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सुरक्षित पदार्थ कैसे ख़तरनाक बन जाते हैं

पैलो आल्टो – सोलहवीं सदी में आविष विज्ञान के विकास के बाद से, इसका मार्गदर्शी सिद्धांत यह रहा है कि "खुराक विष बना देती है।" यह एक ऐसा नियम है जो दुनिया भर में रोगियों द्वारा एक दिन में अरबों बार इस्तेमाल की जानेवाली दवाओं पर लागू होता है। एस्पिरिन की सही खुराक एक चिकित्सकीय वरदान हो सकती है, लेकिन इसकी बहुत ज्यादा मात्रा लेने पर यह घातक हो सकती है। यह सिद्धांत खाद्य पदार्थों पर भी लागू होता है: भारी मात्रा में जायफल या मुलहठी का सेवन गंभीर रूप से विषकारक होता है।

किसी पदार्थ से कितना जोखिम हो सकता है यह मोटे तौर पर दो कारकों पर निर्भर करता है: नुकसान पहुँचाने की इसकी निहित क्षमता और किसी व्यक्ति द्वारा उसके उपयोग की आदत। यह एक सामान्य सी बात है, लेकिन फिर भी कुछ अड़ियल पेशेवरों को यह बात समझ में नहीं आती है - जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक घटक, कैंसर पर अनुसंधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी (आईएआरसी) द्वारा आमतौर पर इस्तेमाल किए जानेवाले वनस्पति नाशक 2,4-डी को "मनुष्य के लिए संभवतः कैंसरकारी" के रूप में वर्गीकृत करने के लिए किए गए निर्णय से पता चलता है।

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जब वनस्पति नाशकों की बात उठती है, तो आईएआरसी हमेशा पिछड़ जाता है। इस संगठन ने हाल ही में एक और लोकप्रिय वनस्पति नाशक ग्लाइफोसेट को "संभवतः" कैंसरकारी के रूप में वर्गीकृत किया है, यह एक ऐसा निष्कर्ष है जो दुनिया भर की नियामक एजेंसियों के निष्कर्षों से उलट है।

इसी तरह, एक भी सरकारी एजेंसी ने 2,4-डी को कैंसरकारी नहीं माना है। इस साल के आरंभ में, संयुक्त राज्य अमेरिका पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि "उपलब्ध आंकड़ों के साक्ष्य पर विचार करने के आधार पर, 2,4-डी को 'मनुष्यों के लिए कैंसरकारक होने की संभावना नहीं है' के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।" यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने भी हाल ही में यह निष्कर्ष निकाला है कि "2,4-डी, जिस रूप में वर्तमान में निर्मित हो रहा है, उसमें जेनोटोक्सिक क्षमता होने या मनुष्यों के लिए कैंसरकारी होने का खतरा पैदा करने की संभावना नहीं है।"

आईएआरसी द्वारा 2,4-डी और ग्लाइफोसेट जैसे पदार्थों को संभावित रूप से हानिकारक के रूप में वर्गीकृत करने का निर्णय लेने के फलस्वरूप किसानों और उपभोक्ताओं के बीच चिंता पैदा होने की संभावना है जो वाणिज्यिक कृषि या बागवानी में इसके निरंतर उपयोग के औचित्य के बारे में आश्चर्य करेंगे। यह एक शर्म की बात होगी, क्योंकि ये बेहद प्रभावी और बहुत अधिक इस्तेमाल किए जानेवाले वनस्पति नाशक हैं, और आईएआरसी अपने निर्णय लेते समय यह विचार नहीं करता है कि वास्तविक दुनिया में संबंधित पदार्थ से वास्तव में कैंसर के पैदा होने की संभावना है या नहीं। इसके पैनल यह आकलन नहीं करते हैं कि क्या अमुक रसायन से कैंसर होगा - यह केवल तभी होगा यदि वह कैंसर पैदा करने में सक्षम हो।

