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जीएमओ और बेकार विज्ञान

स्टैनफ़ोर्ड - आज के मीडिया परिदृश्य में, जहां निराधार धारणाएँ, प्रचार, और अफवाहें व्याप्त हैं, वैज्ञानिक विधि वास्तविकता की कसौटी के रूप में काम कर सकती है, यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा हम अनुभवजन्य और प्रामाणिक साक्ष्य के आधार पर यह निर्धारित करते हैं कि सच क्या है। विज्ञान हमें सक्षम बनाता है कि हम उस चीज़ का मूल्यांकन कर सकें जिसे हम जानते हैं और उस चीज़ की पहचान कर सकें जिसे हम नहीं जानते हैं।  सबसे महत्वपूर्ण बात है कि यह व्यक्तिगत या राजनीतिक कारणों से किए गए झूठे दावों का खंडन करता है – जो इसे कम-से-कम करना ही चाहिए।

लेकिन वैज्ञानिक कभी-कभी वैज्ञानिक पद्धति को छोड़कर - प्रायः कुख्याति या आर्थिक लाभ के लिए - मिथ्या प्रचार करने और विशेषज्ञता रहित परंतु जानकारी की भूखी जनता में भय पैदा करने के लिए “धूर्तता” पर उतर आते हैं।  वैज्ञानिक अधिकार का ऐसा द��रुपयोग विशेष रूप से “जैविक” और “प्राकृतिक” खाद्य उद्योगों में व्यापक रूप से हो रहा है जो लोगों के कृत्रिम या “अप्राकृतिक” उत्पादों के भय का लाभ उठाते हैं।

इसका एक ताजा उदाहरण भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक वी. ए. शिव अय्यादुरै का है जिन्होंने प्रभाकर देवनीकर के साथ मिलकर, अत्यंत हास्यास्पद लेख “क्या जीएमओ फ़ॉर्मेलडीहाइड संचित करते हैं और आण्विक प्रणालियों की समतुल्यताओं को बाधित करते हैं?” प्रकाशित किया है। इनके उत्तर सिस्टम्स बायोलॉजी से मिल सकते हैं।" (“जीएमओ” “आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव” होते हैं, जो स्वयं एक भ्रामक और अक्सर अनुचित रूप से लांछित गैर-श्रेणी है, जिसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग की सर्वाधिक अत्याधुनिक और सटीक तकनीकों से संशोधित जीवों की सृष्टि को सम्मिलित किया जाता है।)

हालाँकि यह लेख कथित तौर पर उस सहकर्मी-समीक्षा प्रक्रिया पर खरा उतरा है, जो विधि-सम्मत विज्ञान की प्रमुख घटक है, परंतु यह लेख कम प्रभाव वाली “पैसा देकर खेलो” पत्रिका, कृषि विज्ञान में प्रकाशित हुआ है जो एक “शिकारी” प्रकाशक द्वारा निकाली जाती है। इसके प्रकाशित होने के कुछ दिनों के भीतर, कार्बनिक उपभोक्ता संघ” और जीएमओ इनसाइड जैसे जैव प्रौद्योगिकी विरोधी संगठनों ने अय्यादुरै के “निष्कर्षों” पर डरावनी सुर्खियों के साथ रिपोर्टिंग करना आरंभ कर दिया - “जीएमओ सोया में फ़ॉर्मेलडीहाइड?” और “नए अध्ययन से पता चला है कि जीएमओ सोया कैंसरकारी रसायन फ़ॉर्मेलडीहाइड को संचित करता है” – इसके साथ डरावने चित्र भी दिए गए।

लेकिन अय्यादुरै के लेख के साथ समस्याएँ ज़्यादती की हैं।  यह दिखाने के लिए अकेले इसका शीर्षक ही पर्याप्त है कि इसमें कुछ गलत है। यदि आपको लगता है कि जीएमओ “फ़ॉर्मेलडीहाइड का संचय” कर सकते हैं – ऐसा रसायन जो उच्च स्तरों पर संभवतः कैंसरकारी हो सकता है, लेकिन यह अधिकतर जीवित कोशिकाओं में होता है और यह हमारे पर्यावरण में व्यापक रूप से पाया जाता है – इसकी स्पष्ट प्रतिक्रिया यह होगी कि जीवों में इसके स्तरों को मापा जाना चाहिए।  तथापि, अय्यादुरै ने “सिस्टम बायोलॉजी” के माध्यम से मॉडलिंग पर आधारित अनुमान लगाने का चुनाव किया।

