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अच्छी फसल, बुरी फसल

नैरोबी – आनुवांशिक रूप से परिवर्तित (जीएम) फसलों के आयात पर केन्या की पाबंदी एक ऐसे देश में परेशान करने वाली प्रवृत्ति को दर्शाती है जिसे कृषि क्षेत्र में नवाचारी की तरह देखा जाता है. यह कदम एक महाद्वीप के लिए उलटी दिशा में एक बड़ी छलांग है जिसे अपने यहां खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अकसर जूझना पड़ता है. कायदे से पूर्वाग्रह, भय और अटकलबाजी की जगह तर्कसंगत वैज्ञानिक सोच को अपनाना चाहिए. और इसमें केन्या अन्य देशों का नेतृत्व कर सकता है.

जीएम फसलें (जिन्हें आनुवांशिक रूप से इंजिनीयर्ड या बायोटेक्नोलॉजी फसलें भी कहा जाता है) बार-बार सुरक्षित साबित हुई हैं और सारी दुनिया में कृषि उत्पादकता बढ़ाने में उनका सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जाता है. पर नौकरशाही, दुष्प्रचार और गुमराह करने वाली सूचना लाखों अफ्रीकी किसानों को, जिनमें केन्या के किसान भी शामिल हैं, उस तकनीकी तक पहुंच बनाने से रोकती है जो उनके जीवन स्तर को सुधार सकती है और भोजन क��� कमी को दूर करने में मददगार है.

Erdogan

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देश में अनाज की कमी के कारण दस लाख से ज्यादा केन्या वासियों को आज खाद्य सहायता पर निर्भर होना पड़ता है. देश में अकाल की अग्रिम चेतावनी देने वाली प्रणालियों के नेटवर्क ने भविष्यवाणी की है कि इस साल के अंत तक मक्का के पहले से ऊंचे दाम और बढ़ते रह सकते हैं. इससे खाद्य सुरक्षा और आर्थिक निष्पादन पर और जोर पड़ेगा. जहां केन्या अपने लोगों को भोजन उपलब्ध कराने और अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए जूझ रहा है, वहां जीएम तकनीकी का स्वागत किया जाना चाहिए. यह ऐसा साधन है जो कृषि उपज और आमदनी बढ़ा सकता है और किसानों, उपभोक्ताओं तथा पर्यावरण को लाभ पहुंचा सकता है.

मुट्ठी भर देशों ने, जो जीएम फसलें उगाते हैं, महत्त्वपूर्ण लाभ अर्जित किए हैं. उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका में लाई गई मक्का, सोयबीन और कपास की जीएम किस्मों से 1998 से 2012 तक किसानों की आमदनी एक अरब डालर से अधिक बढ़ाने में मदद मिली है. यह वृहत् तौर पर मक्का की जीएम किस्मों का नतीजा है कि सालाना उपज 32% तक बढ़ी है. और आज देश में मक्का के कुल रकबे में 90% जीएम मक्का का हिस्सा है. अवश्य ही ऊंचे उत्पादन के बावजूद दक्षिण अफ्रीका मक्का का पर्याप्त निर्यात नहीं कर पाता है कि दुनिया की मांग को पूरा किया जा सके.

इसी तरह बुरकीना फासो के किसान अब कपास की जीएम किस्म उगाते हैं जो प्राकृतिक रूप से विनाशकारी कीटों का प्रतिरोध करती है और उसे महंगे कीटनाशकों की कम जरूरत पड़ती है. पारंपरिक कपास छोड़ कर जीएम किस्म अपनाने से उपज 18% से अधिक बढ़ी है और किसानों को प्रति हेक्टेयर 61 डॉलर अधिक आमदनी होने लगी है. इससे वर्ष 2013 में ही कृषि आमदनी 1.2 अरब डॉलर बढ़ गई है.

कृषि तकनीकी अपनाने में अगुआ बन कर केन्या के किसान भी समान लाभ ले सकेंगे इसमें कोई संदेह नहीं. केन्या में एक-तिहाई खाद्य उत्पादन छोटे किसानों द्वारा किया जाता है. ये वही किसान हैं जो दुनिया में 90% जीएम फसलें उपजाते हैं. केन्या वासी उम्मीद है कि कीट-प्रतिरोधी मक्का जैसी नई जीएम किस्मों को उगा कर भारी लाभ ले सकते हैं जिनका स्थानीय वैज्ञानिकों द्वारा विकास किया जा रहा है.

