1

जैवऔषधिकरण की क्रांति और प्रतिक्रिया

स्‍टैनफ़ोर्ड – पौधों से औषधियाँ प्राप्त करना कोई नई बात नहीं है। एस्पिरिन को पहली बार अठारहवीं सदी में विलो वृक्ष की छाल से अलग किया गया था। और मॉरफीन, कोडीन और रेशा संपूरक मेटाम्‍यूसिल जैसी कई अन्य साधारण औषधियाँ दुनिया भर की वनस्पतियों से परिशोधित करके बनाई जाती हैं।

अभी हाल ही में, वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीकें ईजाद की हैं जो इस प्रक्रिया को एक कदम आगे ले जाती हैं। इनमें आनुवंशिक अभियांत्रिकी के उपयोग द्वारा कृषि फसलों को उच्च गुणवत्तायुक्त औषधियों का संश्‍लेषण करने के लिए उत्प्रेरित जाता है। “जैवऔषधिकरण” नामक इस प्रौद्योगिकी की भारी संभावना लगभग 15 वर्ष पहले देखी गई थी जब केले, टमाटर और तंबाकू में पैदा किए गए टीकों और दवाओं के क्‍लीनिकल परीक्षण किए गए थे। दुर्भाग्‍यवश क़ानून बनानेवालों में जोखिम से बचने की भारी प्रवृत्ति के कारण इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई।

Erdogan

Whither Turkey?

Sinan Ülgen engages the views of Carl Bildt, Dani Rodrik, Marietje Schaake, and others on the future of one of the world’s most strategically important countries in the aftermath of July’s failed coup.

जैवऔषधिकरण का एक शुरूआती उदाहरण बायोटेक कंपनी वेंट्रिया बायोसाइंस द्वारा ऐसे धान का उत्‍पादन करना था, जिसमें दो मानव प्रोटीन, लैक्‍टोफेरिन और लाइसोज़ाइम शामिल थे। उगाई गई फसल की कटाई के बाद इसके दाने का प्रसंस्करण करके प्रोटीन का निष्‍कर्षण और परिशोधन किया जाता है और इसका उपयोग दस्तों के उपचार के लिए मौखिक खुराक के रूप में पुनर्जलीकरण घोल के तौर पर किया जाता है। यह विकासशील देशों में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्‍चों के लिए दूसरे नंबर की संक्रमणकारी जानलेवा बीमारी है, इससे अधिक जानलेवा केवल श्‍वसन संबंधी रोग हैं।

इस प्रोटीन की संरचना और क्रियात्‍मक गुण वही होते हैं जो कुदरती तौर पर स्‍तन के दूध में पाए जाते हैं, और इनका निष्‍कर्षण ठीक वैसे ही किया जाता है जैसे सामान्‍य तौर पर बैक्‍टीरिया और खमीर जैसे जीवों से औषधिवाले प्रोटीनों का निष्‍कर्षण करने के लिए किया जाता है। पेरू में किए गए एक अनुसंधान से पता चला है कि वेंट्रिया के धान निष्‍कर्षित प्रोटीनों से युक्त पुनर्जलीकरण घोल की मौखिक खुराक दस्तों की अवधि को घटाती है और इनकी पुनरावृत्ति की दर को कम करती है - यह लाभ विकासशील देशों के लोगों के लिए चमत्‍कार के समान है।

परंतु क़ानून बनानेवाले चमत्‍कारों को रोक सकते हैं, और रोजाना रोकते ही रहते हैं। सन 2010 में जब वेंट्रिया ने यू्.एस. खाद्य एवं औषधि प्रशासन से यह स्वीकार करने के लिए अनुरोध किया था कि इन प्रोटीनों को “सामान्‍यत: सुरक्षित माना जाता है” (यह एक कानूनी जुमला है), तो उसे इसका कोई जवाब नहीं मिला। कंपनी एफ.डी.ए. की स्वीकृति के बिना इस उत्‍पाद का विपणन करने की इच्‍छुक नहीं थी, अत: यह औषधि अनुपलब्‍ध रही, और यह बहुत दुःख की बात थी कि विकासशील देशों के बच्चों को एक जीवन-रक्षक उपचार से वंचित रहना पड़ा।

