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छोटे से मच्छर का बड़ा आतंक

स्टैनफोर्ड – मच्छर-जनित बीमारियां हर साल लाखों इनसानों की जान ले लेती हैं और इससे भी कहीं अधिक लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती हैं. सन् 2012 में मलेरिया के अनुमानित 20.7 करोड़ मामले सामने आये थे जिनमें करीब 6,27,000 मौतें हुई थीं. ऊष्ण और उपोष्ण कटिबंधों (भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण में कर्क व मकर रेखा तक का इलाका) में डेंगू बीमारी व अकाल मौत का सबसे बड़ा कारण है. हर साल यह बीमारी लगभग 10 करोड़ लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लेती है. इसके अलावा सारी दुनिया में हर साल 2 लाख लोग पीत ज्वर (येलो फीवर) से ग्रस्त होते हैं जिनमें से 30 हजार मौत के मुंह में समा जाते हैं.

किसी जानलेवा या विकलांगताकारी बीमारी को फैलाने के लिए मच्छर द्वारा केवल एक बार काटा जाना ही काफी है. यह भी एक भयानक सच्चाई है कि मच्छर आश्चर्यजनक तेज गति से जनन करते हैं और अपनी तादाद बढ़ाते हैं. डेंगू और वेस्ट नील वायरस जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए कोई कारगर वैक्सीन या दवाई नहीं है. साथ ही मलेरिया जैसी बीमारी का उनके सर्वाधिक प्रकोप वाले क्षेत्रों में उपचार अत्यंत कठिन है. इसलिए मच्छरों की आबादी के नियंत्रण के लिए अधिक प्रभावी तरीकों की बेहद जरूरत है.

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अच्छी खबर यह है कि इसके लिए एक प्रभावशाली नई तकनीक इन इलाकों में परीक्षण के लिए तैयार है. अब यह सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे इसके विकास के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराएं.

आज मच्छरों की आबादी रोकने के लिए जो प्रचलित तरीका है - कीटों का बंध्याकरण का - वह रेडिएशन द्वारा नर कीटों के बंध्याकरण पर निर्भर है. बंध्याकरण के बाद इन नर कीटों को ग्रस्त इलाकों में छोड़ दिया जाता है लेकिन वे प्रजनन करने में असमर्थ होते हैं. मगर पिछली सदी के मध्य से इस्तेमाल की जा रही यह तकनीक मच्छरों के मामले में प्रभावकारी नहीं रही है. कारण है मच्छरों की नाजुकता.

मॉलेकुलर बायोलॉजी में हुई तरक्की मिलता-जुलता समाधान पेश करती है जो कहीं अधिक प्रभावकारी है. मॉलेकुलर जीनेटिक इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल कर ब्रिटिश कंपनी ऑक्सीटेक ने डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के नियंत्रक का नया तरीका ईजाद किया है.

इसमें विशिष्ट जीनेटिन उत्परिवर्तन वाले नर मच्छरों को प्रयोगशाला में पनपाया जाता है. इस उत्परिवर्तन के कारण उनके बच्चे प्रोटीन की अधिक मात्रा के साथ पैदा होते हैं जो उनकी कोशिकाओं को सामान्य तरीके से कार्य नहीं करने देता है. इस प्रकार बड़े होने से पहले ही वे मर जाते हैं. चूंकि नर मच्छर काटते नहीं हैं इसलिए वातावरण में उन्हें छोड़ने से स्वास्थ्य संबंधी कोई खतरा नहीं होता है और क्योंकि उनके बच्चे मर जाते हैं अतः जीनेटिक रूप से परिवर्तित मच्छर पर्यावरण में स्थायी तौर पर बने भी नहीं रहते हैं.

अगर इन नर मच्छरों को कई महीनों की अवधि में नियमित रूप से छोड़ा जाए तो सिद्धांत रूप से मच्छरों की आबादी उल्लेखनीय रूप से घट जाएगी. अब केवल यह पता लगाने की जरूरत है कि व्यावहारिक तौर पर यह तरीका काम करता है या नहीं.

रेडिएशन युक्त बांझ कीटों या ऑक्सीटेक मच्छरों जैसे उपाय विकसित करने के वैज्ञानिक शोध क्रमवत विकसित होते हैं - प्रयोगशाला की नियंत्रित अवस्था से सीमित परीक्षणों तक. अब क्योंकि ऑक्सीटेक ने मलेशिया के केमैन आइलैंड और ब्राजील में उम्मीद जगाने वाले परीक्षण किये हैं, यह कंपनी अब अमेरिका समेत कई अन्य देशों में अपने परीक्षणों को दोहराने जा रही है.

ऐसे परीक्षणों को हमेशा समुचित रूप से नियंत्रित किया जाता है और उनकी निगरानी की जाती है कि वे सुरक्षित व कारगर रहें. इनमें सरकारी नियमन अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराते हैं. निगरानी के उचित स्तर का पता लगाने के लिए सरकारी निकाय इन तरीकों का वैज्ञानिक विधियों से जोखिम विश्लेषण करा सकती हैं.

लेकिन जब जीनेटिक इंजीनियरिंग की बात आती है तो गेंद विज्ञान के पाले से निकल कर राजनीति के पाले में चली जाती है. यह सच है कि मोलेकुलर जीनेटिक इंजीनियरिंग रेडिएशन जैसी पुरानी अधकचरी तकनीकों से कहीं अधिक सटीक है और अचूक है. लेकिन जहां रेडिएशन द्वारा कीटों के बंध्याकरण की तकनीक ज्यादातर जगहों पर नियम-कानून से बाहर है, वहीं जीवित प्राणियों की जीनेटिक इंजीनियरिंग को सारी दुनिया में लंबी कानूनी जद्दोजहद झेलनी पड़ती है. राजनीतिक कारणों से उन्हें या तो देर से मंजूरी मिलती है या फिर उन्हें सिरे से नकार दिया जाता है. नतीजतन जीनेटिक इंजिनियरिंग में अनुसंधान व विकास खर्चीला होता जाता है, उसमें निवेश को बढ़ावा नहीं मिलता और नई तकनीकें विकसित करने में रूकावट आती है.

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मच्छरों के नियंत्रण के मामले में यह समस्या और अधिक बढ़ जाती है. हालांकि इसे रोकना बेहद जरूरी है. इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गर्म इलाकों की बीमारियों के बारे में अनुसंधान व प्रशिक्षण हेतु विशेष कार्यक्रम में नियामन एजेंसियों से आह्वान किया गया है कि ‘‘विज्ञान-आधारित, मामला-दर-मामला लक्षित आवश्यकताओं’’ पर जोर दें. दूसरे शब्दों मेें इन नियामकों को इन ईजादों पर जन स्वास्थ्य लागतों व लाभों के आलोक में विचार करना चाहिए और अपनी समीक्षा को तेज करना चाहिए.

मच्छर-जनित बीमारियों से लोगों द्वारा सहे जा रहे कष्टों के संदर्भ में सरकारों में नेताओं को जीनेटिक-इंजीनियरिंग से उपजे समाधानों को उस तरह से नियंत्रित नहीं करना चाहिए जिस तरह से जीनेटिक इंजीनियरिंग से बने उत्पादों को किया गया था. उनमें राजनेताओं ने अपने राजनीतिक हितों और लोकप्रियतावादी राजनीति को सर्वोपरि रखा था. केवल समझदारीपूर्ण और तथ्यों पर आधारित नियमन द्वारा ही दुनिया को जीनेटिक इंजीनियरिंग की बीमारियों से लड़ने की पूरी क्षमता का लाभ पहुंचाया जा सकता है.