Monday, September 22, 2014
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समुद्र में क़ानून-व्यवस्था हासिल करना

टोक्यो – एशिया और दुनिया में शांति सुनिश्चित करने में जापान बड़ी और ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आज पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है। हमें अपने सहयोगी दलों और अन्य अनुकूल देशों का स्पष्ट और उत्साहपूर्ण समर्थन प्राप्त है, जिनमें हर आसियान सदस्य देश और संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, यूनाइटेड किंगडम, और फ़्रांस, और अन्य शामिल हैं। उन सभी को पता है कि जापान - एशिया और सभी लोगों के लिए - क़ानून-व्यवस्था का समर्थक है।

हम अकेले नहीं हैं। ज़्यादातर एशिया-प्रशांत देशों में, आर्थिक विकास ने विचार और धर्म की आज़ादी, और साथ ही और ज़्यादा जवाबदेह और संवेदनशील राजनीतिक प्रणाली का पोषण किया है। हालाँकि ऐसे बदलावों की गति हर देश में अलग-अलग है, लेकिन क़ानून-व्यवस्था के विचार ने जड़ पकड़ ली है। और इसका मतलब है कि क्षेत्र के राजनीतिक नेताओं को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना होगा।

यह ज़रूरत अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून के क्षेत्र में जितनी स्पष्ट है, उतनी दूसरे क्षेत्रों में नहीं है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक ही पीढ़ी के अंतराल में ज़बरदस्त विकास हुआ है। अफसोस की बात है कि उस विकास के फल का बड़ा और सापेक्षिक रूप से अनुपयुक्त हिस्सा सेना के विस्तार में लगाया जा रहा है। अस्थिरता के स्रोतों में न केवल सामूहिक विनाश के हथियारों का ख़तरा शामिल है, बल्कि साथ ही - और ज़्यादा तात्कालिक रूप से – इसमें बल या अतिचार के माध्यम से क्षेत्र-संबंधी यथास्थिति को बदलने के प्रयास भी शामिल हैं। और ये प्रयास प्रमुख रूप से समुद्र में हो रहे हैं।

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और मैंने पारस्परिक रूप से क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा की आधारशिला के रूप में हमारे देशों के सहयोग की पुष्टि की है। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान क्षेत्रीय और वैश्विक शांति और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए समान विचारधारा वाले भागीदारों के साथ त्रिपक्षीय सहयोग को मज़बूत कर रहे हैं। पहले ही, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबट और मैं सहमत हो चुके हैं कि हमें ठीक ऐसा ही करना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून का इतिहास लंबा है, जो प्राचीन ग्रीस तक पीछे जाता है। रोमन समय तक, समुद्र सभी के लिए खुले थे और निजी अधिकार और विभाजन करना निषिद्ध था। अन्वेषण के युग की शुरुआत से, बड़ी संख्या में लोगों ने असंख्य कारणों से समु��्रों को पार किया है, और समुद्र-आधारित वाणिज्य ने दुनिया के क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ा है। गहरे समुद्र पर आज़ादी मानव समृद्धि के लिए मूलभूत सिद्धांत बन गया है।

किसी विशेष देश या समूह ने ऐसा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून नहीं बनाया जैसा यह अब मौजूद है। यह मानव जाति की सामूहिक मेधा का उत्पाद है, जो सबकी भलाई के लिए अनेक सालों से ज़्यादा समय में तैयार किया गया है। आज, मानवता के लिए बहुत से लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि प्रशांत से लेकर हिंद महासागर तक समुद्र पूरी तरह खुले रहें।

लेकिन इसका, वास्तव में, क्या मतलब है? अगर हम उस चेतना का सार करें जो हमने अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में सदियों से समाहित की है और इसकी तीन सिद्धांतों के रूप में पुनः रचना करें, तो समुद्र में क़ानून-व्यवस्था सामान्य ज्ञान की बात हो जाती है।

सबसे पहले, देशों को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के आधार पर अपने दावे पेश और स्पष्ट करने चाहिए। दूसरे, देशों को अपने दावे साकार करने की कोशिश में बल या अतिचार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। और, तीसरे, देशों को विवाद शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने चाहिए। इन तीनों अत्यंत सरल - जो लगभग स्वयं स्पष्ट हैं - सिद्धांतों पर ज़ोर दिया जाना चाहिए, क्योंकि एशिया और प्रशांत में सभी सरकारों को इन्हें कड़ाई से बनाए रखने चाहिए।

