सके। मार्च में जब मैंने दुबारा प्रयास किया तब भी वही हुआ। विधेयक में मेरी कथित व्यक्तिगत रुचि को लेकर मेरे बारे में उपहासजनक टिप्पणियां की गईं, जिसके जवाब में मैंने कहा कि पशुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यक्ति का गाय होना ज़रूरी नहीं है।

भाजपा का मतदान कई स्तरों पर असंगत है, लेकिन सबसे अधिक स्पष्ट रूप से ब्रितानवी औपनिवेशिक कानून (ब्रितानवी खुद भी जिससे आगे निकल गए है) के पक्ष में भारतीय लोकाचार के हज़ारों साल पुराने आचरणों को नकारना सबसे अधिक बेतुका था। यौन विभेद के मामले में भारतीय लोकाचार ऐतिहासिक रूप से उदार रहा है, न तो पौराणिक कथाओं में और न ही इतिहास में यौनविपंथिता के उत्पीड़न या अभियोजन के कोई प्रमाण मिलते हैं। दरअसल, हिंदू महाकाव्य महाभारत के शिखंडी जैसे चरित्रों से भरे पड़े हैं जो स्त्री के रूप में पैदा हुआ था लेकिन बाद में पुरुष बना; बहुत से हिंदू अर्द्ध नर अर्द्धनारीश्वर की पूजा करते हैं; और भारत भर के मंदिरों में उत्कीर्ण मूर्तियों में समलिंगी कामक्रीड़ा का चित्रण हुआ हैं। इसके बावजूद, हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी, भाजपा इस हिंदू परंपरा की अनदेखी करना पसंद करती है।

2013 के अपने फ़ैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि धारा 377 के भाग्य का निर्णय जजों को नहीं, विधायकों को ही करना चाहिए। दुर्भाग्यवश, भाजपा के कुछ दर्जन वाचाल और अभिप्रेरित सदस्यों के पूर्वाग्रह के कारण संसद इस काम को पूरा करने में सक्षम नहीं है। दरअसल, जब तक भाजपा सत्ता में है धारा 377 के अन्याय का विधायी प्रतिकार उपलब्ध नहीं हो सकता।

लेकिन अब भी भारत की न्याय प्रक्रिया के माध्यम से राहत की उम्मीद बाक़ी है। उच्चतम न्यायालय अब अपने 2013 के फ़ैसले की “रोगहर समीक्षा” करने के लिए सहमत हो गया है। इस तरह की समीक्षा के फलस्वरूप भारतीय दंड संहिता से धारा 377 निरस्त हो सकती है।

हालाँकि मैं विधायी प्रक्रिया द्वारा धारा 377 में संशोधन कराने के अपने प्रयासों में असफल रहा, फिर भी मैं मानवाधिकारों, सरकार को हमारे शयनकक्षों से बाहर रखने और भारत की सामासिकता की रक्षा के प्रति कृतसंकल्प हूं। उच्चतम न्यायालय की समीक्षा की प्रतीक्षा के दौरान हम जनमत की अदालत में भारत के अल्पसंख्यकों के लिए न्याय की मांग करते रह सकते हैं और हमें करना भी चाहिए। इस काम के लिए मैंने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को यह बताने के लिए एक ज्ञापन प्रसारित किया है कि जन भावनाएं उन्नीसवीं सदी से आगे बढ़ चुकी हैं। अब तक इस पर 65,000 लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं जिससे बिलकुल स्पष्ट संदेश मिलता है।

लेकिन, इस क्षेत्र में वास्तविक बदलाव की दृष्टि से मेरी उम्मीदें विधायिका की बजाय न्यायपालिका पर टिकी हैं। आख़िरकार जबकि विधायिका के ज़रिए बदलाव के लिए जिस राजनीतिक साहस की ज़रूरत है उसका भारत की मौजूदा सरकार में दुखद रूप से अभाव है – लेकिन न्यायपालिका इस तरह के मुद्दों से बाधित नहीं है।

खुशख़बरी यह है कि भारत के उच्चतम न्यायालय का कानूनों की व्याख्या इस तरह से करने का रिकार्ड अनुकरणीय रहा है जिससे देश में मानवाधिकार का प्रसार होता है। रोगहर समीक्षा यह उम्मीद जगाती है कि वह एक बार फिर वैसा ही करेगा और ऐसे भारत का निर्माण करेगा जिसमें कानून सभी नागरिकों के लिए निजता, समानता, गरिमा, और भेदभाव हीनता के संवैधानिक मूल्यों को साकार करता है।

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अन्यथा – भारतीय कानून को हमारे कुछ लोगों के लिए लोहे का पिंजरा बनने देना प्रत्यक्ष रूप से पहचान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जड़ें खोद देगा जो भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। इसके अलावा, यह भारत को शेष अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बड़े हिस्से से अलग कर देगा जो इसे दुनिया के दूसरे लोकतंत्रों के सामने शर्मिंदा देश के रूप में खड़ा कर देगा।

यदि हमें अपने कानून निर्माताओं से नहीं, तो अपने उच्चतम न्यायालय से यह माँग अवश्य करनी चाहिए कि वह भारत की उस सामासिकता की पुष्टि करे जो हमारे देश के भीतर सभी पहचानों को समाहित करती है। बदलाव का समय तो कई बरस पहले ही आ गया था। लेकिन सही काम करने के लिए कभी भी बहुत विलंब नहीं होता। मैं उम्मीद करता हूँ कि उच्चतम न्यायालय सुन रहा है।