चीन के शहरी भविष्य की तस्वीर

बीजिंग. लगभग 10 करोड़ चीनी घोर गरीबी में जीवन यापन करते हैं और मोटे तौर पर साढ़े 27 करोड़ आबादी रोजाना 2 डालर से कम खर्च कर पाती है. चीन में गरीब लोगों की ज्यादातर आबादी देहाती इलाकों में रहती है. इस उम्मीद में कि शहरों में अच्छे वेतन वाले काम पाना आसान है. गरीबों का शहरों की ओर पलायन जारी है कि शहरों में उनका जीवन बेहतर हो जाएगा. वस्तुतः पिछले करीब साढ़े तीन दशक से लगभग 50 करोड़ चीनी आबादी शहरों में आकर बस गई है. इससे जहां 1980 के दशक चीन की कुल आबादी में शहरी आबादी की तादाद 20 प्रतिशत से भी कम थी वहीं अब यह लगभग आधी, यानी 50 फीसद हो गई है. 2030 तक चीन की 70 फीसद आबादी शहरों में रह रही होगी.

निसंदेह चीन के शहरीकरण ने उस देश की शानदार प्रगति और तीव्र रूपांतरण में अतुलनीय योगदान दिया है. इसके शहरों ने सस्ती जमीन और सस्ता श्रम उपलब्ध कराया जिसका फायदा उठाकर स्थानीय सरकारों ने भारी मात्रा में पूंजी निवेश को आकर्षित किया और नए-नए रोजगारों का निर्माण किया.

लेकिन अब इस व्यवस्था के चरमराने के संकेत दिखने लगे हैं. पूंजी-निवेश और निर्यात के बल पर पनपा चीनी विकास मॉडल अब अपनी ऊर्जा खोने लगा है. घिचपिच बसे शहरों की हदें अपने पांव पसार रही हैं. उनकी जमीनें छिनती जा रही हैं और बदले में उन्हें पर्याप्त मुआवजा भी नहीं मिल रहा है. दरअसल ये जमीनें स्थानीय सरकारों के लिए गिरवी रखकर कर्ज लेने में बहुमूल्य संसाधन हैं (जो अब जीडीपी के 30% के बराबर है).

To continue reading, please log in or enter your email address.

To read this article from our archive, please log in or register now. After entering your email, you'll have access to two free articles every month. For unlimited access to Project Syndicate, subscribe now.

required

By proceeding, you agree to our Terms of Service and Privacy Policy, which describes the personal data we collect and how we use it.

Log in

http://prosyn.org/2fD4oMc/hi;

Cookies and Privacy

We use cookies to improve your experience on our website. To find out more, read our updated cookie policy and privacy policy.