इंडोनेशिया और फिलीपींस पर विचार करें, ये वे देश हैं जिनके नेता अपने अनन्य आर्थिक क्षेत्रों की अतिव्याप्ति के परिसीमन के लिए शांतिपूर्ण समझौते पर पहुँच गए हैं। इसी तरह, मेरी सरकार दृढ़ता से फिलीपींस के दक्षिण चीन सागर में क्षेत्र-संबंधी विवाद के समाधान के लिए आह्वान का पूरा समर्थन करती है जो सही मायने में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क़ानून के तीन सिद्धांतों के साथ सुसंगत है, ठीक वैसे ही जैसे हम वियतनाम के क्षेत्र-संबंधी विरोधी दावों के समाधान के लिए बातचीत के माध्यम से प्रयासों का समर्थन करते हैं।

एक निष्पन्न कार्य को दूसरे पर जमा करके यथास्थिति में बदलावों को म़जबूत करने के प्रयासों के बजाय, इस क्षेत्र की सरकारों को 2002 के दक्षिण चीन समुद्र में पक्षों के व्यवहार पर समझौते की चेतना और प्रावधानों पर लौटने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिए, जिन पर पहले सभी संबंधित पक्षों ने सहमति व्यक्त की थी। आज की दुनिया में, देशों को इस बात का डर नहीं होना चाहिए कि अतिचार और धमकियाँ नियमों और क़ानूनों की जगह ले लेंगी। मैं दृढ़ता से आशा करता हूँ कि आसियान सदस्य देश और चीन दक्षिण चीन सागर के लिए शीघ्रता से सही मायने में प्रभावी आचार संहिता स्थापित कर लेंगे।

जापान और चीन के बीच एक समझौता है जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और मैंने, प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान 2007 में संपन्न किया था। हमने अपने देशों के बीच अप्रत्याशित घटनाओं को तनाव और ग़लत गणना करने से रोकने के लिए समुद्री और हवाई संचार तंत्र तैयार करने के लिए प्रतिबद्धता की थी। दुर्भाग्य से, यह प्रतिबद्धता ऐसे तंत्र के क्रियान्वयन में तब्दील नहीं हुई है।

हम लड़ाकू विमानों और समुद्र में जहाजों द्वारा ख़तरनाक मुठभेड़ों का स्वागत नहीं करते। जापान और चीन को जिस चीज़ का आदान-प्रदान करना चाहिए, वे शब्द हैं। क्या हमें वार्ता की मेज़ पर नहीं मिलना चाहिए, एक दूसरे से मुस्कराकर हाथ नहीं मिलाने चाहिए, और आपस में बात नहीं करनी चाहिए?

मेरा मानना कि 2007 के समझौते के माध्यम से अनुसरण करने से पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और अनेक समझौतों की ज़रूरत  होगी, जिनमें से प्रत्येक क्षेत्र आज़ादी और समृद्धि के क्षेत्र-व्यापी जाल का एक महत्वपूर्ण तंतु बनेगा।

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  1. Commentedslightly optimistic

    International law?
    Former US secretary of state Henry Kissinger [remember the Nixon shock in 1971] made some dismissive comments about this in his book 'Diplomacy': "Empires have no interest in operating within an international system; they aspire to be the international system. Empires have no need for a balance of power. That is how the United States has conducted its foreign policy in the Americas, and China through most of its history in Asia."

  2. CommentedJeff GE

    China does not have a long history for rule of law. Some may even question if China has a system of rule of law now. So on the issue of securing the rule of law, those countries who have a long history of rule of law (or least make such a claim) should set an example of rule of law for other countries to follow and not use the rule of law as tool for their own gains.

  3. Commentedslightly optimistic

    Re the UN Law of the Sea, the US is not the only country refusing to surrender its sovereignty on property rights. Beijing has signed the treaty but then effectively unsigned it. In 2010 China's foreign minister insisted that the South China Sea is a "core national interest," adding: "China is a big country and other countries are small countries, and that is just a fact."

  4. CommentedJeff GE

    To secure the rule of law at sea, the prime minister should persuade US to ratify UN Law of the Sea Convention first. After that, he may claim that Japan enjoys the explicit and enthusiastic support from US.
    Second, Japan should stop commercial whaling in waters claimed by other countries. After that, the prime minister may claim that "Japan stands for the rule of law -- for Asia and for all people".

    As for dangerous encounters by fighter aircraft and vessels at sea, well, it takes two to tango.

