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sangwan1_Nasir KachrooNurPhoto via Getty Images_beggarbusystreetindia Nasir Kachroo/NurPhoto via Getty Images

भारत में ऋण की जाति

नई दिल्ली – 1950 में, नए स्वतंत्र भारत ने अपनी जाति व्यवस्था को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया और "अछूत" माने जाने वाले दलितों के खिलाफ भेदभाव को गैरकानूनी घोषित कर दिया, जो कठोर सामाजिक वर्गीकरण में सबसे नीचे धकेल दिए गए थे। ऐतिहासिक कुरीतियों को दूर करने के इस प्रयास को दलित व्यवसायों के प्रभावशाली पूंजीवादी दृष्टिकोण का समर्थन प्राप्त हुआ जिसने उनके मालिकों को सामाजिक और आर्थिक सम्मान के स्तर तक ऊपर उठा दिया जिससे उनके खिलाफ पूर्वाग्रह मिट गया।

लेकिन भारत की जाति व्यवस्था, जो 3,000 वर्षों के इतिहास से पुख्ता हुई है, अत्यधिक लचीली साबित हुई है। लगभग सात दशकों के सदाशयपूर्ण सरकारी हस्तक्षेप के बावजूद, जातिगत पहचान भारत के ग्रामीण जीवन के हर पहलू में व्याप्त है, जिसमें दलितों को गहरे पैठ गए पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ रहा है, जो स्वयं उनके और उनके परिवार के लिए जीवन को बेहतर बनाने और भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण रूप से योगदान करने की क्षमता में बाधा डालता है।

भारत की जातियों को उनके सदस्यों द्वारा पारंपरिक रूप से किए जाने वाले कामों के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है। दलितों के लिए इसका मतलब आम तौर पर खानों और खदानों में, गर्म-मसालों की खेती में, या ईंट के भट्ठों में कठोर श्रम करना रहा है। सीवर खोलने, मानव अपशिष्ट का निपटान करने, जानवरों के शवों की खाल उतारने जैसे घटिया या गंदे काम अधिकतर दलितों के हिस्से में आते हैं।

अपने कठोर श्रम के लिए, दलितों को अक्सर बहुत कम वेतन मिलता है या कोई वेतन नहीं मिलता है। यद्यपि 1976 से भारत में बेगार श्रम अवैध है, सरकार का अनुमान है कि 18 मिलियन से अधिक भारतीय - जिनमें अधिकतर दलित हैं – बिना वेतन वाले या ऋण के चंगुल में फंसे हुए श्रमिक हैं। भारत की आबादी में दलितों की संख्या कुल आबादी के पांचवें हिस्से से अधिक होने के बावजूद, दलितों का देश के 5% से कम संसाधनों पर नियंत्रण है। भारत की एक तिहाई दलित आबादी घोर गरीबी में रहती है, और 10% से कम दलित परिवारों में सुरक्षित पेयजल या शौचालय का खर्च वहन करने की क्षमता है।

गरीबी के इस चक्र को तोड़ना बेहद कठिन साबित हुआ है। भारत में मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था है, जिसमें उद्यमशीलता को महत्व दिया जाता है और प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन दलित सफलताओं की प्रेरणादायक कहानियां गिनी-चुनी हैं, उनका महत्व उनकी दुर्लभता के कारण है। जाति विभाजन को समाप्त करने के उद्देश्य से दिए जाने वाले कोटा, अनुदान, और सब्सिडी की भरमार के बावजूद, दलित उद्यमियों को अभी भी उस वित्तपोषण तक पहुंच प्राप्त नहीं है जिसकी उन्हें आवश्यकता है।

