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दवा का सामाजिक विज्ञान

डावोस – 1980 के दशक के मध्य में जब मैं एक मेडिकल छात्र था, मुझे पापुआ न्यू गिनी में मलेरिया हुआ था। यह एक कष्टकारी अनुभव था। मेरे सिर में दर्द होता था। मेरा तापमान बढ़ गया था। मुझमें खून की कमी हो गई थी। लेकिन मैंने दवा लेना जारी रखा, और मैं ठीक हो गया। यह अनुभव सुखद नहीं था, लेकिन सस्ती, प्रभावशाली मलेरिया की दवाओं की बदौलत मैं बहुत ज्यादा खतरे में कभी नहीं था।

क्लोरोक्विन की जिन गोलियों से मैं ठीक हुआ था वे गोलियां अब बिल्कुल काम नहीं करती हैं। यहां तक कि जब मैं उन्हें ले रहा था तब भी, जिस परजीवी के कारण मलेरिया होता है वह पहले ही दुनिया के कई हिस्सों में क्लोरोक्विन का प्रतिरोधी बन चुका था; पापुआ न्यू गिनी उन कुछ स्थानों में से एक था जहां गोलियाँ प्रभावशाली बनी हुई थीं, और इसके बावजूद वहां भी उनकी शक्ति कम होती जा रही थी। आज, क्लोरोक्विन मूल रूप से हमारे चिकित्सा शस्त्रागार से गायब हो गई है।

एंटीबायोटिक दवाओं और अन्य रोगाणुरोधी दवाओं का प्रतिरोध करनेवाले रोगाणुओं की बढ़ती क्षमता आजकल के स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सबसे बड़े उभरते संकट में तब्दील हो रही है - और यह एक ऐसा संकट है जिसे अकेले विज्ञान द्वारा हल नहीं किया जा सकता है।

अब क्लोरोक्विन की जगह अन्य दवाएं आने लगी हैं। तपेदिक की बहु-दवा-प्रतिरोधी प्रजातियां, ई.कोली, और साल्मोनेला अब आम हो चुकी हैं। अधिकांश सूजाक संक्रमण लाइलाज हैं। मेथिसिलिन-प्रतिरोधी स्टैफ़िलोकॉकस ऑरियस (एसआरएसए) और क्लोस्ट्रीडियम डिफ़िसाइल जैसे सुपरबग, तेजी से फैल रहे हैं। भारत में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमणों से 2013 में 58,000 से अधिक नवजात शिशुओं की मृत्यु हो गई थी।

आज, मलेरिया का इलाज अक्सर चीनी जड़ी-बूटी से निकाली गई एक दवा - आर्टीमिसिनिन - और अन्य मलेरिया-रोधी दवाओं के संयोजन से किया जाता है। लेकिन इन क्रांतिकारी दवाओं के क्लोरोक्विन की ही तरह अप्रचलन में होने का खतरा है; दक्षिण पूर्व एशिया में मलेरिया की प्रतिरोधी-प्रजातियां होने का पता चला है।

यह मात्र चिकित्सा समस्या नहीं है; यह एक संभावित आर्थिक आपदा है। अर्थशास्त्री जिम ओ नील की अध्यक्षता में की गई रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर समीक्षा द्वारा की गई शोध में यह अनुमान लगाया गया है कि यदि मौजूदा प्रवृत्तियां जारी रहती हैं तो दवा प्रतिरोधी संक्रमणों से 2050 तक प्रति वर्ष दस लाख लोगों की मृत्यु होगी और अगले 35 वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग $100 ट्रिलियन खर्च करना पड़ेगा।

हो सकता है कि यह नाटकीय भविष्यवाणी भी बहुत कम हो क्योंकि इसमें संक्रमण के कारण जीवन और स्वास्थ्य की होने वाली हानि की दृष्टि से केवल प्रत्यक्ष लागतें ही शामिल हैं। आधुनिक चिकित्सा के कई अन्य पहलू भी एंटीबायोटिक दवाओं पर भरोसा करते हैं। कीमोथेरेपी प्राप्त करनेवाले कैंसर रोगी इन्हें बैक्टीरिया को दबाने के लिए लेते हैं जो अन्यथा उनकी कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला कर देगा। आजकल जोड़ों के प्रतिस्थापन और सीजेरियन वर्गों सहित जिन शल्यक्रियाओं को नेमी मान लिया जाता है, उन्हें केवल तभी सुरक्षित रूप से किया जा सकता है जब एंटीबायोटिक दवाओं से संभावित संक्रमणों को रोका जाता है।