    The prime minister either overestimated his intelligence or underestimated the intelligence of others by double-talking the issue of rule of law.

  5. CommentedYoshimichi Moriyama

    The United States, Australia and Japan should give a variety of aid such as perosonnel training, aircraft, vessels to Vietnam, the Philippines, Malyasia and the like so that they will be better equipped for maritime and aerial patrolling and law-enforcement.

    I support Abe, though not with carte blanche. He should refrain from doing or uttering things that might be interpreted overseas as remilitarizing attempts. Instead, he should explain to the overseas audience how his security policy is in resonance with, and approved and encouraged by South East Asian countries and how Japanese secutity and foreign affairs experts are frequently meeting and talking with their counterparts from Washington, Canberra, Manila and so on.

  6. Commentedj. von Hettlingen

    Prime Minister Abe writes: "Japan is in a better position than ever before to play a larger and more proactive role in ensuring peace in Asia and the world". Indeed he has China's rise and America's pivot to Asia to thank for it. It's unclear how much "explicit and enthusiastic support" Japan enjoys of its "allies and other friendly countries". Nevertheless it offers these countries its support in their territorial disputes with China. In most cases "Japan stands for the rule of law. Whether it also stands "for Asia and for all people", is polemic.
    It is true that many Asian countries are seeing economic growth. Hence it is important to enforce a legal framework to secure "regional peace and security". In this essay, Mr. Abe is appealing to "all governments in Asia and the Pacific" to respect international maritime law. China is a member of the International Martime Organisation and should uphold the martime treaty. In recent months its unilateral actions and gunboat diplomacy in South China Sea have made big waves. China's territorial claims are seen as questionable and it has been accused by the contesting parties of violating international maritime law.
    Mr. Abe has not accused China of violating maritime law in this essay, he is perhaps aware of the saying: "People who live in glass houses shouldn't throw stones. Japan's whaling industry is also a contentious issue and Japanese whalers have often violated international maritime law, by hunting and killing whales in territorial waters, claimed by Australia and New Zealand. Greence Peace had disrupted a Japanese whaling fleet in the Antarctica in 2008. Its more radical peer, the Sea Shepherd Conservation Society had been allegedly attacked by Japanese whalers last February in the Southern Ocean.
    Although whale hunting is part of what Japan calls a scientific research programme, permitted under a clause in International Whaling Commission rules, the same research goals could be achieved using non-lethal methods. This programme is said to be a front for commercial whaling, as every year hundreds of minke and fin whales are being killed.
    It is a pity that the relationship between China and Japan is so frayed that they can not implement "an agreement" signed in 2007, which would "create a maritime and air communication mechanism in order to prevent unforeseen incidents" resulting from "tensions and miscalculation".

  7. Commentedhari naidu

    If I read the tea leaves of Abe’s containment theory of China, in the Sea Lanes of Asia-Pacific region, I’ve a feeling he’s forgotten or misunderstood that Pivot to Asia actually means Pivot to China – for Obama. US will not take sides on the disputed territories in South China Sea. But, for Obama, the ultimate political/legal constraint remains US Senate opposition or lack of ratification of UN Law of the Sea Convention (10 December 1982). 165 countries have, so far, singed the UN Convention. Official rhetoric alone will not suffice against China, as Hagel recently did in Asia. Defense Dept is not the right party to deal with territorial conflict in South China Sea. Only State Dept is capable of dealing with it; however under GWB a lot of these subject matters were transferred to Defense….



    Fact is that Abe’s Japan (along with Germany) is the largest trading partner of PRC. China knows that Japan can’t afford to misjudge the importance of its market to Tokyo. Neither does Japan have the naval military power to challenge China in South China Sea. So this sabre rattling by Abe is for what purpose? You don’t negotiate with Beijing by accusing it of maritime aggression. In other words, China demands Tokyo to stop its political propaganda – eg. visiting the (Fascist) Shrine – and admitting its historical mistakes as an occupation imperial power on mainland China. This seems to be the Chinese precondition; and then the political and diplomatic process can start.

  8. Commentedslightly optimistic

    Ownership of property is a touchy subject. The refusal of countries to OK an international tribunal with power to enforce its judgments means continuing friction over the hundreds of territorial disputes around the world - including resource entitled areas like Ukraine, China seas and the Arctic.
    The US, among many, is unwilling to sign the UN's Law of the Sea Treaty; surrendering any sovereignty to the United Nations is something it wrestles with.

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