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वैश्विक मार्शल योजना

रोम – वैश्विक विकास में सहयोग को उत्प्रेरित करने के लिए लगातार चल रहे प्रयासों के बावजूद, हाल के वर्षों में इसकी प्रगति में भारी बाधाएँ आई हैं। सौभाग्यवश, 2015 की दूसरी छमाही में आयोजित की जानेवाली प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में, दुनिया के नेताओं के लिए उन पर काबू पाने का यह महत्वपूर्ण अवसर होगा।

इस तरह का अवसर पहले भी आया था। पिछली सदी के अंत में, आर्थिक विकास पर अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में भी भारी अवरोध आ गया था। विश्व व्यापार संगठन की सिएटल मंत्रिस्तरीय वार्ता किसी निर्णय के बिना समाप्त हो गई थी, और वाशिंगटन सहमति के दो दशकों के बाद, विकासशील देशों को अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से निराशा हुई थी। मॉ���्टेरी, मेक्सिको में संयुक्त राष्ट्र के विकास के लिए वित्तपोषण (एफएफडी) प्रारंभिक सम्मेलन में हुई वार्ताओं में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका।

Erdogan

Whither Turkey?

Sinan Ülgen engages the views of Carl Bildt, Dani Rodrik, Marietje Schaake, and others on the future of one of the world’s most strategically important countries in the aftermath of July’s failed coup.

फिर, 11 सितंबर, 2001 को, संयुक्त राज्य अमेरिका में भारी आतंकवादी हमले हुए - यह एक ऐसी दुखद घटना थी जिसके फलस्वरूप जैसे-तैसे प्रगति हो पाई। विश्व के नेता दोहा विकास का दौर शुरू करने के लिए राजी हो गए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यापार वार्ताओं से विकासशील देशों की विकास संबंधी आकांक्षाओं की पूर्ति होती है। और 2002 मॉन्टेरी एफएफडी सम्मेलन में विदेशी और घरेलू निवेश, विदेशी ऋण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, व्यापार, और सर्वांगी शासन के मुद्दों पर बड़ी सफलताएँ हासिल की गईं।

बेशक, प्रगति को तेज़ करने के लिए त्रासदी की जरूरत नहीं होती है। इस वर्ष की प्रमुख वैश्विक बैठकें - जुलाई में विकास के लिए वित्त पोषण पर सम्मेलन, सितंबर में संयुक्त राष्ट्र में सतत विकास लक्ष्यों को स्वीकार करने के लिए बैठक, और दिसंबर में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन – पर्याप्त होनी चाहिए। और इन बैठकों की तैयारी के लिए किए गए प्रयासों से लगता है कि इनमें आगे बढ़ने के लिए इच्छा है।

लेकिन सही कार्यक्रम का होना मुख्य बात है। औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए दुनिया को एक ऐसी सुविचारित और दूरगामी रणनीति की जरूरत है जो यूरोपीय सुधार कार्यक्रम के मॉडल अर्थात उस अमेरिकी पहल के अनुरूप हो जिसके फलस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप पुनर्निर्माण कर पाया था। इस योजना के अंतर्गत, जिसे मार्शल योजना के रूप में अधिक जाना जाता है, यूरोप में राष्ट्रीय विकास के प्रयासों का समर्थन करने के लिए अमेरिकी सहायता भारी मात्रा में दी गई थी, और इसे अभी भी बहुत-से यूरोपीय लोगों द्वारा अमेरिका के सबसे अच्छे समय के रूप में देखा जाता है।

मार्शल योजना का प्रभाव यूरोप की सीमाओं के बहुत बाहर तक महसूस किया गया था, अगले दशक में इसका विकास इस रूप में हुआ जो संभवतः मानव इतिहास में सबसे अधिक सफल आर्थिक विकास सहायता परियोजना है। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना और कोरियाई युद्ध के बाद पूर्वोत्तर एशिया में इसी तरह की नीतियाँ शुरू की गईं।

बेशक, मार्शल योजना के विस्तार के पीछे एक राजनीतिक प्रेरणा थी। पश्चिमी यूरोप से लेकर पूर्वोत्तर एशिया तक के अमीर देशों का एक स्वच्छता घेरा बनाकर, अमेरिका को यह उम्मीद थी कि वह शीत युद्ध के शुरू होने पर साम्यवाद के प्रसार को रोक पाएगा। इसमें उन विकासशील देशों को छोड़ दिया गया जो इस तरह के राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करते थे।

हालाँकि, मूल रूप से, मार्शल योजना एक आर्थिक रणनीति थी - और यह एक सुदृढ़ रणनीति भी थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह योजना अपनी पूर्ववर्ती मोर्गेनथाऊ योजना से बिल्कुल उलट थी जिसमें गैर-औद्योगीकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया था, और इसके परिणाम खराब रहे थे। जैसा कि वित्त सचिव हेनरी मोर्गेनथाऊ, जूनियर, ने अपनी 1945 की पुस्तक जर्मनी हमारी समस्या है में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया था कि इस योजना का उद्देश्य जर्मनी को "मुख्य रूप से कृषि और चरागाहों वाले" देश में बदलना था ताकि किसी भी नए युद्ध में उसकी भागीदारी को रोका जा सके।

