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सुशासन का जाल

रोम – विकास और बेहतर शासन, इन दोनों में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की प्रवृत्ति पाई जाती है। लेकिन आम धारणा के विपरीत, इसकी सत्यता कहीं दिखाई नहीं देती कि शासन संबंधी सुधारों को सफलतापूर्वक लागू करने के कारण आर्थिक और सामाजिक विकास अधिक तीव्र और समावेशी होता है। वास्तव में, स्थिति इससे बिलकुल उलट हो सकती है।

सुशासन पर ध्यान दिया जाना उस समय शुरू हुआ, जब 1980 के दशक में विकासशील देश ऋणग्रस्तता के संकट से उबरकर स्थायी विकास की जद्दोजहद में लगे हुए थे।  अंतर्राष्ट्रीय विकास संस्थाओं ने मौजूदा आर्थिक-नीति के दृष्टिकोण का पुनर्मूल्यांकन करने के बजाय, आसान लक्ष्यों अर्थात विकासशील देशों की सरकारों को लक्ष्य बनाया।  उन सरकारों को यह परामर्श देना कि ��न्हें अपने कार्य कैसे करने चाहिए, इन संस्थाओं का नया धंधा बन गया, और उन सरकारों ने शीघ्र ही शासन सुधार के नए “तकनीकी” तरीके विकसित करने शुरू कर दिए।

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विश्व बैंक ने 100 से भी अधिक सूचकांकों का उपयोग करते हुए सुशासन का एक समग्र सूचकांक शुरू किया, जो अभिव्यक्ति और जवाबदेही, राजनीतिक स्थिरता और हिंसा हीनता के बोध, सरकार की प्रभावशीलता, नियामक संस्थाओं की गुणवत्ता, क़ानून और भ्रष्टाचार के स्तरों पर आधारित था।  विश्व बैंक ने यह दावा करते हुए कि उसने अपने शासन सूचकांकों और आर्थिक निष्पादन के बीच गहरा सहसंबंध ढूँढ़ लिया है, इस आशा को जागृत किया कि उसके हाथ आर्थिक प्रगति की कुंजी लग गई है।

यह मामला शुरूआत से ही दोषपूर्ण था।  प्रयुक्त सूचकांक गैर-पारंपरिक थे और उनमें देश-विशिष्ट चुनौतियों और परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा गया था, साथ ही देशभर के सांख्यिकीय विश्लेषणों का चयन पूर्वग्रहपूर्ण रहा और भारी मात्रा में चरों के पारस्परिक अंतरर्संबंधों को अनदेखा किया गया था।  परिणामस्वरूप, विश्व बैंक ने आर्थिक वृद्धि पर शासन सुधार के प्रभाव का भारी अतिरेकपूर्ण अनुमान लगाया।

निश्चित रूप से, जो शासन प्रभावशाली, न्यायसंगत और जवाबदेह होता है, उससे अनायास लाभ दिखाई पड़ने लगते हैं, विशेषकर उस समय, जब उसकी तुलना ऐसे वैकल्पिक शासन से की जाती है, जिसमें शासन की अक्षमता, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो।  लेकिन, विकास लाने के लिए शासन सुधार पर ध्यान केंद्रित करने का तरीका कहीं भी उतना अधिक प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुआ है जितना वायदा किया गया था।

वस्तुत: इस शासन केंद्रित तरीके ने विकास के प्रयासों को शायद नुकसान ही पहुँचाया है।  शुरूआत करनेवालों के लिए, इसके फलवरूप अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों के दौरान किए गए नए विकास के उस स्वरूप की कमियों को स्वीकार न करने का मौका मिल गया, जब लेटिन अमेरिका एक दशक की और उप-सहारा अफ़्रीका चौथाई सदी की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के मामले में पिछड़ गए थे।

इसने सरकारों के कार्य को भी अनावश्यक रूप से जटिल बना दिया है।  अब सुशासन संबंधी सुधार विकासशील देशों की सरकारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मदद हासिल करने की शर्त बन गए हैं, इसलिए सरकारें अपनी जनता की ज्वलंत समस्याओं के समाधान ढूँढ़ने के बजाय अक्सर दानदाताओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का ढोंग करने के लिए मजबूर हो जाती हैं।  वास्तव में, ये सुधार उन परंपरागत अधिकारों और प्रचलित दायित्वों को भी कमज़ोर कर सकते हैं, जिन्हें बनाने में समाज की कई पीढ़ियाँ खप गई हैं।

साथ ही, आवश्यक सुधारों का दायरा इतना अधिक व्यापक है कि उन्हें लागू करना अधिकांश विकासशील देशों के बूते से बाहर की बात है।  परिणामस्वरूप, सुशासन संबंधी समाधानों के अधिक असरदार विकासात्मक प्रयासों से दूर रहने की प्रवृत्ति बनती जा रही है।

शासन संबंधी सुधारों की एक और समस्या यह है कि वे भले ही औपचारिक रूप से तटस्थ होते हैं, परंतु वे अकसर विशेष लोगों के हितों के पक्षधर होते हैं, जिसके परिणाम हमेशा बहुत अधिक पक्षपातपूर्ण होते हैं।  जिन सुधारों का लक्ष्य विकेंद्रीकरण और हस्तांतरण होता है, उनसे कई बार स्थानीय स्तर पर राजनीति के बाहुबली संरक्षकों का उदय होता है।

