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समुद्र में क़ानून-व्यवस्था हासिल करना

टोक्यो – एशिया और दुनिया में शांति सुनिश्चित करने में जापान बड़ी और ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आज पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है। हमें अपने सहयोगी दलों और अन्य अनुकूल देशों का स्पष्ट और उत्साहपूर्ण समर्थन प्राप्त है, जिनमें हर आसियान सदस्य देश और संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, यूनाइटेड किंगडम, और फ़्रांस, और अन्य शामिल हैं। उन सभी को पता है कि जापान - एशिया और सभी लोगों के लिए - क़ानून-व्यवस्था का समर्थक है।

हम अकेले नहीं हैं। ज़्यादातर एशिया-प्रशांत देशों में, आर्थिक विकास ने विचार और धर्म की आज़ादी, और साथ ही और ज़्यादा जवाबदेह और संवेदनशील राजनीतिक प्रणाली का पोषण किया है। हालाँकि ऐसे बदलावों की गति हर देश में अलग-अलग है, लेकिन क़ानून-व्यवस्था के विचार ने जड़ पकड़ ली है। और इसका मतलब है कि क्षेत्र के राजनीतिक नेताओं को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना होगा।

यह ज़रूरत अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून के क्षेत्र में जितनी स्पष्ट है, उतनी दूसरे क्षेत्रों में नहीं है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक ही पीढ़ी के अंतराल में ज़बरदस्त विकास हुआ है। अफसोस की बात है कि उस विकास के फल का बड़ा और सापेक्षिक रूप से अनुपयुक्त हिस्सा सेना के विस्तार में लगाया जा रहा है। अस्थिरता के स्रोतों में न केवल सामूहिक विनाश के हथियारों का ख़तरा शामिल है, बल्कि साथ ही - और ज़्यादा तात्कालिक रूप से – इसमें बल या अतिचार के माध्यम से क्षेत्र-संबंधी यथास्थिति को बदलने के प्रयास भी शामिल हैं। और ये प्रयास प्रमुख रूप से समुद्र में हो रहे हैं।

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और मैंने पारस्परिक रूप से क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा की आधारशिला के रूप में हमारे देशों के सहयोग की पुष्टि की है। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान क्षेत्रीय और वैश्विक शांति और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए समान विचारधारा वाले भागीदारों के साथ त्रिपक्षीय सहयोग को मज़बूत कर रहे हैं। पहले ही, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबट और मैं सहमत हो चुके हैं कि हमें ठीक ऐसा ही करना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून का इतिहास लंबा है, जो प्राचीन ग्रीस तक पीछे जाता है। रोमन समय तक, समुद्र सभी के लिए खुले थे और निजी अधिकार और विभाजन करना निषिद्ध था। अन्वेषण के युग की शुरुआत से, बड़ी संख्या में लोगों ने असंख्य कारणों से समुद्रों को पार किया है, और समुद्र-आधारित वाणिज्य ने दुनिया के क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ा है। गहरे समुद्र पर आज़ादी मानव समृद्धि के लिए मूलभूत सिद्धांत बन गया है।

किसी विशेष देश या समूह ने ऐसा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून नहीं बनाया जैसा यह अब मौजूद है। यह मानव जाति की सामूहिक मेधा का उत्पाद है, जो सबकी भलाई के लिए अनेक सालों से ज़्यादा समय में तैयार किया गया है। आज, मानवता के लिए बहुत से लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि प्रशांत से लेकर हिंद महासागर तक समुद्र पूरी तरह खुले रहें।

लेकिन इसका, वास्तव में, क्या मतलब है? अगर हम उस चेतना का सार करें जो हमने अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में सदियों से समाहित की है और इसकी तीन सिद्धांतों के रूप में पुनः रचना करें, तो समुद्र में क़ानून-व्यवस्था सामान्य ज्ञान की बात हो जाती है।

सबसे पहले, देशों को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के आधार पर अपने दावे पेश और स्पष्ट करने चाहिए। दूसरे, देशों को अपने दावे साकार करने की कोशिश में बल या अतिचार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। और, तीसरे, देशों को विवाद शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने चाहिए। इन तीनों अत्यंत सरल - जो लगभग स्वयं स्पष्ट हैं - सिद्धांतों पर ज़ोर दिया जाना चाहिए, क्योंकि एशिया और प्रशांत में सभी सरकारों को इन्हें कड़ाई से बनाए रखने चाहिए।

इंडोनेशिया और फिलीपींस पर विचार करें, ये वे देश हैं जिनके नेता अपने अनन्य आर्थिक क्षेत्रों की अतिव्याप्ति के परिसीमन के लिए शांतिपूर्ण समझौते पर पहुँच गए हैं। इसी तरह, मेरी सरकार दृढ़ता से फिलीपींस के दक्षिण चीन सागर में क्षेत्र-संबंधी विवाद के समाधान के लिए आह्वान का पूरा समर्थन करती है जो सही मायने में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून के तीन सिद्धांतों के साथ सुसंगत है, ठीक वैसे ही जैसे हम वियतनाम के क्षेत्र-संबंधी विरोधी दावों के समाधान के लिए बातचीत के माध्यम से प्रयासों का समर्थन करते हैं।

एक निष्पन्न कार्य को दूसरे पर जमा करके यथास्थिति में बदलावों को म़जबूत करने के प्रयासों के बजाय, इस क्षेत्र की सरकारों को 2002 के दक्षिण चीन समुद्र में पक्षों के व्यवहार पर समझौते की चेतना और प्रावधानों पर लौटने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिए, जिन पर पहले सभी संबंधित पक्षों ने सहमति व्यक्त की थी। आज की दुनिया में, देशों को इस बात का डर नहीं होना चाहिए कि अतिचार और धमकियाँ नियमों और क़ानूनों की जगह ले लेंगी। मैं दृढ़ता से आशा करता हूँ कि आसियान सदस्य देश और चीन दक्षिण चीन सागर के लिए शीघ्रता से सही मायने में प्रभावी आचार संहिता स्थापित कर लेंगे।

जापान और चीन के बीच एक समझौता है जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और मैंने, प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान 2007 में संपन्न किया था। हमने अपने देशों के बीच अप्रत्याशित घटनाओं को तनाव और ग़लत गणना करने से रोकने के लिए समुद्री और हवाई संचार तंत्र तैयार करने के लिए प्रतिबद्धता की थी। दुर्भाग्य से, यह प्रतिबद्धता ऐसे तंत्र के क्रियान्वयन में तब्दील नहीं हुई है।

हम लड़ाकू विमानों और समुद्र में जहाजों द्वारा ख़तरनाक मुठभेड़ों का स्वागत नहीं करते। जापान और चीन को जिस चीज़ का आदान-प्रदान करना चाहिए, वे शब्द हैं। क्या हमें वार्ता की मेज़ पर नहीं मिलना चाहिए, एक दूसरे से मुस्कराकर हाथ नहीं मिलाने चाहिए, और आपस में बात नहीं करनी चाहिए?

मेरा मानना कि 2007 के समझौते के माध्यम से अनुसरण करने से पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और अनेक समझौतों की ज़रूरत  होगी, जिनमें से प्रत्येक क्षेत्र आज़ादी और समृद्धि के क्षेत्र-व्यापी जाल का एक महत्वपूर्ण तंतु बनेगा।