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रॉबिन हुड को फिर से याद करना

मैड्रिड - अंतर्राष्ट्रीय विकास सहायता रॉबिन हुड के सिद्धांत पर आधारित है: अमीरों से लो और गरीबों को दो। राष्ट्रीय विकास एजेंसियां, बहुपक्षीय संगठन, और गैर सरकारी संगठन इसी विचार को मन में रखकर वर्तमान में प्रतिवर्ष $135 बिलियन से अधिक राशि अमीर देशों से लेकर गरीब देशों को स्थानांतरित करते हैं।

रॉबिन हुड के सिद्धांत के लिए एक और अधिक औपचारिक शब्द "सर्वदेशीय सर्वहित" है, यह एक ऐसा नैतिक नियम है जिसके अनुसार हमें दुनिया में हर किसी के बारे में एक ही तरह से सोचना चाहिए, चाहे वे कहीं भी रहते हों, और फिर मदद को वहां देना चाहिए, जहां यह सबसे ज्यादा मददगार हो।  जिन लोगों के पास कम है उनकी उन लोगों पर प्राथमिकता होती है जिनके पास अधिक है। यह दर्शन परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक विकास के लिए सहायता, स्वास्थ्य के लिए सहायता, और मानवीय आपात स्थितियों के लिए सहायता का मार्गदर्शन करता है।

पहली नज़र में, सर्वदेशीय सर्वहित उचित लगता है।  गरीब देशों में लोगों की जरूरतें बहुत अधिक जरूरी होती हैं, और गरीब देशों में कीमत के स्तर बहुत कम होते हैं, इसलिए एक डॉलर या यूरो का मूल्य स्वदेश की तुलना में वहां दुगुने या तिगुने जितना बढ़ जाता है।  स्वदेश में खर्च करना न केवल अधिक महंगा होता है, बल्कि इससे उन लोगों को भी लाभ मिलता है जो पहले से ही समृद्ध हैं (वैश्विक मानकों की दृष्टि से देखने पर, कम-से-कम अपेक्षाकृत रूप से), और इस प्रकार इससे कम हित होता है।

मैं वैश्विक गरीबी के बारे में कई वर्षों से इस सोचता आ रहा हूं और मैंने इसे मापने की कोशिश की है, और मुझे यह मार्गदर्शी सिद्धांत हमेशा मोटे तौर पर सही लगा है।  लेकिन वर्तमान में मैं इसके बारे में बहुत अधिक अनिश्चित सा महसूस कर रहा हूं।  तथ्य और नैतिकता दोनों ही समस्याएं पैदा करते हैं।