दवा प्रतिरोध के मूल विकास के अच्छी तरह से समझे-बूझे मामले हैं। यदि रोगजनकों पर विषाक्त दवाओं का चयनात्मक दबाव पड़ता है, तो अंततः वे उसके अनुकूल हो जाएंगे। मैं जिस वैलकम ट्रस्ट का नेतृत्व करता हूं, उसने इन तंत्रों के बारे में शोध, निदान में सुधार, और नई दवाएं तैयार करने में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है।

समस्या का प्रभावी ढंग से समाधान करने के लिए, इस प्रयास को जैविक विज्ञान के दायरे से आगे बढ़ाकर दवा के साथ पारंपरिक रूप से न जुड़े क्षेत्रों तक ले जाना चाहिए। अमीर और गरीब देशों दोनों में ही समान रूप से, हम एंटीबायोटिक दवाओं के नियमित नशेड़ी बन गए हैं। प्रतिरोध का मुकाबला करने की कुंजी यह है कि रोगजनक जिस गति से अनुकूलन कर सकते हैं उस गति को कम किया जाए। लेकिन, एंटीबायोटिक दवाओं के अधिक उपयोग और उपचार के लिए आवश्यक कोर्स को पूरा न करने के फलस्वरूप, हम रोगाणुओं का उपयोग अभी पर्याप्त दवा प्रतिरोध को प्रोत्साहित करने के लिए कर रहे हैं। वास्तव में, हम रोगाणुओं का टीका लगाकर हम उनके खिलाफ जो प्रयोग करना चाहते हैं उसे दवाओं के खिलाफ कर रहे हैं।

यह इसलिए है कि हम एंटीबायोटिक दवाओं को लगभग उपभोक्ता वस्तुओं के रूप में मानने लग गए हैं, क्योंकि हम डॉक्टरों से इसकी मांग करते हैं, और हम इसे अपनी मर्ज़ी से लेते हैं या जब हमें ठीक लगता है हम इसे लेना बंद कर देते हैं। यहां तक कि सबसे अधिक सूचनाप्राप्त रोगियों द्वारा इन चमत्कारी दवाओं का दुरुपयोग किया जाता है। यूनाइटेड किंगडम में की गई शोध से पता चला है कि यहां तक कि जो लोग यह समझते हैं कि प्रतिरोध कैसे विकसित होता है वे अक्सर समस्या को इस रूप में बढ़ा देते हैं कि वे डॉक्टर के पर्चे के बिना एंटीबायोटिक लेने लगते हैं या अपनी दवाएं अपने परिवार के सदस्यों को दे देते हैं।

ऐसे विनाशकारी व्यवहार को बदलने के लिए यह आवश्यक होगा कि हम इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों को बेहतर रूप से समझें। इतिहास, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, नृविज्ञान, अर्थशास्त्र, बाजार अनुसंधान, और सामाजिक विपणन जैसे विषय इसमें मदद कर सकते हैं।

यह केवल रोगाणुरोधी प्रतिरोध के लिए ही सत्य नहीं है। यह इबोला जैसी महामारी के फैलने पर भी लागू होता है। वायरस का मुकाबला करने के लिए उसके जीव विज्ञान, इसके संचारण के महामारी विज्ञान, और उन दवाओं और टीकों के बारे में ज्ञान की आवश्यकता है जिनका संभवतः इसके खिलाफ उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उन व्यवहारों को भी समझने की आवश्यकता है जिनके कारण यह संक्रमण लाइबेरिया, सिएरा लियोन, और गिनी में फैल सका।

यह समझाने के लिए कि ये समाज किन कारणों से इतने कमजोर बने हैं, इसके लिए इन क्षेत्रों के हाल के इतिहास के बारे में जानने और यह समझने की आवश्यकता है कि वहां के लोगों में सरकारी अधिकारियों के प्रति इतना अधिक अविश्वास क्यों है। इबोला को नियंत्रण में रखने के लिए रोगियों को अलग रखना और मृतकों को सुरक्षित रूप से दफन करना महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दोनों को सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ लागू किए जाने की जरूरत है – केवल उनके पीछे मौजूद विज्ञान संबंधी कारणों के स्पष्टीकरण की नहीं।

आज के सार्वजनिक स्वास्थ्य के बड़े खतरों के आर्थिक परिणाम बहुत गंभीर होते हैं। उनके कारण होनेवाले जोखिमों को न्यूनतम रखने के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि वे सामाजिक, व्यवहार संबंधी और सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ परस्पर गुंथे हुए हैं। विज्ञान शक्तिशाली उपकरण उपलब्ध करता है। लेकिन इन उपकरणों का प्रभावी रूप से उपयोग करने के लिए हमें केवल विज्ञान की ही जरूरत नहीं है।