अपने व्यवसाय को शुरू करने या उसका विस्तार करने के इच्छुक उच्च-जाति के उद्यमी आम तौर पर आवश्यक वित्तपोषण प्राप्त करने के लिए सरकार द्वारा समर्थित किसी वैध ऋण प्रणाली पर भरोसा कर सकते हैं। दलित नहीं कर सकते। हाल के एक अध्ययन के अनुसार, दलितों के लिए औपचारिक वित्तीय संस्थाओं से ऋण मिलने की संभावनाएं दूसरों की तुलना में कम होती हैं, और जिन्हें मिलता भी है उन्हें कम उदार शर्तों पर और कम मात्रा में मिलता है, जो उन्हें बेईमान उधारदाताओं के पास जाने के लिए प्रेरित कर सकता है। ऐसी स्थिति में इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि दलित व्यवसायों को प्रतिस्पर्धा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

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कोई यह तर्क दे सकता है कि ऋण तक पहुंच में असमानता आय, परिसंपत्तियों या शिक्षा के अंतरों से जुड़ी है। लेकिन सबूत बताते हैं कि इसमें प्रत्यक्ष जातिगत भेदभाव की भूमिका भी होती है। दलित नियमित रूप से ग्रामीण बैंकों में वंचित होने, अपमानित होने और धमकाए जाने के किस्सों का बखान करते रहते हैं। उपर्युक्त अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है कि बैंकों ने बाकायदा - परंतु चालाकी से - नीची जातियों के खिलाफ, तरह-तरह के "रचनात्मक" तरीकों से भेदभाव किया है। दलितों के ऋण आवेदनों को हतोत्साहित किया जाता है, अतिरिक्त संदर्भों की मांग की जाती है, केवल छोटे ऋण आवेदन ही मंजूर किए जाते हैं, उच्च संपार्श्विक आवश्यकताएं और ब्याज दरें लागू की जाती हैं, ऋणों की अवधि बढ़ाए जाने से इनकार किया जाता है, बैंक खाते खोलने के लिए लंबे समय तक इंतजार करवाया जाता है और जटिल आवेदन फॉर्म भरते समय मदद नहीं की जाती है। यह केवल अनैतिक ही नहीं है, बल्कि यह भारत की 20% उद्यमिता क्षमता को कमजोर कर रहा है।

समस्या व्यावसायिक ऋणों से भी आगे है। दलितों को वित्तीय समावेशन की भारी कमी का भी सामना करना पड़ता है, जिससे पूर्वाग्रह और गरीबी के इस आत्म-विनाशकारी चक्र की गति और तेज हो जाती है। 2016 में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भ्रष्टाचार को कम करने के लिए 500 और 1,000 रुपये के नोटों को प्रचलन से हटाकर तुरंत नोटबंदी को लागू कर दिया था - तब गरीब और आर्थिक रूप से वंचित दलितों को किसी अपराधी से भी कहीं अधिक नुकसान उठाना पड़ा था।

भारत की सरकार को अब यह सुनिश्चित करने के लिए जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति को जुटाना होगा कि वित्तीय क्षेत्र अपनी सेवाओं में दलितों की पहुंच में सुधार करता है। आवश्यकता एक ऐसे बहु-आयामी दृष्टिकोण की है जिसमें जातिगत भेदभाव के बने रहने के पीछे के कारणों पर ध्यान दिया जाए।

उदाहरण के लिए, कुछ उधारदाता पुराने सांस्कृतिक मानदंडों और विश्वासों से उत्पन्न दलितों के प्रति गहरी अरुचि से प्रेरित हो सकते हैं। दूसरे यह मान सकते हैं कि दलितों में अपने ऋण का बुद्धिमानी से उपयोग करने के लिए शिक्षा या अनुभव की कमी है। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि दलित उधारकर्ता, अपनी उद्यमशीलता की गतिविधियों को प्रकट करने, सीधे बातचीत करने, या बड़े जोखिम उठाने में सांस्कृतिक अनिच्छा होने के फलस्वरूप स्वयं ऋणदाताओं के पूर्वाग्रहों को उकसा सकते हैं।

भारत इतिहास से बच नहीं सकता, लेकिन वह अपनी विरासत पर विचार कर सकता है। जब तक सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती कि दलित आर्थिक रूप से कामयाब हो सकते हैं, देश अपने नैतिक ऋणों को कभी नहीं चुका पाएगा, और उसका समाज कभी भी संपूर्ण नहीं हो पाएगा।

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