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उग्रवादी इस्लामवाद और टीकाकरण संशयवाद

लंदन - हम जानते हैं कि पोलियो का उन्मूलन कैसे किया जा सकता है। 1980 के बाद से विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में जो अंतर्राष्ट्रीय टीकाकरण प्रयास किया गया उसके फलस्वरूप यह वायरस समाप्ति के कगार पर पहुँच गया है। जिस रोग से हर वर्ष आधे मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती थी या वे अपंग हो जाते थे अब वह केवल कुछ सौ ल��गों को संक्रमित करता है।

इस वायरस के उन्मूलन के रास्ते में जो रुकावटें आ रही हैं व चिकित्सीय या तकनीकी मजबूरियाँ नहीं हैं, बल्कि टीकाकरण के प्रयास में राजनीतिक प्रतिरोध है। वास्तव में, जिन थोड़े से क्षेत्रों में यह वायरस अभी तक बना हुआ है उनमें चिंताजनक समानताएँ पाई जाती हैं। 2012 के बाद से, पोलियो के 95% मामले पाँच देशों में हुए हैं - अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नाइजीरिया, सोमालिया, और सीरिया - जो सभी इस्लामवादी विद्रोहों से प्रभावित हैं। पोलियो का उन्मूलन करने के लिए, हमें इस संबद्धता को समझना चाहिए।

टीकाकरण कार्यक्रमों के बारे में इस्लामवादी विरोध का कारण अक्सर यह विश्वास बताया जाता है कि टीके मुसलमानों को नुकसान पहुँचाने के लिए पश्चिमी देशों की साजिश है, और यह कि टीकों से बच्चे बाँझ हो जाते हैं, वे एचआईवी से संक्रमित हो जाते हैं, या टीकों में सूअर का माँस होता है। लेकिन यह जान लेना महत्वपूर्ण है कि सीरिया और अफगानिस्तान में जिहादी पोलियो टीकाकरण अभियान का काफी हद तक समर्थन करते आ रहे हैं। यदि इस वायरस को हराना है, तो हमें इस्लामवादियों की छवि को पश्चिमी विज्ञान का विरोध करनेवाले हिंसक कट्टरपंथियों से अलग करना होगा और उन विशिष्ट राजनीतिक संदर्भों पर गंभीरता से विचार करना होगा जिनमें उन्मूलन का प्रयास अब तक असफल रहा है।

उदाहरण के लिए, नाइजीरिया में टीकाकरण अभियानों के प्रति उग्रवादी समूह बोको हराम की शत्रुता औपनिवेशिक युग में में बोए गए अंतर-मुस्लिम संघर्ष से उपजी है जब यूनाइटेड किंगडम ब्रिटिश समर्थक स्वदेशी अभिजात वर्ग के ज़रिये उत्तरी नाइजीरिया पर परोक्ष रूप से शासन करता था। औपनिवेशिक अभिजात वर्ग के वंशज इस क्षेत्र की राज्य सरकारों पर अभी तक हावी बने हुए हैं, जो टीकाकरण कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं। इस प्रयास के प्रति बोको हराम का विरोध इसकी उस वर्ग के प्रति व्यापक घृणा को दर्शाता है जिसे यह एक भ्रष्ट और पाश्चात्यीकृत राजनीतिक वर्ग के रूप में मानता है।

इसी तरह, दक्षिणी सोमालिया में बाहरी लोगों द्वारा एक स्थिर केंद्रीकृत सरकार थोपने के प्रयासों ने पोलियो टीकाकरण कार्यक्रमों के प्रति असंतोष उत्पन्न किया है। 1990 के दशक के आरंभ से, सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र और अफ्रीकी संघ द्वारा किए गए हस्तक्षेपों के फलस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका और इस देश के मुख्य रूप से ईसाई पड़ोसियों, केन्या और इथियोपिया से सैनिकों को शामिल किया गया है। इसके फलस्वरूप व्यापक असंतोष फैला है और इस्लामी उग्रवादियों के लिए समर्थन बढ़ गया है, जिन्हें बहुत से सोमाली विदेशी हस्तक्षेप के विरुद्ध मुख्य सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं। हाल के वर्षों में, अल-शबाब उग्रवादियों ने एड्स कार्यकर्ताओं पर हमले किए हैं, जिससे उपद्रव नियंत्रित क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के कार्यक्रम चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। उदाहरण के लिए, मेडिसिन्स सैन्स फ्रंटियर्स को 2013 में अपने सोमाली कार्यक्रमों को बंद करना पड़ गया था।