परिणामस्वरूप, आईएआरसी ने बहुत पहले एलो वेरा, एक्रिलामाइड ( फ्रेंच फ्राइज़ और आलू के चिप्स जैसे खाद्य पदार्थों को तलने से बननेवाले पदार्थ), सेल फोन, रात की पालियों में काम करने, एशियाई मसालेदार सब्जियों, और कॉफी को "संभावित" या "संभव" कैंसरकारक के रूप में वर्गीकृत किया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह खुराक पर ध्यान नहीं देता है, इस पर विचार करने में विफल रहता है कि वास्तविक नुकसान पहुँचाने के लिए पदार्थ की पर्याप्त मात्रा के संपर्क में आने की कितनी संभावना है। उदाहरण के लिए, कॉफी के मामले में, किसी भी हानिकारक प्रभाव की संभावना बनने से पहले व्यक्ति को लगातार लंबी अवधि तक, एक दिन में 50 से अधिक कप पीने की आवश्यकता होगी।

2,4-डी को मनुष्यों के लिए कैंसर के खतरे के रूप में वर्गीकृत करते समय, कीटनाशक अवशेष पर संयुक्त राष्ट्र डब्ल्यूएचओ/एफएओ की संयुक्त बैठक (JMPR) सहित, दुनिया भर में स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा किए गए व्यापक अनुसंधान और विश्लेषण पर ध्यान नहीं दिया गया है।  यह संस्था मिट्टी और आसपास के पानी, उपचार किए गए खेतों मे से गुजरने वाले जानवरों के लिए जोखिम की मात्राओं, और प्रत्यक्ष मानवीय संपर्क की संभावना जैसे वास्तविक दुनिया के परिवर्तनशील तत्वों पर विचार करते हुए 2,4-डी जैसे पदार्थों के जोखिमों का मूल्यांकन करती है।

1970 में आरंभ की गई समीक्षाओं में, JMPR ने हमेशा यह पाया है कि जब 2,4-डी का सही ढंग से इस्तेमाल किया जाता है तो यह जमीन या पानी पर किसी के लिए या किसी भी चीज़ के लिए स्वास्थ्य का कोई खतरा पैदा नहीं करता है। इस निष्कर्ष की यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण, ईपीए, अमेरिका के कृषि विभाग, और स्वास्थ्य कनाडा सहित कई सरकारी एजेंसियों द्वारा पुष्टि की गई है।

आईएआरसी जब अपने पैनलों को केवल सीमित रूप से चयनित  प्रकाशनों पर विचार करने के लिए प्रतिबंधित करता है, तो वह एक गलत निर्णय करता है, जिसके प्रभाव हानिकारक होते हैं। इसके फैसले सुर्खियाँ बटोरनेवाले रसायनभीरू कार्यकर्ताओं को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं और यह संभावना होती है कि जिन पदार्थों को गलत तरीके से हानिकारक के रूप में चिह्नित किया गया है उनका स्थान दूसरे उत्पाद ले लेंगे जो बहुत अधिक जोखिम पैदा कर सकते हैं या बहुत कम लाभ प्रदान कर सकते हैं।

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यदि ग्लाइफोसेट और 2,4-डी जैसे उत्पादों का उपलब्ध होना बंद हो जाए, तो किसानों को मजबूर होकर खरपतवार को नियंत्रित करने के अन्य तरीकों का सहारा लेना पड़ जाएगा – जिनमें से कोई भी उतना कारगर नहीं होगा। वास्तव में, अन्य कई विकल्प और अधिक विषाक्त हो सकते हैं या उनके कारण अधिक जुताई की आवश्यकता हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी के कटाव को क्षति पहुँच सकती है, कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जनों में वृद्धि हो सकती है, फसल की पैदावार में कमी हो सकती है, उत्पादन लागतें अधिक हो सकती हैं, और उपभोक्ता मूल्य उच्च हो सकते हैं।

और यह समस्या किसानों तक ही सीमित नहीं रहेगी। वानिकी में घास के मैदानों पर कैंसरकारी खरपतवार के नियंत्रण, और राजमार्गों, बिजली लाइन के गलियारों, और रेल लाइनों पर सुरक्षा बढ़ाने सहित 2,4-डी के 100 से अधिक निर्धारित उपयोग हैं। आईएआरसी निष्कर्षों पर पहुँचने में जिस प्रक्रिया का उपयोग करता है वह न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत है; बल्कि हानिकारक है। इसके निर्णय, जिनका व्यापक प्रभाव पड़ता है, मानव जीवन और अन्य पशुओं के जीवन के लिए सबसे अधिक खतरा उत्पन्न करते हैं - चाहे खुराक कितनी भी क्यों न हो।