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भारत के शिन्ज़ो अबे

नई दिल्ली – राजनीतिक दिशाहीनता और गतिहीनता की एक लंबी अवधि के बाद, भारत की नई सरकार का नेतृत्व एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाएगा जो अपनी संकल्पशीलता लिए जाना जाता है। जिस तरह जापान में राजनीतिक अस्थिरता के छह वर्षों के बाद 2012 के अंत में जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे की सत्ता में वापसी से जापान का खुद को अधिक प्रतिस्पर्धात्मक और आत्मविश्वासयुक्त देश के रूप बदलने के लिए दृढ़ संकल्प परिलक्षित हुआ था, उसी तरह नरेंद्र मोदी की चुनाव में जीत भारतीयों की अपने देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को पुनर्जीवित करने में मदद करने के लिए एक गतिशील, मुखर नेता के लिए इच्छा को दर्शाता है।

अबे की तरह, मोदी से उम्मीद की जाती है कि वे भारत के आर्थिक भाग्य को पुनर्जीवित करने और साथ ही इसकी रक्षा को सशक्त करते हुए समान विचारों वाले राज्यों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारियों को मज़बूत करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा और चीन-केंद्रित एशिया के उदय होने का मार्ग अवरुद्ध होगा। देश और विदेश में व्यापार जगत के नेताओं के चहेते – करिश्माई मोदी – ने यह कहकर तीव्र आर्थिक विकास को बहाल करने का वादा किया है कि यहाँ निवेशकों के लिए “लाल फ़ीता शाही नहीं, बल्कि केवल लाल कालीन” होना चाहिए।

63-वर्षीय मोदी में अबे के उदार राष्ट्रवाद, बाज़ार-उन्मुख अर्थशास्त्र, और नए एशियावाद की झलक मिलती है, जिसमें परस्पर संबद्ध रणनीतिक साझेदारियों का समूह बनाने के लिए एशियाई लोकतंत्रों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने की इच्छा है।

एक ऐसे देश में, जहाँ राजनीतिक नेताओं और नागरिकों की औसत उम्र के बीच अंतर दुनिया में सबसे अधिक है, मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री होंगे जिनका जन्म भारत के 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद हुआ था। यह अबे के साथ उनकी एक और समानता है, जो जापान के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ था।