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कोनज़ो का मुकाबला करना

ईस्ट लैंसिंग, मिशिगन – ऐड्स से लेकर पीत-ज्वर तक रोकथाम किए जा सकनेवाले अनेक रोगों ने उप मरूस्थलीय अफ़्रीका को काफी समय से अपनी चपेट में लिया हुआ है। लेकिन उन्हें दूर करने के लिए संबंधित रोग के बारे में जानकारी, धन, शिक्षा, सरकारी सहायता, योजना और सबसे अधिक समस्या का समाधान करने के लिए समुदाय और विश्व की रुचि का होना ज़रूरी है।

आइए एक ऐसे रोकथाम किए जा सकनेवाले रोग पर विचार करें जिसके बारे में अधिकतर लोगों ने कभी सुना भी नहीं है: कोनज़ो, ऊर्ध्व प्रेरक तंत्रिका कोशिका का एक स्थायी लाइलाज विकार है जो उप मरूस्थलीय अफ़्रीका के उन ग्रामीण क्षेत्रों में आम तौर से होता है जो मुख्य फसल के तौर पर कसावा के पौधे की कड़वी किस्मों पर निर्भर करते हैं। कोनज़ो तब होता है जब कसावा कंद को खाने से पहले ठीक तरह से पकाया नहीं जाता है, जिसमें आम तौर पर उन्हें ख़मीर उठने तक भिगोना पड़ता है और फिर उन्हें धूप में सुखाना होता है ताकि उनमें मौजूद विषैले यौगिक निकल जाएँ। हर बार इसका प्रकोप होने पर ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ों या हज़ारों लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं।

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कोनज़ो विशेष रूप से कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, मोजाम्बिक, और तंजानिया में होता है और यह अक्सर सूखा पड़ने या संघर्ष के बाद तब होता है जब खाद्यान्न की कमी होती है। महिलाओं और बच्चों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है, विशेष रूप से आर्थिक संकट के दौरान, जब उन्हें शरीर में विषाक्त तत्वों को विषरहित करने के लिए यकृत के लिए आवश्यक माँस, लोबिया, और सल्फर अमीनो अम्लों के अन्य स्रोत सबसे कम उपलब्ध होते हैं।

इसके प्रभावों को सहज ही अनदेखा नहीं किया जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोंज़ो की परिभाषा चलते या दौड़ते समय चाल में दिखाई देनेवाली जकड़न की असामान्यता के रूप में की है; जिसमें पहले से स्वस्थ किसी व्यक्ति में एक सप्ताह के भीतर इसके प्रारंभ होने का इतिहास होता है और उसके बाद यह रोग तेज़ी से नहीं बढ़ता है; और मेरुदंडीय रोग के लक्षणों के बिना घुटनों या टखनों में भारी झटके लगते हैं।

कोनज़ो की गंभीरता अलग-अलग होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1996 के वर्गीकरण के अनुसार, रोग को पीड़ित व्यक्ति को चलने-फिरने के लिए नियमित रूप से किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ने पर मामूली; एक या दो छड़ियों या बैसाखियों का उपयोग करने पर मध्यम; और उसके शय्याग्रस्त हो जाने या बिना सहारे के नहीं चल पाने पर गंभीर माना जाता है।

क्योंकि कोनज़ो को प्रारंभ में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में प्रेरक तंत्रकोशिका मार्ग तक सीमित रहनेवाले ऊर्ध्व प्रेरक तंत्रिका कोशिका रोग के रूप में ही माना जाता था, यह सुझाया गया था कि बोध संबंधी प्रभाव न्यूनतम होते हैं। लेकिन बाद में उभर कर आए विद्युत शरीरक्रिया विज्ञान साक्ष्य में यह सुझाया गया कि उच्च-स्तरीय मस्तिष्क कार्यप्रणाली भी प्रभावित हो सकती है। कोनज़ो से प्रभावित बच्चों में तंत्रिका-बोध संबंधी विकृतियों के प्रमाण प्रस्तुत करते समय मेरे सहकर्मी और मैंने कोनज़ो-प्रभावित परिवारों में रहनेवाले कोनज़ो-मुक्त बच्चों के उप-नैदानिक लक्षणों को भी सम्मिलित किया, यह निष्कर्ष स्मरणशक्ति और सीखने के अधिक विशेषीकृत तंत्रिकाबोध संबंधी परीक्षणों के अनुसार उनके कार्य-निष्पादन पर आधारित था।

