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पोलियो का अंतिम मामला

जेनेवा – नाइजीरिया के यह एक कठिन वर्ष रहा है। पिछले 12 महीनों में, इस देश को बाल आत्मघाती हमलावरों के हमलों और बोको हराम के बर्बर नरसंहारों का सामना करना पड़ा है। पिछले साल चिबोक में अपहरण की गई 276 स्कूली छात्राओं में से बहुत अधिक छात्राएँ अभी भी लापता हैं। और फिर भी, ऐसे समय के दौरान, इस तरह की भयावह स्थितियों के बावजूद, नाइजीरिया चुपचाप सचमुच उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करने में कामयाब रहा है: वहाँ पूरे वर्ष में वाइल्ड पोलियो का एक भी नया मामला नहीं हुआ है।

यह नाइजीरिया और इस रोग के उन्मूलन के प्रयास में लगे उसके सभी सहयोगियों के लिए एक महान उपलब्धि है। 30 साल से कम समय पहले तक, 125 देश पोलियो से ग्रस्त थे, जिससे हर दिन 1,000 बच्चे लकवाग्रस्त हो जाते थे। अब तक, केवल तीन देश ही ऐसे थे जहाँ वायरस को अभी भी स्थानिक माना जाता है: अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और नाइजीरिया। स्���ास्थ्य अधिकारी किसी देश को पोलियो-मुक्त घोषित करने से पहले तीन साल इंतजार करते हैं, लेकिन नाइजीरिया में एक साल की उपलब्धि से इस बात की उम्मीद बलवती हो गई है कि शायद हमने पहले ही इस देश में - और पूरे अफ्रीका में - वाइल्ड पोलियो का अंतिम मामला देख लिया है।

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अफ्रीका के सबसे अधिक आबादी वाले देश में हर बच्चे तक पहुँचने की प्रचालनात्मक चुनौती के अलावा, नाइजीरिया के पोलियो उन्मूलन अभियान को सुरक्षा के मुद्दों, धार्मिक कट्टरपंथियों के विरोध, और व्यापक भ्रष्टाचार पर काबू पाना पडा है। नाइजीरिया जैसा अत्यधिक अशांत देश इस तरह की महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकता है, यह तथ्य जश्न मनाने का कारण है और यह न केवल पोलियो के खिलाफ लड़ाई में बल्कि सामान्य रूप में वैश्विक स्वास्थ्य के प्रयासों के लिए आशावादिता के लिए आधार प्रदान करता है। नाइजीरिया की सफलता से यह पता चलता है कि दुनिया के सबसे अधिक वंचित और पहुँच से बाहर वाले बच्चों तक आधुनिक चिकित्सा के चमत्कारों को पहुँचा पाना संभव है।

बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाने की दृष्टि से इसके बहुत अधिक निहितार्थ हैं। पहले जिन बच्चों तक पोलियो के टीके नहीं पहुँच पाते थे वे उन समुदायों में रहते हैं जिनमें नेमी टीकाकरण, मातृ स्वास्थ्य देखभाल, पोषक तत्वों, स्वच्छता, या मलेरिया की रोकथाम की सुविधाएँ बहुत कम या बिल्कुल उपलब्ध नहीं होती थीं। वे ऐसे बच्चे हैं जिन्हें अपने पाँचवें जन्मदिन तक पहुँचने से पहले मृत्यु हो जाने का खतरा सबसे अधिक होता है।

नाइजीरिया की इन बच्चों तक पहुँचने में सफलता उन हज़ारों समर्पित स्थानीय स्वयंसेवकों के प्रयासों का परिणाम है जिनमें से कुछ ने इस प्रक्रिया में अपने प्राण तक गँवा दिए। 2012 के बाद से, प्रतिरक्षण अभियानों के दौरान समुदायों को जुटाने में शामिल स्वयंसेवकों की संख्या में लगभग पाँच गुना वृद्धि हुई है।