पाकिस्तान में टीकाकरण के प्रयास के विरोध का मूल कारण पश्तून समुदायों द्वारा राष्ट्रीय सरकार का प्रतिरोध करना है। मोटे तौर पर, पाकिस्तानी तालिबान एक पश्तून आंदोलन है जो देश के उत्तर-पश्चिम में अर्द्ध-स्वायत्त संघीय रूप से प्रशासित जनजातीय क्षेत्रों में केंद्रित है। यह पहाड़ी क्षेत्र कभी भी अंग्रेजों द्वारा सीधे रूप से शासित नहीं था, और पश्तूनों ने राज्य द्वारा अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए पाकिस्तानी सरकार के प्रयासों का जमकर विरोध किया है। इस प्रकार, टीकाकरण कार्यक्रम जैसे बाहरी हस्तक्षेप को पश्तूनी इलाकों में सरकार द्वारा भारी अतिक्रमण करने के एक छलावे के रूप में देखा जाता है।

देश में अमेरिकी हस्तक्षेप के कारण पाकिस्तानी तालिबान की दुश्मनी में और अधिक कट्टरता आई है, जिसमें ओसामा बिन लादेन की हत्या करने से पहले उसके रिश्तेदारों से डीएनए इकट्ठा करने के लिए एक नकली हेपेटाइटिस टीकाकरण अभियान का उपयोग करना भी शामिल है। इस्लामी उग्रवादियों की दृष्टि से, इससे यह सिद्ध हो गया कि पोलियो प्रतिरक्षण प्रयासों के बहाने ड्रोन हमलों के लिए लक्ष्यों की पहचान करने के लिए खुफिया जानकारी जुटाई जाती है।

स्थानीय राजनीति - न कि धार्मिक विचारधारा - के महत्व को डूरंड रेखा के दूसरी ओर पोलियो टीकाकरण कार्यक्रमों की प्रतिक्रिया में देखा जा सकता है। अफगानिस्तान में तालिबान मुख्य रूप से पश्तून आंदोलन भी है, लेकिन पोलियो उन्मूलन के प्रयास के प्रति इसका रवैया ज्यादा अलग नहीं हो सकता है। तालिबान ने जब 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान पर शासन किया था, तो इसने टीकाकरण प्रयास का समर्थन किया था, और वास्तव में यह अभी भी ऐसा कर रहा है; हाल ही में तालिबान द्वारा एक वक्तव्य में अपने मुजाहिदीन से पोलियो कार्यकर्ताओं को "सभी आवश्यक समर्थन" प्रदान करने के लिए आग्रह किया गया है।

यह अंतर दोनों देशों में पश्तूनों की राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है। अफगानिस्तान में पश्तूनों का बहुमत है; और परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय राजनीति में पाकिस्तान में अपने समकक्षों की तुलना में उनका बहुत अधिक प्रभाव है - और इसलिए वे इस देश को कम संदेह की नजर से देखते हैं।

सीरिया में टीकाकरण के प्रयास में सबसे बड़ी बाधा केंद्र सरकार रही है। राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन को विद्रोहियों द्वारा नियंत्रित क्षेत्रों में टीकाकरण कार्यक्रमों को चलाने से मना करने का सीधा प्रभाव यह हुआ कि 2013 में पोलियो का प्रकोप हो गया। मुक्त सीरियाई सेना जैसे उदारवादी विपक्षी समूहों ने तुर्की के प्राधिकारियों और स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों की मदद से सीरियाई सरकार के नियंत्रण के बाहर के क्षेत्रों में अपने स्वयं के टीकाकरण कार्यक्रम का आयोजन किया है। इस्लामी राज्य और अल-नुसरा फ्रंट सहित, इस्लामी उग्रवादियों ने अपने नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में भी इन टीकाकरण कार्यक्रमों को चलाने की अनुमति दी है क्योंकि वे असद शासन से संबंधित नहीं हैं।

इस्लामवादी विद्रोही पोलियो टीकाकरण के अभियानों के प्रति जो रुख अपनाते हैं उसका संबंध उस संघर्ष की विशिष्ट तीव्रता से अधिक होता है जिसमें वे शामिल होते हैं, पश्चिम-विरोधी कट्टरता से उसका संबंध अपेक्षाकृत कम होता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। पोलियो का उन्मूलन करने के लिए प्रतिबद्ध लोग जब यह समझ लेंगे कि टीकाकरण कार्यक्रम किस राजनीतिक संदर्भ में चलते हैं तभी वे सफल होंगे।