यहाँ तक कि जैवऔषधिकृत पौधों के क्षेत्र परीक्षण को भी समस्‍याजनक पाया गया है। सन 2003 में यू.एस. कृषि विभाग ने औषधियाँ बनाने के लिए निर्मित फसलों का परीक्षण करने के लिए भारी भरकम नए नियमों की घोषणा कर दी। इन क़ानूनों का तथाकथित उद्देश्‍य खाद्य की आपूर्तियों को औषधियों के संदूषण से बचाना था, विशेष रूप से उस स्थिति में जब उन्हें तैयार करने के लिए खाद्य फसलों का उपयोग किया जाता है। लेकिन खाद्य उद्योग की ये चिंताएं अतिरंजित हैं कि जैवऔषधिकृत पौधे उनके उत्‍पादों को दूषित कर सकते हैं। और वैसे भी जोखिम को कई तरीकों से कम किया जा सकता है, जाहिर तौर पर इसके लिए तंबाकू जैसे अ-खाद्य पौधों का उपयोग किया जा सकता है।

वस्‍तुत: यदि जैवऔषधिकृत पौधे खाद्य फसलों को संदूषित कर सकते हैं, तो भी उपभोक्‍ता जिस मात्रा में कॉर्न फ़्लैक्‍स, पास्‍ता या टोफू का इस्‍तेमाल करते हैं, उसमें संस्‍तुत औषधियों की हानिकारक मात्राएँ अत्‍यंत कम होंगी। जीन प्रवाह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसे किसान भली-भांति समझते हैं। वे सैकड़ों फसलें उगाते हैं, जिनमें सभी वस्‍तुत: भिन्न-भिन्न तकनीकों द्वारा आनुवंशिक रूप से उन्नत की गई होती हैं। इनका नतीजा यह है कि उन्‍होंने अपने व्‍यावसायिक कारणों से आवश्‍यकता पड़ने पर खेत में विरोधी परागण संबंधी संदूषण से बचने की सूक्ष्‍म रणनीतियाँ भी विकसित की हैं।

यदि कुछ फसलें संदूषित हो भी जाती हैं, तो भी अंतिम खाद्य उत्‍पाद में मानव स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा असर डालने के लिए पर्याप्त मात्रा में सक्रिय औषधि तत्‍वों के मौजूदगी की संभावना बहुत ही कम होगी। जैवऔषधिकृत पौधों को कटाई के बाद बड़े ढेर में मिलाने के बाद उस ढेर में औषधियाँ की सांद्रता अत्‍यंत कम हो जाएगी। उसके बाद इनके सक्रिय तत्‍व को पिसाई और अन्‍य प्रसंस्‍करणों, और फिर पकाए जाने के दौरान सलामत रहना होगा, और उसे मौखिक खुराक में भी सक्रिय रहना होगा, जबकि प्रोटीन औषधियाँ अकसर सक्रिय नहीं रह पाती हैं, क्‍योंकि वे पेट में जाकर पच जाती हैं।

Support Project Syndicate’s mission

Project Syndicate needs your help to provide readers everywhere equal access to the ideas and debates shaping their lives.

Learn more

यह सब घटित होने की संभावना बेशक शून्‍य नहीं है। लेकिन अनेक कारकों का संयोजन, जिसमें प्राकृतिक चयन, किसानों का अपने व्‍यावसायिक हितों को ध्यान में रखना, और जवाबदेही संबंधी सरोकार इस संभावना के प्रतिकूल हैं। इसमें कठिनाइयों की सूची बहुत लंबी है, और इसका असर लगभग यकीनी तौर पर अत्‍यंत कम होगा। जब आप इसकी तुलना औषधि उद्योग की भावी विशाल सफलता, या कम-से-कम उच्‍च मूल्‍य के यौगिकों का उत्‍पादन कम लागत की किसी नई विधि से करेंगे, तो कानून बनानेवालों का असंभावित घटनाओं के घटने संबंधी पूर्वाग्रह गलत सिद्ध होता दिखाई देगा।

जैवऔषधिकरण हमें बहुत कुछ दे सकता है। परंतु यदि हम जैसा बोएंगे वैसा ही काटना पड़ेगा, तो हमें दुनियाभर के क़ानून बनानेवालों से तर्कसंगत और विज्ञान-आधारित नीतियों की अपेक्षा करनी होगी। अफसोस की बात है कि नोबल पुरस्‍कार प्राप्त अर्थशास्‍त्री स्‍वर्गीय मिल्‍टन फ्राइडमैन की एक उक्ति उद्धृत करनी पड़ रही है कि यह वैसा ही है जैसे हम अपनी बिल्लियों से भौंकने की उम्‍मीद करें।