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रोगाणुरोधी प्रतिरोध के ख़िलाफ़ निष्पक्ष लड़ाई

ब्राइटन - मौजूदा रोगाणु-रोधी दवाएँ अप्रभावी होती जा रही हैं। अगर मौजूदा रुझान जारी रहते हैं, तो हम एंटीबायोटिक की खोज से पहले की स्थितियों में दोबारा जी रहे होंगे, जब संक्रामक रोग प्रमुख प्राणघातक थे।

दवा-रोधी रोगाणुओं की चुनौती का सामना करना कठिन होगा।  इसके लिए न केवल नई रोगाणु-रोधी दवाओं के अनुसंधान और विकास में प्रमुख निवेश की ज़रूरत होगी, बल्कि नए इलाजों को नियंत्रित और सीमित करने की ज़रूरत भी होगी, ताकि उनकी प्रभावकारिता संरक्षित रखी जा सके। जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर प्रतिक्रिया के साथ है, प्रभावी रणनीति के लिए अंतर्राष्ट्रीय समन्वय की ज़रूरत होगी। ख़ास तौर से, सरकारी भुगतानकर्ताओं और वैश्विक ग़रीबों के साथ फ़ार्मास्यूटिकल कंपनियों की ज़रूरतों का समाधान किया जाना चाहिए।

दरअसल, किसी भी प्रयास के लिए ग़रीबों को जोड़ना महत्वपूर्ण होगा। निम्न और मध्यम आय वाले देश दवा-रोधी जीवों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भीड़-भाड़ वाले आवास, ख़राब स्वच्छता, और प्रतिरक्षा प्रणाली को ख़तरे में डालना, चाहे वह कुपोषण या HIV जैसे जीर्ण संक्रमण के कारण हो, संक्रमण के लिए उपजाऊ ज़मीन प्रदान करते हैं। एंटीबायोटिक का अक्सर दुरुपयोग किया जाता है या उनकी गुणवत्ता कम होती है, जिससे बैक्टीरिया को प्रतिरोध विकसित करने का अवसर मिलता है। एंटीबायोटिक की बड़ी मात्रा का इस्तेमाल पशुपालन में भी किया जाता है। इस बीच, परिवहन की बुनियादी सुविधाओं में अत्यधिक सुधार - ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच और देशों के बीच - का मतलब है कि प्रतिरोधी जीन शीघ्र वैश्विक पूल का हिस्सा बन जाते हैं।

कई असुरक्षित देशों में, सरकारी स्वास्थ्य-देखभाल प्रणाली माँग पूरा नहीं कर पाती, और विविध प्रदाता इस खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें चिकित्सा विशेषज्ञों से लेकर अनौपचारिक प्रदाता तक शामिल हैं, जो मुख्यतः विनियामक ढाँचे के बाहर काम करते हैं। पैबंद वाली इन प्रणालियों के लाभ भी हैं। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में एक ताज़ा अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया है कि अक्सर बाज़ार के स्टालों से संचालन करने वाले तथाकथित "गाँव के डॉक्टरों" द्वारा प्रदान की जाने वाली एंटीबायोटिक दवाओं ने प्रसवोत्तर रोगाणुता और बचपन के निमोनिया से मृत्यु दर में गिरावट लाने में योगदान किया है। लेकिन इसके भी काफ़ी सबूत हैं कि प्रदान की जा रही दवाएँ विविध गुणवत्ता की होती हैं और अक्सर उन्हें बिना आवश्यकता के ले लिया जाता है। बहुत बार, रोगी इलाज का पूरा कोर्स नहीं ख़रीदते।

इस पर एक प्रतिक्रिया यह हो सकती है कि ऐसे क़ानून तैयार और लागू किए जाएँ जिनसे एंटीबायोटिक दवाएँ केवल डॉक्टर के पर्चे पर उपलब्ध हो सकें। बहरहाल, इसके परिणामस्वरूप एंटीबायोटिक दवाओं तक ग़रीब लोगों की पहुँच गंभीर रूप से सीमित हो सकती है, जिससे संक्रमण से मृत्यु दर उच्च हो सकती है, जो इसे राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य और इसलिए लागू करने में मुश्किल बना देगा। इसका बेहतर विकल्प यह होगा कि एंटीबायोटिक इलाजों को बेहतर बनाने के लिए ऐसी नई रणनीतियाँ विकसित की जाएँ जिनसे इन्हें अनौपचारिक स्रोतों के माध्यम से प्रदान किया जाए।