इस बीच, सरकार, विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ जैसे वैश्विक स्वास्थ्य संगठन, नागरिक समाज संगठन, और समुदाय के नेतागण, सभी साथ मिलकर काम करते हुए उन अंतरालों की पहचान करने और उन्हें पाटने में सफल रहे जो पोलियो टीके के उपयोग में ऐतिहासिक दृष्टि से बाधक थे। उदाहरण के लिए, 2012 के आरंभ में, नाइजीरिया की सरकार ने, डाटा प्रवाह को समन्वित करने, निर्णय लेने की प्रक्रिया को सुकर बनाने, और कार्यक्रम के भीतर जवाबदेही में सुधार लाने के लिए समर्पित आपातकालीन परिचालन केंद्रों की स्थापना की। वैक्सीन एलायंस, गावी की सहायता से, नाइजीरिया ने 1600 से अधिक सौर-ऊर्जा चालित रेफ्रिजरेटर भी स्थापित किए जो यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि टीके वितरण शृंखला में अपनी लंबी यात्रा के दौरान सुरक्षित और प्रभावी रहते हैं।

भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढाँचे में किए गए ये निवेश बच्चों की विभिन्न रोगों से रक्षा करने का साधन प्रदान करते हैं। पहले से ही, नाइजीरिया में पोलियो कार्यकर्ता अपना आधे से ज्यादा समय असंबंधित लेकिन महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने पर खर्च कर रहे हैं। इस बुनियादी सुविधा से नए टीके शुरू करने - जैसे न्यूमोकोकल संयुक्त टीके जो पाँच साल से कम उम्र के बच्चों के सबसे बड़े जानलेवा, निमोनिया के खिलाफ रक्षा करते हैं - और खसरा और रूबेला के खिलाफ नेमी टीकाकरण के प्रसार में वृद्धि करने में मदद मिली है। आपातकालीन परिचालन केंद्रों की बदौलत, इस बुनियादी सुविधा से संपर्क का पता लगाने और निगरानी रख पाने से, 2014 में नाइजीरिया में इबोला के प्रकोप को रोकने में भी मदद मिली।

इन प्रयासों का अतिरिक्त लाभ यह है कि इनसे सुनिश्चित किया जा सकता है कि नाइजीरिया अपनी पोलियो-मुक्त स्थिति को सुदृढ़ कर सकता है। उन्मूलन अभियान के दौरान निर्मित स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं के फलस्वरूप इंजेक्शन वाले पोलियो टीकों का उपयोग करना संभव हुआ है जो मौखिक टीकों के पूरक होंगे और इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि वायरस वापस नहीं आता है।

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अभी हाल ही में आधिकारिक तौर पर पोलियो-मुक्त घोषित किए गए देश भारत में भी यही पैटर्न था, जहाँ 2010 के बाद से इसका कोई भी मामला नहीं पाया गया है। वहाँ पोलियो टीके लगाने के लिए उपलब्ध बुनियादी सुविधा का उपयोग अब 1-में-5 पेंटावेलंट टीके जैसे नेमी टीकाकरण की व्याप्ति को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। भारत अब अपने पोलियो-उन्मूलन अभियानों को कम कर सकता है, और फिर भी अपनी पोलियो-मुक्त स्थिति को बनाए रख सकता है।

2015 में, दुनिया भर में अब तक पोलियो के केवल 34 मामले दर्ज हुए हैं – इनमें से अधिकतर मामले पाकिस्तान में हुए हैं। अब इस बात की सचमुच बहुत अधिक संभावना है कि हम 2016 के अंत से पहले वाइल्ड पोलियो का बिल्कुल अंतिम मामला देख सकेंगे - यह एक ऐसा रोग है जिससे कभी लाखों लोग त्रस्त थे। तथापि, इस रोग के उन्मूलन के लिए हमें नाइजीरिया जैसी सफलताओं से सीखना होगा और टीकाकरण के नेमी प्रयासों को और मजबूत करना होगा। पोलियो के अंत को न केवल एक भयानक रोग की पराजय, बल्कि बचपन की पीड़ा और मृत्यु को कम करने के प्रयास में एक नए चरण की शुरूआत के रूप में भी देखा जाना चाहिए जिसके लाभ भावी पीढ़ियों द्वारा महसूस किए जाएँगे।