2

अंतर्राष्ट्रीय कर सहयोग की विफलता

न्यूयॉर्क – दुनिया की अधिकतर सरकारें कराधान के मामलों में सहयोग करने में रुचि रखती हैं क्योंकि वे विकास के वित्तपोषण के लिए अधिक कर राजस्व जुटाने और ऐसी व्यापक कर-वंचन योजनाओं पर अंकुश लगाने के लिए उत्सुक हैं जिनका पिछले वर्ष तथाकथित लक्ज़मबर्ग लीक कांड में खुलासा हुआ था। फिर भी पिछले महीने अदीस अबाबा में आयोजित विकास के लिए वित्तपोषण पर तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में, अंतर्राष्ट्रीय कर सहयोग को मजबूत करने की गति में अचानक अवरोध आ गया था।

विकसित देशों ने इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र की विशेषज्ञों की मौजूदा समिति के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र के भीतर एक अंतर-सरकारी कर निकाय की स्थापना करने के एक प्रस्ताव को रोक दिया। ये देश इस बात पर जोर देते हैं कि कर सहयोग के मामले पर अनन्य रूप से ओईसीडी के नेतृत्व में विचार किया जाना चाहिए, जो एक ऐसा निकाय है जिसका नियंत्रण उनके हाथ में है।

दुनिया के बाकी देशों को यह आशा करनी चाहिए कि 13 साल पहले मॉन्टेरी, मेक्सिको में विकास के लिए वित्तपोषण पर पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में जिस अंतर्राष्ट्रीय कर सहयोग की शुरूआत हुई थी, इससे उसकी प्रगति का अंत नहीं होगा बल्कि इसमें एक ठहराव आएगा। दो वर्ष बाद, 2004 में, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) ने कर विशेषज्ञों के अपने "तदर्थ समूह" को एक नियमित समिति के रूप में उन्नत किया। इसका अर्थ यह था कि विशेषज्ञ नियमित रूप से मिलेंगे और वे एक विस्तारित अधिदेश के अंतर्गत कार्य करेंगे जिसका कार्यक्षेत्र मॉडल दोहरे-कराधान की संधि को अद्यतन करने मात्र से बहुत अधिक बढ़ गया था।

चार वर्ष बाद, दोहा, कतर में विकास के लिए वित्तपोषण पर दूसरे सम्मेलन में, नीति निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि कर संबंधी मामलों में अभी और अधिक किया जाना जरूरी है, और उन्होंने ECOSOC से अनुरोध किया कि वह संस्थागत व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर विचार करे। और उसके बाद, अदीस अबाबा सम्मेलन के वर्ष में, संय���क्त राष्ट्र के महासचिव ने "संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में, कर सहयोग पर एक अंतर-सरकारी समिति" की आवश्यकता का समर्थन किया।