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पश्चिम-विरोधी आतंक की पश्चिमी जड़ें

बर्लिन – पेरिस में इस्लामी राज्य के भीषण हमले इस बात की बखूबी याद दिलाते हैं कि पश्चिमी शक्तियाँ मध्य पूर्व में अपने हस्तक्षेप के अनचाहे परिणामों को रोक नहीं सकती हैं - उनसे स्वयं को सुरक्षित तो बिल्कुल नहीं रख सकती हैं। सीरिया, इराक और लीबिया की स्थिति को सुलझाने, और साथ ही गृह युद्ध के कारण यमन की दोफाड़ स्थिति के फलस्वरूप जो हत्या के बड़े क्षेत्र तैयार हो गए हैं, शरणार्थियों की भारी फ़ौज तैयार हो गई है, और इस्लामी उग्रवादी पैदा हो गए हैं, वे आने वाले वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने रहेंगे। और पश्चिम का इससे कोई खास लेना-देना नहीं है।

जाहिर तौर पर, मध्य पूर्व में पश्चिमी हस्तक्षेप कोई नई घटना नहीं है। ईरान, मिस्र और तुर्की के अपवादों को छोड़कर, मध्य पूर्व में हर प्रमुख शक्ति मुख्य रूप से ब्रिटिश और फ्रेंच द्वारा बनाया गया एक आधुनिक निर्माण है। 2001 के बाद से अफगानिस्तान और इराक में संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाले हस्तक्षेप पश्चिमी शक्तियों द्वारा क्षेत्र की भू-राजनीति को ठीक करने के लिए किए गए अभी हाल के प्रयास को दर्शाते हैं।

लेकिन इन शक्तियों ने हमेशा परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करने को प्राथमिकता दी है, और यही रणनीति - उन जिहादियों को प्रशिक्षण, निधियाँ और शस्त्र देना जिन्हें "उग्रवादियों" के खिलाफ लड़ने के लिए "नरमपंथी" समझा जाता है - आज पलटवार कर रही है। बार-बार इसके विपरीत सबूत मिलने के बावजूद, पश्चिमी शक्तियाँ एक ऐसे दृष्टिकोण के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं जिससे उनकी स्वयं की आंतरिक सुरक्षा को खतरा है।

यह तो स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि हिंसक जिहाद को छेड़नेवाले कभी भी नरमपंथी नहीं हो सकते हैं। फिर भी, यह स्वीकार कर लेने के बाद भी कि अधिकतर फ्री सीरियन आर्मी के सीआईए-प्रशिक्षित सदस्य भाग कर इस्लामी राज्य में चले गए हैं, अमेरिका ने हाल ही में सीरिया के विद्रोहियों के लिए नई सहायता के रूप में लगभग $100 मिलियन देने का वचन दिया है।