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चिंता दूर करना

न्यू यॉर्क - शोधकर्ता जब चिंता के नए उपचारों की प्रभावकारिता का मूल्यांकन करना चाहते हैं तो परंपरागत दृष्टिकोण यह अध्ययन करने का होता है कि चूहे या मूषक असुविधाजनक या तनावपूर्ण स्थितियों में किस तरह का बर्ताव करते हैं। कृंतक तेज़ रोशनी वाली खुली जगहों से इसलिए बचते हैं कि निर्जन स्थानों पर वे आसानी से शिकार बन सकते हैं। इसलिए परीक्षण उपकरण में उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति कम रोशनी वाली या दीवार के पास की जगहों को तलाशने की होती है। कोई उपचारित जीव किन्हीं असुरक्षित क्षेत्रों में जितना अधिक समय गुज़ारता है चिंता के इलाज में दवा की कारगरता उतनी ही अधिक प्रभावी मानी जाती है।

लेकिन इस दृष्टिकोण के फलस्वरूप बनी दवाएँ वस्तुतः लोगों की चिंता को कम करने में बहुत अधिक प्रभावी नहीं होती हैं। न तो रोगी और न ही उसके चिकित्सक चिंता के यथेष्ट उपचारों के रूप में वेलियम जैसे बेंज़ोडायाज़ेपिन्स और प्रोज़ैक या ज़ोलोफ़्ट जैसे पसंदीदा सेरोटोनिन रिअपटेक मंदकों सहित उपलब्ध विकल्पों पर विचार नहीं करते हैं। दशकों के अनुसंधान के बाद कुछ बड़ी दवा निर्माता कंपनियाँ ने हार मानना शुरू कर दिया है और नई चिंता निवारक दवाओं को विकसित करने के प्रयासों में कटौती करने लग गई हैं।

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लेकिन हम तथाकथित चिंता संबंधी विकारों का उपचार करना नहीं छोड़ सकते, जिसमें भय और चिंता दोनों से संबंधित समस्याएँ शामिल होती हैं। जब आस-पास अनिष्ट का कोई स्रोत होता है या वह प्रकट होने वाला होता है तो भय उत्पन्न होता है जबकि चिंता की अनुभूतियों में आम तौर पर भविष्य में होने वाली हानि की आशंका समाहित होती है। दुनिया भर में चिंता संबंधी विकारों की व्यापकता लगभग 15% है और इसकी सामाजिक लागत बहुत अधिक है। 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में अनुमान लगाया गया था कि चिंता के आर्थिक बोझ की कुल लागत $40 बिलियन से अधिक है। कुल लागत संभवतः और भी अधिक होगी क्योंकि चिंता संबंधी कई विकारों का निदान कभी भी नहीं हो पाता है।

सहज ज्ञान के विपरीत, चिंता के लिए सबसे अधिक किए जाने वाले उपचारों में अंतर्निहित समस्या का समाधान इसलिए नहीं होता है कि वे ठीक वैसे ही काम करते हैं जैसा उन्हें बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कसौटी के अनुसार काम करना चाहिए। चूहों या मूषकों का इस्तेमाल करके किए गए अध्ययनों पर आधारित अधिकतर उपचार चिंता संबंधी विकारों को इतना आसान बना देते हैं कि उनके साथ जिया जा सकता है। वे जो काम नहीं कर पाते हैं वह यह है कि वे लोगों में भय की भावना या चिंता को कम नहीं करते हैं।

इसका कारण स्पष्ट है। आशंका उत्पन्न करने वाली स्थितियों में व्यवहार संबंधी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने वाली मस्तिष्क की प्रणालियाँ कृंतकों और इंसानों में एक तरह से काम करती हैं, और मस्तिष्क की गहराई में स्थित अपेक्षाकृत पुराने हिस्से इससे जुड़े होते हैं जो अवचेतन में काम करते हैं (उदाहरण के लिए, ऐमिग्डाल)। दूसरी ओर, भय और चिंता की अनुभूति सहित, चेतन अनुभूतियाँ उत्पन्न करने वाली प्रणालियों से अनैच्छिक रूप से निओकार्टेक्स के अपेक्षाकृत नए हिस्से जुड़े होते हैं जो मानव जाति में विशेष रूप से सुविकसित होते हैं और कृंतकों में बहुत कम विकसित होते हैं। सचेतन अनुभूतियाँ भी हमारी अनूठी भाषाई क्षमताओं - धारणा बनाने और अपनी आंतरिक अनुभूतियों को नाम देने की हमारी क्षमता - पर निर्भर होती हैं। यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि अंग्रेज़ी भाषा में भय और चिंता के वर्गीकरण के लिए तीन दर्जन से अधिक शब्द मौजूद हैं: वरी (चिंता) कंसर्न (उद्वेग), ऐप्रिहेंशन (आशंका), डिसक्वाइट्यूड (व्याकुलता), इनक्वाइट्यूड (बेचैनी) ऐंग्स्ट (क्रोध), मिसगिविंग (संशय), नवर्सनेस (उद्विग्नता), टेंशन (तनाव), और ऐसे ही अन्य बहुत से शब्द।

