इबोला और उसके बाद

वाशिंगटन, डीसी - संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप ने अपनी सरहदों के भीतर इबोला वायरस के कुछ छिटपुट मामलों के प्रति बहुत ही अधिक प्रतिक्रिया दिखाई है। घबराहट भरी ये प्रतिक्रियाएँ निरर्थक नहीं हैं। बुनियादी वैज्ञानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करके, वे जन-स्वास्थ्य पर अनिवार्य कार्रवाई के लिए मौलिक नैतिक मानदंडों की अवहेलना करती हैं। और जब नागरिकों की इबोला से रक्षा करने की बात हो - भले ही भविष्य में इस तरह के स्वास्थ्य के वैश्विक संकटों के उभरने को रोकने की बात न भी की जाए - तो इन प्रतिक्रियाओं के परिणाम प्रतिकूल भी हो सकते हैं।

बहुत ज़्यादा प्रतिक्रिया करने के कारण असफलता के बेहद खराब उदाहरण यूएस में सामने आए हैं, जहाँ प्रारंभिक प्रतिक्रिया गिनी, लाइबेरिया तथा सिएरा लियोन से आनेवाले यात्रियों की ज़्यादा स्क्रीनिंग करने के रूप में सामने आई। ज़्यादा समस्या की बात यह थी कि अनेक राज्यों ने इबोला से त्रस्त देशों से यूएस लौटने वाले स्वयंसेवक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए 21 दिन तक अनिवार्य रूप से सबसे अलग रहना या संगरोध निर्धारित किया। सौभाग्य से, संगरोध के आदेशों के ख़िलाफ़ राजनीतिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप कुछ राज्यों के राज्यपालों ने उनमें ढील दे दी।

अब विकसित देशों के लिए यह समझने का समय आ गया है कि इबोला से अपने नागरिकों की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पश्चिम अफ़्रीका में वायरस को फैलने से रोकने में मदद की जाए। इसके लिए सबसे पहली और सबसे प्रमुख बात यह है कि सबसे ज़्यादा प्रभावित तीन देशों में इबोला के प्रति निरंतर "अत्यधिक प्रतिक्रिया" हो। ऐसी प्रतिक्रिया को पर्याप्त (और महत्वपूर्ण) वित्तपोषण; सुप्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों, और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं; और निदान, उपचार, संपर्क की पहचान करने, और संक्रमित व्यक्तियों के अलगाव के लिए बेहतर स्थानीय क्षमता का सहारा मिलना चाहिए।

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