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जल की हर बूँद से अधिक फसल

स्टैनफोर्ड – संयुक्त राष्ट्र ने सूखे को “दुनिया की सबसे महँगी प्राकृतिक आपदा” कहा है, आर्थिक दृष्टि से इसकी वार्षिक लागत 6-8 बिलियन डॉलर है, और मानवीय दृष्टि से इसने सन् 1900 से लेकर अब तक दो बिलियन लोगों को प्रभावित किया है, जिसके फलस्वरूप 11 मिलियन से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा असुरक्षित है; वर्तमान में प्रभावित क्षेत्रों में ऑस्ट्रेलिया, उप सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका और मध्य पूर्व शामिल हैं।

यह देखते हुए कि दुनिया भर में औसत रूप से पानी की 70% खपत कृषि में होती है, यह तर्कसंगत लगता है कि इस क्षेत्र को संरक्षण के उपायों का केंद्रबिंदु होना चाहिए। और, वास्तव में, एक सिद्ध प्रौद्योगिकी मौजूद है जो सूखे के प्रभाव को कम करने की दिशा में बहुत कारगर हो सकती है: जेनेटिक इंजीनियरिंग (जीई)।

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जेनेटिक इंजीनियरिंग (जीई), जिसे कभी-कभी "आनुवंशिक सुधार" कहा जाता है, पौधा प्रजनकों को मौजूदा फसल के पौधों को कुछ नई चीजें करने के लिए सक्षम बनाते हैं – जैसे कि जल का संरक्षण करना। अनुसंधान और विकास कार्य में कार्यकर्ताओं के प्रतिरोध और सरकार के अत्यधिक विनियमन के फलस्वरूप बाधा उत्पन्न होने के बावजूद, दुनिया के कई हिस्सों में सूखा-प्रतिरोधी जीई फसल की किस्में विकास प्रक्रिया में से उभर कर आ रही हैं।

पिछले दो दशकों में ऐसी फसल किस्मों की खेती लगभग 30 देशों में 17 मिलियन से अधिक किसानों द्वारा 1.5 बिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि पर की गई है – और इससे किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में कोई खलल नहीं पड़ा या किसी तरह का कोई पेट दर्द जैसा भी कुछ नहीं हुआ। लैंडेस बायोसाइंस की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में, इन नई किस्मों से “खेत स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण शुद्ध आर्थिक लाभ प्राप्त हुए हैं, 2012 में इनकी राशि 18.8 बिलियन डॉलर थी और 1996 से लेकर 2012 तक 116.6 बिलियन डॉलर थी।

इन नई फसल किस्मों में से अधिकांश, शस्यनाशकों को रोकने के लिए तैयार की गई हैं ताकि किसान अधिक पर्यावरण अनुकूल, जुताई-रहित खेती प्रथाओं को अपना सकें, और इनमें से बहुत-सी किस्मों को फसलों को तबाह करनेवाले कीटों और बीमारियों को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है। दूसरी किस्मों में उच्च पोषण मान होता है, जो किसी विकासशील देश की उन आबादियों के लिए आदर्श रूप से अनुकूल होता है जो स्वस्थ, उत्पादक जीवन जीने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को प्राप्त करने के लिए संघर्षरत होती हैं।

लेकिन, लंबी अवधि में, सबसे बड़ा वरदान, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण दोनों के लिए, संभवतः नई फसल किस्मों की सूखे की अवधियों और अन्य जल-संबंधी तनावों को सहन करने की क्षमता होगा। सिंचाई के लिए उपयोग किए जानेवाले पानी की मात्रा में थोड़ी-सी कमी से भी, विशेष रूप से सूखे की स्थितियों में, भारी लाभ हो सकते हैं।