इसके अलावा केन्या उन गिने-चुने अफ्रीकी देशों में से एक है जिनके यहां मजबूत नियामक तंत्र सक्रिय है जो फसलों की नई किस्मों की समीक्षा कर सकता है और उन्हें मंजूरी दे सकता है. केन्या के बायोसेफ्टी एक्ट, 2009 के अधीन नैशनल बायोसेफ्टी ऑथोरिटी (एनबीए) की स्थापना की गई, जो इस महाद्वीप में इस प्रकार का पहला निकाय है. परंतु, इस क्षेत्र में पहले पदार्पण करने के बावजूद केन्या में जीएम फसलों के खिलाफ अनावश्यक रूप से राजनीतिक लड़ाई लड़ी जा रही है. सन् 2012 में वहां की कैबिनेट ने एनबीए से परामर्श किये बगैर जीएम फसल के आयात पर पाबंदी लगा दी. यह निर्णय एक ऐसे अध्ययन पर आधारित था जिसकी व्यापक आलोचना हुई और बाद में जिसे बंद कर दिया गया. इस अध्ययन में जीएम फसलों को कैंसर पैदा करने वाला बताया गया था. यह दावा झूठा साबित हुआ.

हाल ही में केन्या सरकार ने जैव प्रौद्योगिकी की जांच करने के लिए कार्यबल की नियुक्ति की थी. इसके निष्कर्ष अभी सार्वजनिक नहीं किये गए हैं. पर कार्यबल के अध्यक्ष द्वारा जीएम फसलों के विरोध में की गई टिप्पणियों से इस मुद्दे पर और भ्रम पैदा हो गया है. इससे किसानों, वैज्ञानिकों और आम जनता के उस वक्त असमंजस में पड़ने का खतरा है जब जीएम फसलों की सबसे ज्यादा जरूरत है.

राजनीति और नौकरशाही के चलते आबादी का पेट भरने का एक अच्छा मौका यूं ही जाया हो रहा है. और दुर्भाग्यवश केन्या अफ्रीका में एकमात्र ऐसा देश नहीं है. उदाहरण के लिए युगांडा और नाइजीरिया में भी बेहद जरूरी जैव सुरक्षा विधेयक अधर में लटक गया है.

दरअसल समस्या जीएम विरोधी कार्यकर्ताओं के उस छोटे से समूह के साथ है जो ‘नैतिक’ आधार पर इस तकनीकी पर एतराज जताते हैं. वे आमतौर पर दावा करते हैं कि जीएम फसलें असुरक्षित हैं. पिछले दो दशकों के दौरान वैज्ञानिक समुदाय द्वारा उनके इस दावे को मयसबूत खारिज भी किया जा चुका है. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यह साबित कर चुका है कि ‘ऐसे (जीएम) खाद्य पदार्थों के सेवन से मानव स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं दिखाई देता है.’ अवश्य ही प्रत्येक नई जीएम फसल को स्वास्थ्य, पर्यावरणीय और कारगरता के कठोर मानदंडों पर खरा उतरना चाहिए.

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अच्छा प्रयोजन होने के बावजूद ये कार्यकर्ता कुछ नीति-निर्माताओं के साथ मिलकर गलत सूचनाओं के आधार पर पूरे अफ्रीका में कृषि प्रौद्योगिकी और उत्पादकता को पीछे ले जा रहे हैं. निश्चित तौर पर जीएम फसलें रामबाण नहीं हैं. पर वे खाद्य सुरक्षा और आर्थिक सम्पन्नता हासिल करने में महत्त्वपूर्ण उपकरण जरूर हैं.

यही कारण है कि फसल की नई किस्मों के स्वास्थ्य व सुरक्षा के बारे में निर्णय वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित होने चाहिए ना कि उनके बारे में राजनीतिक पूर्वाग्रहों और निराधार ‘नैतिक’ तर्कों से फैसला लिया जाए. नीति निर्धारण में प्रमाण-आधारित रवैया अपना कर केन्या के अधिकारीगण अपने देश में लाखों जीवन सुधार सकते हैं और समूचे महाद्वीप के लिए एक अमूल्य मिसाल भी कायम कर सकते हैं.