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अफ्रीका की अनिवार्य आंकड़ा क्रांति

वाशिंगटन, डीसी - जब से ‘आंकड़ा क्रांति’ (डाटा रिवॉल्यूशन) परिभाषा की शुरूआत हुई है तब से विकास सांख्यिकी के संग्रह, उपयोग और वितरण के कायांतरण हेतु एजेंडा को परिभाषित, विकसित तथा लागू करने के लिए गतिविधियों की बाढ़ सी आ गई है. इसका कुछ अर्थ भी निकलता है. इसके विस्तार में जाए बगैर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के अगले विकास एजेंडा का अनुमान सटीक आंकड़ों के बिना लगाना नामुमकिन होगा.

लेकिन फिर भी उप-सहारा अफ्रीका में - जहां आगामी निर्वहनीय विकास लक्ष्यों के अधीन विकास की सर्वाधिक संभावनाएं मौजूद हैं - सटीक आंकड़ों का नितांत अभाव है. 1990 से 2009 तक केवल एक उप-सहारा देश ने सन् 2000 में स्थापित सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के सभी 12 संकेतकों पर आंकड़ों का संग्रह किया है. सचमुच, उन 60 देशों में एक भी अफ्रीका में नहीं है जिनके पास सभी आवश्यक सांख्यिकी उपलब्ध है. हालांकि अधिकांश अफ्रीकी देशों ने पिछले एक दशक में संभवतः  आर्थिक प्रगति दर्ज की है, लेकिन उन आंकड़ों की सटीकता जिन पर विकास अनुमान आधारित हैं संपूर्णता से कोसों दूर है. मुद्रास्फीती, खाद्य उत्पादन, शिक्षा तथा टीकाकरण दरों से जुड़े आंकड़ों की तो बात ही छोड़ दें. इस साल के आरंभ में नाइजीरिया के अनुभव की बात करते हैं.

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सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का पुनआर्धारीकरण करने पर पाया गया कि वहां की अर्थव्यवस्था पूर्वानुमानित अर्थव्यवस्था के मुकाबले करीब 90% ज्यादा बड़ी थी. पूर्वानुमानित सांख्यिकी द्वारा उपलब्ध कराई गई नाइजीरियाई अर्थव्यवस्था की यह विकृत तसवीर संभव है कि निजी पूंजी निवेश, क्रेडिट रेंटिग और कराधान के संदर्भ में गलत फैसले लेने का कारण बनती. इसके अलावा, इसका अर्थ होता कि नाइजीरिया को उसके जायज हक से कहीं ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय सहायता मिली. यह सहायता अन्य और अधिक जरूरतमंद देशों को जा सकती थी.

सामान्य विश्वास के विपरीत, मौलिक आंकड़ों के उत्पादन और उपयोग में रूकावटें तकनीकी क्षमता और ज्ञान की कमी से नहीं उपजतीं, बल्कि इनके पीछे छिपे राजनीतिक व व्यवस्थात्मक चुनौतियों से उत्पन्न होती हैं. शुरूआत के लिए, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालयों के पास अकसर संस्थागत स्वायत्तता का अभाव होता है जो आंकड़ों में इमानदारी बनाए रखने के लिए अनिवार्य है. इस तरह एकत्र आंकड़े आमतौर पर राजनीतिक शक्तियों और विशेष हित समूहों से प्रभावित होते हैं.

और फिर अपर्याप्त तरीके से गठित नीतियां भी आंकड़ों की सटीकता को प्रभावित करती हैं. मिसाल के तौर पर सरकारें और दानदाता कभी कभार धन उपलब्धता को स्व-प्रतिवेदित उपायों से जोड़ देते हैं. इससे प्राप्तकर्ताओं में प्रमुख आंकड़ों यथा टीकाकरण या विद्यालय नामांकन दरों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है. इस प्रकार प्रभावी निगरानी तंत्र के बगैर प्रगति को पुरुस्कृत करने के सदाशयी प्रयास भी छिन्न-भिन्न हो सकते हैं.

इन तमाम विफलताओं के बावजूद राष्ट्रीय सरकारें और अंतर्राष्ट्रीय दानदाता पर्याप्त आंकड़ों का संग्रहण सुनिश्चित करने के लिए बहुत कम संसाधन उपलब्ध कराते हैं. आधिकारिक विकास सहायता का मात्र 2% ही सांख्यिकी की गुणवत्ता सुधारने पर खर्च किया जाता है. यह रकम बाकी 98% सहायता के असर का सही-सही अनुमान लगाने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है. और सरकार की दानदाताओं पर अपनी आंतरिक सांख्यिकी को एकत्र करने के लिए धन व्यवस्था हेतु निर्भरता आनादि काल तक नहीं चल सकती.