ये जटिल लक्षण कोनज़ो-पूर्व स्थिति के रूप में हो सकते हैं, जिनसे यह चेतावनी मिल सकती है कि कोई बच्चा इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में पहुँच रहा है। इस प्रकार, कोनज़ो-प्रभावित परिवारों और समुदायों में रहनेवाले कोनज़ो-मुक्त बच्चों के तंत्रिका-बोध संबंधी प्रभावों के जो प्रमाण प्रस्तुत किए गए उनके फलस्वरूप यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि विषैले यौगिकों के उच्च स्तरों वाली कसावा की कड़वी किस्मों पर निर्भर क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाए।

इस उद्देश्य से, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन ने कसावा की गैर-विषाक्त, अधिक-उपज वाली किस्मों के विकास के लिए किए जानेवाले अनुसंधान का समर्थन किया है। आनुवंशिक अभियांत्रिकी से विकसित ये प्रजातियाँ कम-स्तरीय मिट्टी में भी फल-फूल सकती हैं, इसलिए अब लोगों को अधिक विषाक्त किस्मों की ओर जाने की ज़रूरत नहीं है।

लेकिन इन अधिक सुरक्षित प्रजातियों का प्रचार-प्रसार करना मुश्किल हो रहा है। कोनज़ो-प्रभावित क्षेत्रों में आवश्यक परिवर्तनों को लागू करने के लिए ज़रूरी कृषि, शिक्षा, और सार्वजनिक-स्वास्थ्य संबंधी क्षमता और आधारिक संरचना की कमी है। इन्हीं कारणों से, ये क्षेत्र अपनी खाद्य फसलों में बाजरा, मक्का या सेम जैसी सुरक्षित फसलों को शामिल नहीं कर पाते हैं।

चूंकि कोनज़ो से होनेवाली तंत्रिका-संबंधी क्षति का कोई इलाज नहीं है, इसलिए इस रोग के खिलाफ़ लड़ाई में रोकथाम पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। यद्यपि इसका अर्थ यह है कि कसावा और अन्य फसलों की नई प्रजातियों के लाभों के बारे में बताया जाना जारी रखा जाए, परंतु पहली प्राथमिकता लोगों को, विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को अनपका कसावा खाने के ख़तरों के बारे में शिक्षित करने और उहें यह सिखाने की होनी चाहिए कि इसे किस प्रकार सुरक्षित रूप से तैयार किया जाए। सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त किसी ऐसे सामाजिक प्रचार का उपयोग करके, जिस प्रकार के प्रचार का उपयोग ऐड्स-रोधी शिक्षा में किया गया था, इस संदेश को सोशल नेटवर्क, मोबाइल फ़ोन, रेडियो, और टेलीविज़न के माध्यम से प्रसारित किया जा सकता है।

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यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रभावित क्षेत्रों के समुदाय लंबे समय तक सुरक्षित पारंपरिक प्रथाओं का पालन करते हैं। लेकिन हो सकता है कि उन्हें यह पता न हो कि ये प्रथाएँ इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं, और इसलिए उनका पालन न करने के परिणामों के बारे में भी पता न हो। विशेष रूप से उथल-पुथल के समय और खाद्य की बहुत अधिक कमी होने के दौरान,छिले हुए कंद को तीन दिन तक पानी में तब तक भिगोकर रखना जब तक उनमें ख़मीर न बन जाए, फिर एक दिन तक उन्हें धूप में सुखाना, उनके लिए उनके बस के बाहर एक महँगी विलासिता होगी। ऐसा नहीं है।

लाखों लोगों को कोनज़ो होने का ख़तरा है, और यह किसी भी समय फैल सकता है। तंत्रिका-संबंधी क्षति बलनाशक हो सकती है, और यह स्थायी होती है। क्योंकि हम जानते हैं कि इसे कैसे रोका जा सकता है, हमारे लिए यह ज़रूरी है कि हम कार्रवाई करें।