ऐसी किस्मों को विकसित करने के लिए, पादप जीवविज्ञानियों ने पानी के उपयोग को नियंत्रित करने वाले जीन की पहचान की और उन्हें महत्वपूर्ण फसल पौधों में स्थानांतरित कर दिया, जिससे वे कम या कम गुणवत्ता वाले पानी के साथ विकसित हो सकें, उदाहरण के लिए ऐसा पानी जिसका पुनर्चक्रण किया गया हो या जिसमें प्राकृतिक खनिज लवण अधिक मात्रा में हों। मिस्र के शोधकर्ताओं ने यह दर्शाया है कि केवल एक जीन को जौ से गेहूं में स्थानांतरित करने पर, पौधे कम पानी मिलने की स्थिति को लंबे समय तक सहन कर सकते हैं। इस नई, सूखा-प्रतिरोधी किस्म के लिए परंपरागत गेहूं की तुलना में केवल उसके आठवें हिस्से जितनी सिंचाई की ही आवश्यकता होती है; कुछ रेगिस्तानों में इसकी खेती अकेले वर्षा के साथ की जा सकती है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग (जीई) फसल की अन्य किस्मों, उदाहरण के लिए जो रोग-प्रतिरोधी और कीट-प्रतिरोधी होती हैं, से परोक्ष रूप से पानी के उपयोग की कुशलता में सुधार होता है। क्योंकि रोगों और कीटों के कारण होनेवाला नुकसान ज्यादातर पौधों के पूरी तरह से बड़े हो जाने के बाद – अर्थात उनके विकास के लिए आवश्यक पानी की अधिकतर आपूर्ति कर दिए जाने के बाद होता है – इसलिए उनके प्रतिरोध का अर्थ प्रति इकाई निवेश किए गए पानी की दृष्टि से अधिक कृषि उत्पादन है। संक्षेप में, किसान हर बूंद से अधिक फसल प्राप्त कर सकते हैं।

आण्विक जेनेटिक इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकी से अन्य तरीकों से भी जल संरक्षण किया जा सकता है। दुनिया भर में सिंचित भूमि का एक-तिहाई भाग नमक की उपस्थिति के कारण फसलों को उगाने के लिए उपयुक्त नहीं होता है – यह बारंबार उर्वरकों का उपयोग करने का परिणाम है। प्रतिवर्ष खेती के लिए अयोग्य हो जानेवाली 2,00,000 हेक्टेयर से अधिक सिंचित भूमि को फिर से हासिल करने के लिए, वैज्ञानिकों ने टमाटर और कनोला जैसी विविध प्रकार की फसलों में नमक की सहिष्णुता में वृद्धि की है। आनुवांशिक रूप से रूपांतरित पौधे खारी मिट्टी में विकसित हो सकते हैं और उनकी खारे पानी से सिंचाई की जा सकती है, जिससे ताज़े जल का अन्य उपयोगों के लिए संरक्षण किया जा सकता है।

इसके लाभों को देखते हुए, यह उम्मीद की जा सकती है कि ऐसी घटनाओं की सर्वत्र सराहना की जाएगी और उन्हें प्रोत्साहित किया जाएगा। लेकिन इन्हें भारी विनियामक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, यूरोप काफी हद तक जेनेटिक इंजीनियरिंग (जीई) की फसलों पर प्रतिबंध लगाता है; भारत ने कीट-प्रतिरोधी कपास को तो मंजूरी दी है, लेकिन उसने किसी प्रकार की खाद्य फसलों के लिए मंजूरी नहीं दी है। जहाँ जीई फसलों की खेती की भी जा रही है, वहाँ अवैज्ञानिक और जरूरत से ज्यादा भारी विनियमन के फलस्वरूप फसलों की नई किस्मों के उत्पादन की लागत में भारी वृद्धि हुई है, जिससे कई संभावित महत्वपूर्ण फसलें बाजार से बाहर हैं।

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ये उपाय अविवेकपूर्ण हैं क्योंकि वे जोखिम से विपरीत रूप से संबंधित हैं। वे काफी हद तक पौधों और सूक्ष्मजीवों की उन नई किस्मों का अनियमित उपयोग करने की अनुमति देते हैं जो कम सही और कम विश्वसनीय तकनीकों से तैयार की गई होती हैं, जिसमें उनका बहाना यह होता है कि वे किसी रूप में अधिक "प्राकृतिक" हैं जबकि वे अत्यधिक उन्नत ज्ञान और तरीकों पर आधारित किस्मों को कठोरतापूर्वक विनियमित – या वर्जित भी – कर देते हैं।

जैसे-जैसे जल की कमी बढ़ेगी, सूखे से प्रभावित फसलें सूखने लग जाएँगी, और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि होगी, जिसके फलस्वरूप लोचदार कृषि की आवश्यकता और अधिक स्पष्ट – तथा और अधिक आवश्यक हो जाएगी। अधिक तर्कसंगत सार्वजनिक नीति के साथ, हम उस जरूरत को अब पूरा कर सकते हैं। सवाल यह है कि इससे पहले कि हमारे नीति निर्माता इसका औचित्य देख पाएँ, रोकी जा सकनेवाली विपदा और मृत्यु कितने और समय तक होती रहनी चाहिए?