वैश्विक पूँजी का रुख फ़्रंटियर की ओर

प्रिंसटन - तथाकथित "फ़्रंटियर बाज़ार की अर्थव्यवस्थाएँ" निवेश के हलकों में नवीनतम सनक हो गई हैं। हालाँकि, इन कम आय वाले देशों – एशिया में बांग्लादेश और वियतनाम, लातिन अमेरिका में होंडुरास और बोलीविया, और  अफ़्रीका में केन्या और घाना सहित – में छोटे, अविकसित वित्तीय बाज़ार हैं, लेकिन वे तेज़ी से बढ़ रहे हैं और उम्मीद की जाती है कि वे भविष्य में उभरती अर्थव्यवस्थाएँ बन जाएँगे। पिछले चार सालों में, फ़्रंटियर अर्थव्यवस्थाओं में आने वाले निजी पूँजी के प्रवाह उभरते बाज़ारों की अर्थव्यवस्थाओं में आनेवाले प्रवाहों की तुलना में लगभग 50% ज़्यादा (सकल घरेलू उत्पाद के सापेक्ष) रहे हैं। इस पर ख़ुश होना चाहिए या खेद करना चाहिए, यह ऐसा सवाल है जो आर्थिक विश्लेषकों और नीति निर्माताओं के लिए रॉर्सचाक परीक्षण की तरह हो गया है।

अब हम जान चुके हैं कि मुक्त पूँजी की गतिशीलता का वायदा पूरा नहीं किया गया है। कुल मिलाकर, प्राप्तकर्ता देशों में आने वाले पूँजी प्रवाह में बढ़ोतरी ने निवेश के बजाय खपत को बढ़ावा दिया है, जिससे आर्थिक अस्थिरता बढ़ी है और कष्टकारी वित्तीय संकट की बारंबारता और ज़्यादा हुई है। अनुशासन लागू करने के बजाय, वैश्विक वित्तीय बाज़ारों ने कर्ज़ की उपलब्धता बढ़ा दी है, जिसने अपव्ययी सरकारों की बजट बाध्यताओं को क्षीण कर दिया है और बैंकों की बैलेंस शीट अत्यधिक विस्तारित कर दी है।

मुक्त पूँजी गतिशीलता के लिए सबसे अच्छा तर्क अभी तक स्टेनली फ़िशर का बना हुआ है जो उन्होंने लगभग दो दशक पहले दिया था जब वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के नंबर दो अधिकारी थे और अब वे यूएस संघीय रिज़र्व के उपाध्यक्ष हैं। हालाँकि फ़िशर ने मुक्त प्रवाह वाली पूँजी के ख़तरों की पहचान की थी, लेकिन उन्होंने तर्क दिया था कि इसका समाधान पूँजीगत नियंत्रण बनाए रखना नहीं है, बल्कि ख़तरों को कम करने के लिए ज़रूरी सुधार शुरू करना है।

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