परिणामस्वरूप, हालांकि जीवों पर किए जाने वाले अध्ययन इसका पूर्वानुमान लगाने के लिए उपयोगी होते हैं कि आशंका उत्पन्न करने वाले उद्दीपनों से उत्पन्न होने वाले अनैच्छिक रूप से नियंत्रित लक्षणों को कोई दवा कैसे प्रभावित करेगी लेकिन वे भय या चिंता की चेतन अनुभूति के मामले में कम प्रभावी होते हैं। हमारे पास जो दवाएँ हैं, वे उन रोगियों के लिए मददगार हो सकती हैं जिन्होंने भीड़भाड़ वाले भूमिगत रास्तों, या अपने समकक्षों या पर्यवेक्षकों द्वारा परखे जाने जैसी भय या चिंता उत्पन्न करनेवाली स्थितियों से बचने के लिए काम पर जाना बंद कर दिया है। जिस तरह उपचार किए गए चूहे आचरण की दृष्टि से कम संकोचशील (तेज़ रोशनी वाली, खुली जगहों को सहने में अधिक सक्षम) होते हैं, उसी तरह उपचार किए गए चिंताग्रस्त व्यक्तियों के अपने काम पर जाने में सक्षम होने की अधिक संभावना हो सकती है। लेकिन चूंकि उपचार चेतन मस्तिष्क की प्रक्रियाओं को सीधे प्रभावित नहीं करते, इसलिए चिंता हमेशा दूर नहीं हो पाती है।

यदि उपचारों को अधिक प्रभावी होना है तो हमारे दृष्टिकोणों को और अधिक व्यावहारिक होना होगा। हमें उन प्रणालियों का उपचार करने की ज़रूरत होगी जो अवचेतन रूप से उन प्रणालियों से अलग ढंग से काम करती हैं जिनका परिणाम सचेतन अनुभूतियों के रूप में होता है। इसका आशय आवश्यक रूप से बेहतर दवाओं का होना नहीं है। विगोपन चिकित्सा से अनैच्छिक अनुक्रियाओं का भी उपचार किया जा सकता है जिसमें आशंका उत्पन्न करने वाले उद्दीपनों के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को कम करने के लिए उनके ज़रिये आवर्ती अनुक्रियाएँ उत्पन्न की जाती हैं।

मस्तिष्क की सचेतन और अवचेतन प्रणालियाँ कैसे काम करती हैं इससे संबंधित निष्कर्ष हमें विगोपन चिकित्सा को अधिक कारगर बनाने में समक्ष बना सकते हैं। मूल धारणा यह है कि अवचेतन प्रक्रियाओं से जुड़े लक्षणों को चेतन प्रक्रियाओं से जुड़े लक्षणों से अलग लक्षित किया जाए।

मैं निम्नलिखित क्रम का सुझाव देता हूँ। ऐमिग्डाल जैसे क्षेत्रों की अनुक्रियाओं को मंद करने के लिए अवचेतन विगोपनों (विगोपन प्रक्रिया के साथ हस्तक्षेप कर सकने वाले अचेतन विचारों और अनुभूतियों को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने यानी बाइपास करने के लिए अप्रभावी उद्दीपनों का इस्तेमाल करने) से प्रारंभ करें। अवचेतन प्रणालियों के एक बार नियंत्रित हो जाने के बाद चेतन लक्षणों के उपचार के लिए चेतन विगोपनों का इस्तेमाल करें। अंत में, अधिक परंपरागत मनोचिकित्साओं का इस्तेमाल करें: रोगी की बदली आस्थाओं, स्मृतियों के पुनर्मूल्यांकन, अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करने, सामना करने की रणनीतियाँ अपनाने आदि जैसी चीज़ों पर काम करने के लिए मनोचिकित्सक के साथ मौखिक वार्तालाप करना।

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इस दृष्टिकोण में दवाओं का भी उपयोग किया जा सकता है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के रूप में नहीं। इसके बजाय दवाओं का इस्तेमाल विगोपन चिकित्सा को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया जा सकता है (फ़ार्मास्यूटिकल डीसाइक्लोसेरीन ने इस मामले में कुछ आशा जगाई है)।

ऐसे दृष्टिकोण की प्रभावकारिता की अभी ठीक तरह से जाँच किया जाना बाकी है, जो यह मानता है कि मस्तिष्क की अलग-अलग प्रणालियाँ अलग-अलग लक्षणों को नियंत्रित करती हैं, लेकिन शोधों से पता चलता है कि यह दृष्टिकोण कारगर हो सकता है। यह अनाक्रामक भी होगा और इसके लिए केवल प्रायः इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रियाओं के उद्देश्य को फिर से निर्धारित करना होगा। इस समस्या की विशालता को देखते हुए, जिस लक्ष्य तक इतनी आसानी से पहुंचा जा सका है उसे बीच मझधार में नहीं छोड़ देना चाहिए।