निष्कर्ष बिलकुल साफ है: विकास के मुद्दे में शासन के सुधार को नहीं थोपा जाना चाहिए। जैसा कि हार्वर्ड की मेरिली ग्रिंडल ने कहा है, हमारा उद्देश्य “ठीक-ठाक” शासन होना चाहिए, और संभावनाओं की लंबी सूची से कुछ बेहद ज़रूरी चीज़ों को चुन लेना चाहिए।

लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपायों को चुनना आसान नहीं होगा।  वस्तुत: शासन सुधारों के हिमायती इनके सबसे असरदार तरीकों को शायद ही कभी ठीक तरह से समझ पाए हों।

संपत्ति के अधिकारों को सशक्त करने के प्रयासों के बारे में जोर-शोर से किए जाने वाले प्रचार पर गौर करें।  यह दावा किया गया है कि उत्पादक संसाधनों के हस्तांतरणीय व्यक्तिगत स्वामित्व को हटा देने पर, विकास पहलों को आगे बढ़ाने के लिए साधन और प्रोत्साहन अपर्याप्त हो जाएँगे, और साझा संसाधनों ("सामुदायिक") का बहुत अधिक दोहन किया जाएगा और उनका अकुशल रूप से उपयोग किया जाएगा।

यथार्थ में, यह तथाकथित “सामुदायिकता की त्रासदी” न तो सर्वव्यापी है और न ही अपरिहार्य, और निजी-संपत्ति अधिकार हमेशा सर्वोत्तम नहीं होते हैं – और न ही ये सामाजिक दुविधाओं से निपटने के लिए एकमात्र संस्थागत समाधान होते हैं।  अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता स्वर्गीय एलिनॉर ऑस्ट्रोम ने यह दिखाया कि मानव समाजों ने सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग से संबंधित विभिन्न प्रकार की दुविधाओं के समाधान के लिए बेशुमार रचनात्मक और टिकाऊ समाधान बनाए हैं।

वैश्विक सुशासन का विषय बहुपक्षीय विकास बैंकों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों जैसे बड़े नौकरशाही संगठनों के लिए विशेष आकर्षण रखता है, जो वास्तविक रूप से राजनीतिक समस्याओं के गैर-राजनीतिक समाधान ढूँढ़ने के पक्ष में होते हैं।  दूसरे शब्दों में, सुशासन स्पष्ट रूप से एक ऐसा तकनीकी जवाब है, जिसे दानदाता और अन्य संभ्रांत अंतर्राष्ट्रीय समूह घटिया नीतियाँ और विशेष रूप से घटिया राजनीति मानते हैं।

इसी में सुशासन के मुद्दे की असली समस्या निहित है: इसमें यह मान लिया जाता है कि अधिकांश नीतियों और राजनीतिक दुविधाओं का समाधान औपचारिक प्रक्रिया-उन्मुख सूचकांकों के अनुपालन में छुपा हुआ है। परंतु दो दशकों से अधिक समय का अनुभव यह बताता है कि ऐसे निर्देश इस यथार्थ दुनिया के आर्थिक विकास से जुड़ी तकनीकी, सामाजिक और राजनीतिक रूप से जटिल समस्याओं का व्यावहारिक मार्गदर्शन बहुत कम देते हैं।

यह देखते हुए कि विकास होने के साथ शासन में सुधार होता है, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए यह उपयोगी होगा कि वह सीधे विकास को बढ़ाने वाले सुधारों को अपनाए, न कि ऐसे व्यापक कार्यक्रम को जिसका थोड़ा-सा परोक्ष प्रभाव हो।  शासन सुधारने का यह व्यावहारिक तरीका न तो हठधर्मितापूर्ण है और न ही सार्वभौमिक होने का दिखावा करता है।  बल्कि इससे मुख्य बाधाओं की संभवत: एक-एक कर पहचान की जा सकेगी, उनका विश्लेषण किया जा सकेगा और उन्हें सुलझाया जा सकेगा।

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सुशासन संबंधी मुद्दों के महत्वपूर्ण लक्ष्यों – सशक्तीकरण, समावेशन, सहभागिता, सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता और जवाबदेही – में से कई लक्ष्यों को कामचलाऊ समाधान बनाया जा सकता है, इसलिए नहीं कि यह बाह्य लोगों की मांग है, बल्कि इसलिए कि प्रभाव�� समाधानों के लिए इनकी ज़रूरत है।  ऐसे समाधान संबंधित अनुभवों से निकाले जाने चाहिए, इसमें यह समझ लेना चाहिए कि ये वास्तव में “सर्वश्रेष्ठ तरीके” नहीं हैं।

सुशासन के अंधानुकरण ने विकासात्मक प्रयासों का बहुत लंबे अरसे तक मार्गदर्शन किया है।  अब समय आ गया है कि जो कारगर है उसे स्वीकार करें, और जो कारगर नहीं है उसे त्याग दें।