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मोदी सरकार का एक साल

नई दिल्ली – प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली, भारत की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार इस महीने अपने कार्यकाल की पहली वर्षगाँठ मनाएगी। हालाँकि इसके समग्र प्रदर्शन का अभी आकलन करना बहुत जल्दी होगा, भारत भर में अभी तक अधिकतर लोगों में जो भावना है वह निराशापूर्ण ही है।

एक दशक तक कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (यूपीए) की विरोधी पार्टी के रूप में बने रहने के बाद भाजपा उम्मीदों की लहर पर सवार होकर सत्ता में आई। (पूर्ण प्रकटीकरण: मैं यूपीए सरकार का एक सदस्य था।) वास्तव में, भाजपा के लिए समर्थन इतना अधिक मज़बूत था कि यह लोकसभा (भारत की संसद के निचले सदन) में बहुमत से जीतने वाली 30 वर्षों में पहली पार्टी बन गई।

भाजपा सरकार के लिए शुरूआती उत्साह इसके पूर्ववर्ती के साथ तथाकथित विपरीत अनुभव पर आधारित था। यहाँ, आखिरकार अब एक ऐसी मजबूत एक-दलीय सरकार थी जिसका नेतृत्व एक निर्णायक "कार्रवाई करनेवाले व्यक्ति" द्वारा किया जा रहा था, न कि किसी झगड़ालू गठबंधन द्वारा जिसका नेतृत्व एक अस्सी साल के मितभाषी बूढ़े द्वारा जिसे अक्सर गलत तरीके से अनिश्चितता और असमंजस में पड़े हुए व्यक्ति के रूप में हास्यात्मक तरीके से चित्रित किया जाता था।

मोदी को मतदाताओं के सामने एक कूटनीतिपूर्ण (और उदारतापूर्वक वित्तपोषित) चुनाव अभियान के ज़रिए पेश किया गया जिसमें उन्हें व्यापार की समझ रखने वाले एक ऐसे नेता के रूप में चित्रित किया गया जिसने गुजरात राज्य को विकास के मॉडल में बदल दिया था और जो पूरे देश के लिए भी यही करेगा। युवा लोगों को नौकरियों के वादे के साथ, और पुराने मतदाताओं को सुधार और विकास की संभावना के साथ आकर्षित करके, मोदी ने एक ऐसा जनादेश हासिल किया जिसे देखकर देश के जनमत सर्वेक्षक दंग रह गए। इस बीच, कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया।