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सभी को शिक्षित करना

एडिनबर्ग – मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) द्वारा निर्धारित इस लक्ष्य को प्राप्त करने में भारी रुकावटें सामने आ रही हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि दिसंबर 2015 तक स्कूल जाने की आयु वाला हर बच्चा स्कूल में हो। चूंकि हाल के महीनों में गाज़ा, सीरिया, इराक और नाइजीरिया में बच्चे वास्तव में युद्ध की पहली पंक्ति में लगे हुए हैं, इसलिए चुनौती की व्यापकता उतनी अधिक स्पष्ट नहीं दिखाई दे पा रही है। यह सब होते हुए भी, सार्वभौमिक शिक्षा के वायदे को पूरा करने के लिए यह ज़रूरी है कि बाल शरणार्थी और युद्ध क्षेत्रों में रहनेवाले बच्चे जो सबसे अधिक कठिन परिस्थितियों में रहते हैं, सुरक्षित रूप से बुनियादी शिक्षा प्राप्त कर सकें।

शैक्षिक अनुसंधान से यह पता चलता है कि कोई भी देश निरंतर समृद्धि का लाभ नहीं उठा सकता – और कोई भी देश मध्यम आय के जाल से नहीं बच सकता – जब तक कि वह उच्च गुणवत्ता की शिक्षा में भारी मात्रा में निवेश नहीं करता है। यह बात आज की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के लिए विशेष रूप से सच है जिसमें कंपनियाँ अपना स्वयं का मूल्यांकन केवल भौतिक संपत्तियों के अनुसार नहीं बल्कि अपनी मानव संपत्तियों के अनुसार करती हैं, और शेयर बाजार भौतिक पूंजी के अतिरिक्त बौद्धिक पूंजी का भी मूल्यांकन करते हैं।

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शिक्षा को एक अरसे से आय, धन, हैसियत, और सुरक्षा की गारंटी की दृष्टि से सर्वोपरि माना गया है। इसके बावजूद, लाखों लोग लगातार इससे वंचित रहे हैं या इसमें पिछड़ गए हैं, और दुनिया के लगभग आधे बच्चों को अभी भी बुनियादी शिक्षा तक पहुँच उपलब्ध नहीं है।

यह सुनिश्चित करने के लिए, मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) शुरू किए जाने के बाद पहले पाँच वर्षों में भारी प्रगति हुई थी, प्राथमिक और निम्न माध्यमिक विद्यालयों में नामांकनों में 1.5% वार्षिक की बढ़ोतरी हुई। इस राह पर चलते हुए, 2022 तक नामांकन दर दुनिया भर में 97% तक पहुँच जाएगी, और उप सहारा अफ्रीका इस स्तर को 2026 तक प्राप्त कर लेगा।

लेकिन 2005 के बाद, प्रगति ठप हो गई। परिणामस्वरूप, दुनिया के सबसे गरीब देशों में केवल 36% बच्चे ही निम्न-माध्यमिक विद्यालय तक की शिक्षा पूर्ण कर पाते हैं। 2030 तक, यह दर बढ़ तो चुकी होगी, लेकिन केवल 54% तक ही।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ग्रामीण समुदायों में लड़कियों को सबसे अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। आज, लगभग तीन-चौथाई लड़कियों को बुनियादी प्राथमिक शिक्षा नहीं मिल पाती है; 2030 में, इनमें से आधी फिर भी वंचित रह जाएँगी। इसी तरह, लगभग 90% लड़कियाँ आज माध्यमिक शिक्षा को पूरा करने में असमर्थ रहती हैं; 2030 तक, इस संख्या में केवल 20% तक की ही कमी होगी। और, उप-सहारा अफ़्रीका में प्राथमिक शिक्षा तक पहुँच प्राप्त करने के लिए लड़कों को जहाँ 2069 तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, वहीं लड़कियों को 2086 तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जहाँ तक निम्न-माध्यमिक शिक्षा का प्रश्न है, इसमें लगभग एक शताब्दी लग जाएगी, यदि मौजूदा प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं, तो उप सहारा अफ्रीका में सभी लड़कियों के लिए शिक्षा तक पहुँच को सुनिश्चित करने में लगभग एक शताब्दी लग जाएगी।

इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो 'वैश्विक नेताओं' के इस वादे से मेल खाता हो कि वे दुनिया भर के सभी बच्चों की प्रतिभाओं को विकसित करेंगे। हाल ही के एक अध्ययन से पता चलता है कि अफ्रीका शिक्षा के अवसरों के मामले में अब तक इतना अधिक पीछे है कि 2025 में रवांडा, चाड, लाइबेरिया, और मलावी में तीस वर्ष से अधिक आयु वाले केवल 2% युवा वयस्कों को - और तंजानिया और बेनिन में केवल 3% को किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय की शिक्षा प्राप्त होगी। तृतीयक शिक्षा के ऐसे निम्न स्तरों के कारण, अगली पीढ़ी के लिए योग्य शिक्षकों को नियुक्त कर पाना न केवल असंभव हो जाएगा, बल्कि चिकित्सा केन्द्रों और क्लीनिकों के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित स्वास्थ्य पेशेवरों को नियुक्त कर पाना भी असंभव हो जाएगा - ये ऐसी असफलताएँ हैं जो प्रत्यक्ष रूप से खराब शिक्षा, खराब स्वास्थ्य, बेरोजगारी और गरीबी के अंतहीन चक्र को निरंतर जारी रखती हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि कुछ अफ्रीकी देश - जैसे अल्जीरिया, नाइजीरिया और मिस्र - इस प्रवृत्ति को रोकने में सफल हो सकते हैं। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में भी - जो वर्तमान में अफ्रीका का सबसे अधिक विकसित देश है - 2045 तक अधिक से अधिक 10% युवा वयस्कों के पास ही कॉलेज या विश्वविद्यालय की डिग्री होगी।

इस बीच, पाकिस्तान में, मलाला युसुफ़ज़ई के नेतृत्व में चलाए जा रहे एक साहसपूर्ण अभियान से तृतीयक शिक्षा के साथ युवा वयस्कों के हिस्से को बढ़ाने में मदद मिल रही है, जो 2010 में मात्र 7% था। लेकिन ये लाभ मामूली हैं; 2045 तक भी, इनका अंश 15% से अधिक होने की संभावना नहीं है। नेपाल के मामले में उम्मीद की जाती है कि वह तृतीयक शिक्षा के क्षेत्र में अधिक तेज़ी से वृद्धि कर पाएगा, लेकिन इसके न्यून आधार के फलस्वरूप इसका 2045 का स्तर लगभग 16% होने की संभावना है।

यहाँ तक कि भारत जैसी प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्था में 2010-2045 तक केवल 11% की प्रगति होगी जिससे वह केवल 23% तक पहुँच पाएगी - यह स्तर उच्च शिक्षा के उसके संस्थानों की वैश्विक प्रतिष्ठा द्वारा सुझाए गए स्तर से बहुत ही कम है। इस बीच, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और जापान में, कॉलेज या विश्वविद्यालय की डिग्री वाले युवा वयस्कों की हिस्सेदारी 80-90% तक पहुँच जाएगी।

आर्थिक विकास और प्रौद्योगिकी प्रगति से अनिवार्य रूप से सभी के लिए अधिक अवसर उपलब्ध होंगे यह धारणा बहुत हद तक ख़्याली पुलाव ही है। वास्तव में, जब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया जाता है तब तक शिक्षा - और इस तरह आर्थिक - अवसर आने वाले वर्षों में तेजी से असमान होता जाएगा।

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लेकिन असली विभाजन शिक्षित और अशिक्षित के बीच नहीं है; यह उन लोगों के बीच है जिनकी शिक्षा तक पहुँच है और जो लोग इसे चाहते हैं। लंबे समय से उपेक्षित ये लोग सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर तब तक दबाव बनाना जारी रखेंगे जब तक शिक्षा के लिए हर व्यक्ति के मौलिक अधिकार का सम्मान नहीं किया जाता है। और उनके अभियान में अगला पड़ाव न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा है जिसमें सभी देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले सैकड़ों युवा लोग दुनिया के नेताओं से परिवर्तन की मांग करने के लिए एकत्र होंगे।

दुनिया भर में जब विद्यालयों के द्वार फिर से खुलेंगे, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दुहराना चाहिए कि हर बच्चे को, हर जगह, इन द्वारों में प्रवेश करने का एक मौका अवश्य मिले।