“सिस्टम्स बायोलॉजी” से केवल पूर्वानुमान लगाया जा सकता है, इससे कोई प्रयोगात्मक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।  अय्यादुरै ने फ़ॉर्मेलडीहाइड और ग्लूटाथियोन नामक दो रसायनों के स्तरों का पूर्वानुमान लगाने के लिए पौधों में किन्हीं रसायनों के स्तरों का वास्तविक परीक्षण करने के बजाय, डेटा को कंप्यूटर की कलन-विधि में डाल दिया।  यह तो मानो ऐसा हुआ कि जैसे कोई मौसम विज्ञानी खिड़की से बाहर झाँक कर यह देखने के बजाय कि बारिश हो रही है या नहीं, अपने मॉडलों से यह पूर्वानुमान लगाने लगे कि पूरे दिन धूप रहेगी।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि, जैसा कि फ़्लोरिडा विश्वविद्यालय में बागवानी विज्ञान विभाग के अध्यक्ष, केविन फ़ोल्टा ने स्पष्ट किया है, सिस्टम्स बायोलॉजी तभी एक उपयोगी दृष्टिकोण हो सकता है जब इसका उपयोग सही तरीके से किया जाए।  जैसा कि उन्होंने बताया है, सिस्टम्स बायोलॉजी “एक ऐसा तरीका है जिसमें विद्यमान डेटा को समेकित करने पर आधारित पूर्वानुमान लगाए जाते हैं, और फिर उससे सांख्यिकीय रूप से इस संभावना का पता लगाया जाता है कि क्या पूर्वानुमान सही हो सकते हैं।"  लेकिन, वे इस बात पर जोर देते हैं कि उसके बाद पूर्वानुमानों का परीक्षण किया जाना चाहिए, “और सिस्टम्स के दृष्टिकोण की पुष्टि की जानी चाहिए।"

जैसा कि कंप्यूटर मॉडलिंग पर आधारित पूर्वानुमान के सभी अध्ययनों में होता है, परिणामों की वैधता डेटा और कलन-विधि की सत्यता पर निर्भर करती है। यदि डेटा को मॉडल तैयार करनेवाले के वांछित निष्कर्षों का समर्थन करने के लिए फलों की तरह चुना जाता है, या कलन-विधि दोषपूर्ण हो, तो परिणाम गलत होंगे। लेकिन अय्यादुरै के लेख से यह स्पष्ट नहीं है कि कौन से डेटा उपयोग में लाए गए थे, और मॉडल की भी कोई पुष्टि नहीं की गई है।

फ़ोल्टा ने अय्यादुरै के काम की बहुत बढ़िया तरीके से खिल्ली उड़ाई है। “यदि आपने कोई ऐसा कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया है, जो म्यूनिख के स्थान का पूर्वानुमान लगाने के लिए इंटरनेट के डेटा को एकीकृत करता है और इस प्रोग्राम ने आपको बताया कि यह वास्तव में फ़्लोरिडा के निकट, मैक्सिको की खाड़ी में है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि म्यूनिख फ़्लोरिडा के निकट, मैक्सिको की खाड़ी में है।” इसके बजाय, इसका मतलब यह है कि आपने अपने प्रोग्राम, अनुमानों, या इनपुट डेटा में कोई गलती की है - इन सभी का परीक्षण किया जा सकता है।

फ़ोल्टा अपनी बात जारी रखते हुए कहते हैं कि इन आंकड़ों को चुनौती न देने का निर्णय करना, और इसके बजाय एक ऐसा नक्शा प्रकाशित करना जिसमें यह दिखाया गया हो कि म्यूनिख वास्तव में मैक्सिको की खाड़ी में है, और अन्य सभी डेटा और जर्मनी के लाखों लगभग उदासीन लोगों के दावों का विरोध करने का मतलब यह नहीं है कि आप मेधावी हैं। इसका मतलब यह है कि आपको बिल्कुल कुछ भी जानकारी नहीं है, या इस बात की अधिक संभावना हो सकती है कि आप किसी मंशा से एक प्रमुख जर्मन महानगर को टाम्पा से दो घंटे की नाव की यात्रा दिखाना चाहते हैं।”

फ़ोल्टा ने अय्यादुरै के प्रकाशक के बारे में भी कुछ कहा है।  यदि आप म्यूनिख के स्थान को दिखानेवाला भ्रामक नक्शा छापते हैं, तो उससे “विश्वसनीय जानकारी के स्रोत के रूप में आपकी ईमानदारी के बारे में क्या पता चलता है?”

वैज्ञानिक सहयोग की भावना से, फ़ोल्टा ने आनुवांशिकी इंजीनियरी से तैयार मकई और सोया के नमूनों के विश्वविद्यालय आधारित परीक्षण (उचित नियंत्रणों के साथ) करवाने के लिए अय्यादुरै के साथ सहयोग करने की पेशकश की है जिसमें एक स्वतंत्र प्रयोगशाला द्वारा विश्लेषण किए जाएँगे।  अय्यादुरै ने इसके लिए मना कर दिया, इसलिए फ़ोल्टा इसे स्वयं आगे बढ़ाएँगे।

प्रयोगात्मक डेटा आनेवाला है। इस बीच, यदि आपको सिरके वाले मीट और पास्ता के व्यंजनों की तलब हो तो मध्य यूरोप जाएँ, मेक्सिको की खाड़ी नहीं।