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विकासशील दुनिया के लिए कैंसर की देखभाल

बोस्टन – चार से अधिक दशक पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस बात के शीघ्र और उत्साहजनक परिणामों से प्रेरित होकर कि कीमोथेरेपी, तीव्र लिम्फोब्लासटिक ल्यूकेमिया और Hodgkin लिंफोमा जैसे रोगों का इलाज हो सकता है, “कैंसर के खिलाफ युद्ध” छेड़ दिया। उसके बाद से अधिकाधिक कैंसर रोगियों का उपचार करने और उन्हें ठीक करने के लिए कीमोथेरेपी, शल्य चिकित्सा, और विकिरण का उपयोग करने में लगातार प्रगति हो रही है। लेकिन निम्न और मध्यम आय वाले देशों में, जहाँ कैंसर के रोगी आज सबसे अधिक संख्या में रहते हैं, इन जीवन-रक्षक अनुसंधानों तक पहुँच दूर की कौड़ी बनी हुई है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में, स्तन कैंसर के 80% से अधिक रोगी लंबे समय तक जीवित रहते हैं, और कैंसर से पीड़ित 80% से अधिक बच्चे जीवित रहते हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में कर्करोग विज्ञानी के रूप में अपने लगभग 40 वर्षों में, मैंने ऐसे हजारों रोगियों का इलाज किया जिन्हें अगर कीमोथेरेपी उपलब्ध नहीं होती तो उनके बचने की उम्मीद बहुत कम होती। जिन रोगियों ने 1970 के दशक में उपचार प्राप्त किया, उनमें से बहुत से आज जीवित हैं और ठीक-ठाक हैं; ���नके बच्चे अब प्रजननक्षम वयस्क हैं।

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2011 में मैंने जब रवांडा में काम करना शुरू किया तभी मैं इस बात को पूरी तरह से समझ पाई कि मुझे जो उपकरण मिले हुए हैं वे कितने शक्तिशाली हैं और उनके न होने का क्या असर होता है। किगाली में केंद्रीय सार्वजनिक रेफरल अस्पताल में बाल-चिकित्सा कैंसर वार्ड में जाना समय से पीछे चले जाने जैसा था। विल्म्स ट्यूमर, जो एक तरह का गुर्दे का कैंसर होता है और वयस्कों को विरले ही कभी होता है, से ग्रसित रवांडा के बच्चों में पाए गए परिणाम हू-बहू अमेरिका में 80 साल पहले के समान थे, ये उन दवाओं की उपलब्धता से पहले के थे जिनसे आज इस रोगनिदान वाले 90% से अधिक अमेरिकी बच्चे जीवित रहने में सक्षम होते हैं।

रवांडा की स्वास्थ्य मंत्री, एग्नेस बिनागवाहो के अनुसार, उन्हें किगाली का कैंसर वार्ड एक दशक पहले के एचआईवी/एड्स यूनिट जैसा लग रहा था जब वह अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ थी। जब एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी नहीं थी, तो डॉक्टर एचआईवी/एड्स के लिए भोजन और आराम करने की सलाह देते थे - जिसका अर्थ संक्रमण का अनिवार्य रूप से मौत की सजा बन जाना होता था।

उस समय, कुछ लोग, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही, ऐतिहासिक भूल का शिकार हो जाते थे। 2001 में एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने यह दावा किया था कि एचआईवी/एड्स की "जटिलता" और उच्च लागत के कारण, अफ्रीका में इसका इलाज करना असंभव होगा।

लेकिन उनकी - और उनके जैसे विचार रखनेवाले कई अन्य लोगों की भी - यह धारणा गलत सिद्ध हुई। आज, अफ्रीका में दवाओं के उपयोग के साथ उपचार करानेवालों एचआईवी पॉजिटिव रोगियों की संख्या अमेरिका में इस तरह के लोगों की तुलना में बहुत अधिक हो चुकी है। दरअसल, रवांडा एड्स के इलाज के लिए सार्वभौमिक पहुँच प्राप्त करने वाले देशों में पहला देश था।

इस अनुभव के बावजूद, अफ्रीका में कैंसर के प्रभावी उपचार की संभावना के बारे में इसी तरह का संदेह व्यक्त किया जा रहा है। यह सच है कि कैंसर का उपचार जटिल है। इसके लिए जहाँ पैथोलॉजी, शल्य चिकित्सा, विकिरण, कीमोथेरेपी, और लक्षित दवाओं जैसी विभिन्न प्रकार की नैदानिक और चिकित्सीय क्षमताओं की आवश्यकता होती है, वहीं इन जीवन-रक्षक उपचारों को सुरक्षित रूप से करने के लिए ज्ञान और कौशल का होना भी आवश्यक होता है।

लेकिन बुटारो कैंसर सेंटर ऑफ़ एक्सेलेंस और इसके जैसी अन्य सुविधाओं ने यह साबित कर दिया है कि गरीब, ग्रामीण परिवेश में भी कैंसर रोगियों का सुरक्षित और प्रभावी ढंग से इलाज किया जाना संभव है। रवांडा स्वास्थ्य मंत्रालय, पार्टनर्स इन हैल्थ, और बोस्टन स्थित दाना- फ़ार्बर कैंसर इन्स्टीट्यूट की बदौलत, बुटारो सेंटर द्वारा 3,000 से अधिक कैंसर रोगियों का इलाज किया जा चुका है, जिनमें से ज्यादातर पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और बिनागवाहो द्वारा जुलाई 2012 में इसे समर्पित किए जाने के बाद से, इस क्षेत्र के बाहर से संदर्भित किए गए हैं। जेफ गोर्डन चिल्ड्रन्स फाउंडेशन, स्तन कैंसर रिसर्च फाउंडेशन, लिवस्ट्रोंग, और निजी दानदाताओं से प्राप्त सहायता भी इस उपलब्धि के लिए महत्वपूर्ण रही है।

सौभाग्य से, कुछ प्रमुख संस्थाओं ने इस प्रयास में तेज़ी लाने के लिए आगे आना शुरू कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, कैंसर नियंत्रण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ के साथ मिलकर कैंसर के इलाज के लिए जरूरी दवाओं की विश्व स्वास्थ्य संगठन की मॉडल सूची की दुबारा जांच कर रहा है ताकि इसकी अधिक ठीक तरह से पहचान की जा सके कि कौन से कैंसरों पर इलाज का अधिक असर होता है, और कौन से आबादियों पर भारी बोझ के रूप में हैं।

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कैंसर की वैश्विक मृत्यु दरों को कम करने के लिए सबसे कुशल दृष्टिकोण यह होगा कि विकासशील देशों में कैंसर के रोगियों को मौजूदा उपचार मुहैया कराए जाएँ। इसमें कैंसर के इलाज के लिए उस तरह के अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण को भी जोड़ें, जिसे एड्स राहत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की आपातकालीन योजना और ग्लोबल फंड के माध्यम से एचआईवी/एड्स के लिए जुटाया गया था, इससे विकासशील देशों में कैंसर से होनेवाली मृत्यु दरों में भारी कमी हो सकती है, और जल्दी भी।

एक दशक से अधिक पहले, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने यह फैसला किया था कि वे अब आगे से एचआईवी रोगियों के लिए निश्चित मौत को स्वीकार नहीं करेंगे। हमें आज वही प्रतिबद्धता करनी चाहिए कि हर जगह रोगियों को जीवन-रक्षक कैंसर का इलाज उपलब्ध कराएँगे।