शुरूआत करनेवालों के लिए, उन दवाओं पर भरोसेमंद निगरानी डेटा उत्पन्न करने के लिए निवेश करने की ज़रूरत है जो आम संक्रमण के ख़िलाफ़ प्रभावी हैं। इलाज के दिशा-निर्देशों में यह जानकारी शामिल की जानी चाहिए और एंटीबायोटिक दवाओं के सभी प्रदाताओं की दी जानी चाहिए।

इस बीच, उच्च गुणवत्ता वाली एंटीबायोटिक दवाएँ किफ़ायती क़ीमतों पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। नकली उत्पादों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें बाज़ार से निकाल दिया जाना चाहिए, और गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए सरकारों, फ़ार्मास्यूटिकल क्षेत्र, और नागरिक समूहों के बीच नियामक साझेदारी विकसित की जानी चाहिए। क़ीमतों को थोक ख़रीद के माध्यम से कम रखा जाना चाहिए; कुछ मामलों में, सार्वजनिक आर्थिक सहायता भी ज़रूरी हो सकती है।

क़ीमतों को कम करने के उपायों के पूरक के रूप में बहुत ज़्यादा इस्तेमाल को हतोत्साहित करने की ज़रूरत होगी। पैकेजिंग में नवाचार, शायद दवाओं के उचित संयोजन का पूरा कोर्स उपलब्ध कराना, इलाज के फ़ैसले को आसान बना सकेगा। इसी तरह, कम-लागत की नैदानिक प्रौद्योगिकियों का विकास केवल लक्षणों के आधार पर इलाज प्रदान करने की ज़रूरत कम करने में मदद कर सकता है।

सबसे बड़ी चुनौती एंटीबायोटिक दवाओं के प्रदाताओं को अपना व्यवहार बदलने के लिए प्रोत्साहित करना होगी। इसके लिए, तकनीकी सहायता देने और कार्य-निष्पादन की निगरानी के लिए मान्यता, भुगतान तंत्र के संशोधन, और मध्यस्थ संगठनों की भागीदारी जैसे उपायों की ज़रूरत होगी। इन संगठनों में गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक संगठन, सामाजिक उद्यमी, और दवाएँ वितरित करने वाली कंपनियाँ शामिल हो सकती हैं। इसकी संभावना नहीं है कि ये गतिविधियाँ वाणिज्यिक रूप से स्थायी हो सकेंगी, और इसलिए इनके लिए सरकारों, परोपकारी संस्थाओं, और शायद दवा उत्पादकों से समर्थन की ज़रूरत होगी।

इस बीच, लोगों को एंटीबायोटिक दवाओं के समुचित इस्तेमाल पर भरोसेमंद जानकारी और सलाह मिलनी चाहिए। यह ख़ास तौर से वहाँ महत्वपूर्ण है जहाँ नागरिक स्वास्थ्य की समस्याओं से निपटने के लिए काफ़ी हद तक अपने खुद के संसाधनों पर निर्भर करते हैं।

एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल में प्रणाली में व्यापक बदलाव लागू करने के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक गठबंधनों की ज़रूरत होगी। एक मुख्य लक्ष्य स्वास्थ्य कर्मियों और दवा कंपनियों के आचरण के बुनियादी मानक स्थापित करना होगा जिसमें रोगियों और समुदायों की ज़रूरतें प्रतिबिंबित हों। सरकारों को इस प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए अपनी क्षमता का निर्माण करने की ज़रूरत होगी, और दवाओं और नैदानिक प्रौद्योगिकियों का विकास, उत्पादन, और वितरण करने वाली कंपनियों को सहयोगी समाधानों की खोज के लिए सक्रिय रूप से योगदान करना होगा। हम एंटीबायोटिक दवाओं से सही रूप में लाभ तभी उठा सकेंगे जब हम उनका निष्पक्ष और स्थायी तरीके से प्रबंधन कर सकेंगे।