दरअसल शक्तिशाली राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणालियां आंकड़ों की सटीकता, समयानुकूलता तथा उपलब्धता में सुधार की दिशा में पहला कदम है. ये आंकड़े किसी भी प्रमुख आर्थिक या समाज-कल्याण संकेतक की गणना के लिए आवश्यक हैं. इनमें जन्म व मृत्यु पर, वृद्धि व गरीबी, कर व व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा सुरक्षा और भूमि व पर्यावरण पर आंकड़े शामिल हैं.

ऐसी प्रणालियों को विकसित करना महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य है जिसे हासिल किया जा सकता है. इसके लिए जो चाहिए वह है आंकड़ों को इकट्ठा करने, उपयोग तथा साझा करने के नए रास्तों के साथ परीक्षण करने की इच्छा.

इसी जगह पर जनता की अहम भूमिका है. यदि निजि फर्में, मीडिया और नागरिक-सामाजिक संगठन विशिष्ट समस्याओं की पहचान करें तथा बदलाव के लिए सार्वजनिक रूप से आवाह्न करें तो उनकी सरकारों पर दबाव बनेगा कि वे सटीक, पूर्वाग्रहरहित आंकड़ों के संग्रह के लिए जरूरी कदम उठाएं. यानी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालयों को स्वायत्तता प्रदान करें और ज्यादा पढ़े-लिखे कर्मिकों की नियुक्ति के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराएं. यहां सरकार को किनारे करने का और आसान तकनीक आधारित समाधान की उम्मीद करने का लोभ हो सकता है. लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र को साथ लिये बगैर निर्वहनीय व विश्वसनीय प्रगति कठिन होगी. सरकारों तथा बाहरी दानदाताओं द्वारा खासतौर पर राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणालियों के लिए अधिक तथा ज्यादा कुशल धन व्यवस्था की जरूरत को पहचानना ऐसे किसी भी परिवर्तन का अभिन्न अंग होगा. एजेंसियों के लिए प्रबल प्रोत्साहनों की स्थापना से कि वे अच्छे आंकड़ों - यानी ऐसे आंकड़े जो सटीक, समयानुकूल और आसानी से उपलब्ध हों - संग्रह करने में सचमुच मदद मिलेगी. इनसे साफ-साफ तय हो पाएगा कि ‘अच्छे’ की श्रेणी में क्या आता है. दरअसल, इन स्पष्ट परिभाषाओं पर आधारित प्रगति को प्रदर्शन के अनुसार-भुगतान अनुबंधों से जोड़ने से विकास के नतीजों में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है.

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इन लक्ष्यों को हासिल करने की एक ठोस रणनीति हो सकती है कि बेहतर आंकड़ों के लिए देश-दानदाता का मंच बनाया जाए. ऐसे किसी मंच से सरकारें व दानदाता राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणाली के गठन हेतु अपने साझा मनसूबे की घोषणा कर सकेंगे. इस प्रणाली को अनेक वर्षों में बनाया जा सकता है तथा इसमें स्पष्ट व सत्यापन योग्य तथ्य होंगे. इससे किसी खास देश संबंधी ढांचा मिलेगा जिससे धन-व्यवस्था के तौर-तरीकों तथा नागरिक समाज व निजि क्षेत्र की भागीदारी में नवाचार का समावेश होगा और आंकड़ों के संग्रह व वितरण के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकेगा. संक्षेप में इस मंच से घरेलू तथा दानदाता से प्राप्त धन को राष्ट्रीय सांख्यिकी प्राथमिकताओं को हासिल करने के लिए चलाने और केंद्रित करने में मदद मिलेगी.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में आंकड़े निष्पादन, उत्तरदायित्व और विश्वसनीयता की मुद्रा का काम करते हैं. और आंकड़ों में सुधार को बेहतर प्रशासन तथा निजि पूंजी निवेश के उच्च स्तरों के साथ जोड़ा जाता है. अफ्रीका को वृद्धि व विकास के नए दशक में इसी चीज का समर्थन करने की जरूरत है.