अफ्रीकी अभ्युदय में विपुलता की समस्या

न्यूयार्क - अफ्रीका नाटकीय रूप से बदल रहा है - और इसके साथ बाहरी लोगों का इसके प्रति रवैया भी बदल रहा है. आखिरकार संयुक्त राज्य अमेरिका भी अब इस महाद्वीप में चीन, यूरोप और भारत के बराबर दिलचस्पी लेने को तत्पर दीख रहा है. हाल ही में आयोजित अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की अफ्रीका के 40 राष्ट्राध्यक्षों और 200 से अधिक अमेरिकी व अफ्रीकी शीर्ष व्यापारियों के साथ शिखर वार्ता एक नए, अधिक आत्मविश्वासी मिजाज का संकेत देती है. यह अपने-आप में उत्साहवर्द्धक है. लेकिन जब तक उप-सहारा अफ्रीका के अनेक देश हिंसक झड़पों, गरीबी और भ्रष्टाचार में पिसते रहेंगे तब तक महाद्वीप की आर्थिक क्षमता को पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकेगा.

अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि और व्यवसायिक अवसर उत्साहवर्द्धक और मन को लुभाने वाले हैं. इस क्षेत्र की 30 करोड़ मध्यमवर्गीय आबादी सालाना 5% से अधिक की दर से बढ़ रही है. महाद्वीप मोबाइल (चल) बैंकिंग में सबसे आगे है. प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय भारत व चीन के स्तर के बराबर है. यदि महाद्वीप के सशक्त निजि क्षेत्र की भागीदारी में विदेशी पूंजी निवेश वहां के प्रमुख क्षेत्रों - खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और अवसंरचना - को लाभ पहुंचा सके तो अफ्रीका में व्यापक पैमाने पर विकास को बढ़ावा मिल सकता है जिसकी लोगों को जरूरत है.

लेकिन निवेश और वृद्धि - ‘‘अफ्रीका उदय’’ -  इस कहानी के केवल एक भाग हैं. एक अफ्रीका और भी है जो संघर्ष कर रहा है उन लड़ाइयों और संकट से जो महाद्वीप के बड़े भाग को प्रभावित करते हैं. खासकर, माली से सोमालिया तक फैली पट्टी में रहने वाले करोड़ों लोग इन संघर्षों से अधिक प्रभावित हैं. लाइबेरिया और सिएरा लियोन में इबोला महामारी फैलने से पूर्व तक दक्षिण सूडान, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक (कार) और माली पर नाजुक या विफल राष्ट्रों की लंबी फेहरिस्त में शामिल होने का खतरा मंडरा रहा था. सोमालिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (कांगो गणराज्य) पहले ही इस फेहरिस्त में हैं. इन देशों में जारी नस्लीय, धार्मिक, आर्थिक और अन्य किस्मों के संघर्षों के कारण प्रभावी प्रशासन के लक्ष्य नेपथ्य में चले जाते हैं और बुनियादी सेवाओं को प्रदान करना भी मुश्किल हो जाता है.

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