तथापि, 1946 के अंत तक, जर्मनी में आर्थिक संकट और बेरोज़गारी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर को तथ्य खोजने के उद्देश्य से उस देश की यात्रा करने के लिए प्रेरित किया। हूवर की 18 मार्च 1947 की तीसरी रिपोर्ट में यह कहा गया कि जर्मनी को चरागाहों के देश के रूप में सीमित करने की धारणा एक "भ्रम" है जिसे 25,000,000 लोगों को ख़त्म करने या देश से बाहर निकालने के बिना हासिल नहीं किया जा सकता है।

केवल मात्र विकल्प पुनः औद्योगीकरण था। तीन महीने से भी कम समय के बाद, विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया जिसमें उन्होंने इस नीति को पलटने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उच्च शुल्कों, कोटा, और आयात प्रतिबंधों जैसे उपायों सहित राज्य के भारी हस्तक्षेपों के माध्यम से जर्मनी और शेष यूरोप का पुनः औद्योगीकरण किया जाना होगा। मुक्त व्यापार केवल पुनर्निर्माण के बाद ही संभव हो पाएगा, जब यूरोपीय देश अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने योग्य हो जाएँगे।

मार्शल ने अपने संक्षिप्त भाषण में तीन अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। सबसे पहले, जर्मनी की आर्थिक मंदी में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच व्यापार के टूटने ने जो भूमिका निभाई थी, उसका उल्लेख करते हुए उन्होंने सदियों पुरानी यूरोपीय आर्थिक अंतर्दृष्टि की ओर ध्यान दिलाया: सभी धनी देशों में विनिर्माण क्षेत्र वाले नगर होते हैं। मार्शल ने स्पष्ट किया कि इसका उपाय "यूरोपीय लोगों का विश्वास बहाल करने में निहित है", ताकि निर्माता और किसान "अपने उत्पादों का आदान-प्रदान उन मुद्राओं में करने के लिए सक्षम और तैयार हों जिनके सतत मूल्य पर कोई सवाल न किए जा सकते हों।"

दूसरे, मार्शल का यह तर्क था कि भागीदारी संस्थाएँ आर्थिक प्रगति से उत्पन्न होती हैं, न कि आर्थिक प्रगति भागीदारी संस्थाओं से, जो तर्क आज के पारंपरिक ज्ञान के विपरीत है। जैसा कि उन्होंने बताया, नीति का उद्देश्य दुनिया में कार्यशील अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार करना होना चाहिए, ताकि ऐसी राजनीतिक और सामाजिक स्थितियाँ बन सकें जिनमें मुक्त संस्थाओं का अस्तित्व बना रह सके।"

तीसरे, मार्शल ने इस बात पर बल दिया कि वास्तविक प्रगति और विकास को बढ़ावा देने के लिए सहायता व्यापक और रणनीतिक होनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि "इस तरह की सहायता, विभिन्न संकटों के उत्पन्न होने पर टुकड़ों में नहीं दी जानी चाहिए। यह सरकार भविष्य में जो भी सहायता प्रदान करे, वह उपचार की दृष्टि से होनी चाहिए, मात्र उपशामक के रूप में नहीं।"

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मार्शल की कल्पना दुनिया के उन नेताओं के लिए महत्वपूर्ण सबक देती है जो आज विकास में तेजी लाना चाहते हैं, विकासशील और संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं पर वाशिंगटन सहमति के प्रभावों को पलटने की आवश्यकता के साथ शुरूआत करना चाहते हैं - ऐसे प्रभाव जो मोर्गेनथाऊ योजना के प्रभावों जैसे हैं। कुछ देश - चीन और भारत जैसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं सहित - जिन्होंने लंबे समय तक घरेलू उद्योग की रक्षा की है, आर्थिक वैश्वीकरण का लाभ उठाने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। अन्य देशों में आर्थिक विकास और वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में गिरावट आई है क्योंकि उनके उद्योग और कृषि क्षमता में, विशेष रूप से पिछली सदी के अंतिम दो दशकों में कमी हुई है।

अब समय आ गया है कि गरीब अर्थव्यवस्थाओं की उत्पादक क्षमता और क्रय शक्ति को बढ़ाया जाए, जैसा कि यूरोप में मार्शल के भाषण के एक दशक बाद हुआ था। मार्शल की यह अंतर्दृष्टि कि इस तरह का साझा आर्थिक विकास स्थायी शांति को बनाने के लिए एकमात्र रास्ता है हमेशा की तरह आज भी सच बना हुआ है।